भावों की ये, अभिव्यक्ति शब्दों के आधार है मेरी कलम ही, मेरे अस्तित्व की पहचान है.

मेरा परिचय


यूँ तो मैं कुछ खास नहीं
मुझमें कोई बात नहीं
भावों की भाषा कहती हूँ
चाहत के नगमें बुनती हूँ
सुरत शहर में रहती हूँ
बच्चों के ट्यूशन लेती हूँ
मेरी प्यारी दो संतान हैं,
मानसी नरेश जिनके नाम हैं
सैयां जी बिज़नेस करते हैं,
हर दम व्यस्त ही रहते हैं,
बस इतना सा है मेरा परिचय,
अब इसके आगे हम क्या कहे,
साहित्य से हैं लगाव मेरा,
उमा वैष्णव हैं नाम मेरा

उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित

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गज़ल


हवाओं में वतन की इस तरह बदलाव ला देंगे।
जमीं से एक मुट्ठी खाक लेकर हम उड़ा देंगे।।

गगन तक महक मिट्टी की हमें अब यूं है पहुंचानी,
हवाओं की महक में एक खुशबू और ला देगें

हमेशा ही महकती जाएगी इस देश की मिट्टी ।
कलम के जोर से जग को यहीं हम अब बता देगें।।

रहे या ना रहे अब हम नहीं है फिक्र कोई भी।
जगत में देश की मिट्टी का हम जौहर दिखा देंगे।।

Uma vaishnav
मौलिक और स्वरचित

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चाँद मामा आओ ना..


चंदा मामा आओ ना।
ढेर खिलौने लाओ ना।
सूरज चाचू गर्मी दे गए,
तूम ठण्डक बरसाओ ना।
                कहानियों का ले कर झोला।
                सपनों का ले कर उड़न कटोला।
                 पहन के उजालें का झिंगोला।
                  चाँदनी तुम बरसाओ ना।
चंदा मामा आओ ना।
ढेर खिलौने लाओ ना।
तारें भी लगे झिलमिलाने,
तुम इन की, शोभा बढाओ ना।
                    खेल-खिलौने, बर्फ के गोले,
                    गोल-गप्पे और आलू-छोले।
                     खट्टी-मीठी ,चाट चट्पटी,
                     और पकवान खिलाओ ना।
चंदा मामा आओ ना।
ढेर खिलौने लाओ ना।
माँ भी सो गई,लोरी गाते,
तुम मीठी नींद सुलाओ ना।
                   चंदा मामा आओ ना।
                    ढेर खिलौने लाओ ना।
                                 
   उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित

                                   

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अभिमान
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भारत की मिट्टी उगले सोना,
क्यू न हमको अभिमान होना
इस धरती पर जन्में महारथी,
जिस पर दुनियाँ अभिमान करती
पवित्र बड़ी यहाँ की नदियाँ,
अभिमान जिस पर करती नारियां
उच्चा खड़ा हिमालय देखों ,
अभिमान जिस पर हर एक को
यहाँ के भगवान बंशी वाले,
अभिमान जिन पर करते ग्वाले
यहाँ की नारी जैसे ज्वाला,
अभिमान जिस पर करती बाला
भारत देश हैं वीरों की धरती,
अभिमान इस करते हम भारती

उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित

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आसान नहीं होता

तूफानों से कस्ती को निकालना आसान नहीं होता,
बीती हुई बातों को भुलाना आसान नहीं होता

झूगनुओं को हाथों में पकड नहीं सकते,
तूफानों में दियें जलाना आसान नहीं होता

इत्र की सुगन्द को फैलने से रोक नहीं सकते
किसी की यादों को भूलाना आसान नहीं होता

इतनी मुश्किलें हैं जिन्दगी की राह में,
हर बात बया करना आसान नहीं होता।


Uma vaishnav
मौलिक और स्वरचित

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आसान नहीं होता

तूफानों से कस्ती को निकालना,

आसान नहीं होता।

बीती हुई बातों को भूलाना ,

आसान नहीं होता।

झूगनुओ को हाथों में पकडना,

आसान नहीं होता।

तूफानों में दियें जलाना,

आसान नहीं होता।

इत्र की सुगन्द को छुपाना,

आसान नहीं होता।

किसी की यादों को भूलाना,

आसान नहीं होता।

इतनी मुश्किलें हैं जिन्दगी की राहमें,

हर बात बया करना,

आसान नहीं होता।

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चित्र - लेखन
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वाहा! क्या बात है,
बड़ा मनोहर दृश्य हैं
चारों ओर हरियाली हैं,
इन के मध्य खड़ा हुआ हैं,
इसको कहते सब किसान हैं

इसकी छवि की,
कही नही मिशाल है ,
हाल भले ही बेहाल हो,
फिर भी चेहरे पर मुस्कान हैं,
देखो कैसा अनूठा ये इंसान हैं

कपड़े भले ही हो फटे,
फिर भी हर हाल में खुशहाल हैं,
अपने मातृ - भूमि की ये ही तो शान हैं,
कितना सीधा कितना सरल देखों ये इंसान है,
मेहनत से कभी नहीं घबराता कहते इसको किसान हैं।

उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित

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गज़ल

मुझे पहले मिले होते शरारत और हो जाती।
जहां सब कुछ हुआ इतनी इनायत और हो जाती ।

जरा से तुम ठहर जाते जरा से हम ठहरे जाते।
कहीं इस दिल की धड़कन से मोहब्बत और हो जाती।।

लम्हें फिर ना मिलें शायद जो लम्हे खो दिए हमने।
मेरे दिल में बसी है जो तिजारत और हो जाती।।

तमन्ना थी कि कुछ पल के लिए एकांत मिल जाता।
उमा से आपको भी कुछ शिकायत और हो जाती।।

Uma vaishnav
मौलिक और स्वरचित

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सुना है...
समुन्द्र से भी गहरा हैं,
आप का दिल ❤️,
तभी तो..
एक बार डूबने के बाद,
किनारा ही नहीं मिलता

अर्थ
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तुम मेरे जीवन की परिभाषा
तुम मेरे दिल की हो आशा ,
तुम मेरे दिल में समाई हो,
तुम मेरे लिए ही आई हो,
तुम जीवन का शीतल रूप ,
तुम बिन जीवन जैसे धूप ,
तुम बिन जीवन व्यर्थ है,
मैं शब्द हूँ तुम्हारा,
तू मेरा अर्थ हैं।
उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित

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