मैं तारा गुप्ता लखनऊ (उ.प्र.) से‌ मेरी लेखन की मूल विद्या कविता व, गीत एवं कहानी हैं .मेरी रचनाएं अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. वर्तमान में मैं सद्ग्रहणी होने के साथ -साथ सहित्यिक गति विधियों के साथ ही सामाजिक गतविधियों में भी संलग्न हूं.

तुम राधा के सांवरिया
मीरा के गिरधर नागर
है लालसा मेरे मन की
बन राधिका गढूं कहानी या मीरा बन हो जाऊं दिवानी

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"मैं कोई मोम नहीं ,जो शोलों से पिघल जाऊंगी। तेरी चाहत है मुझे, बातों से न बहल पाऊंगी।।"

मरुस्थल से तन मन पर
मेघों ने जमा दिया डेरा।
सपनों जैसा छलकर के
लगा रहा,अब भी फेरा।
।।

भावों से आकुल मन ने
जाने कितने रंग
बिखेरे
आहट से ही बोझिल
हो गये,
बिखरी अलके ,स्वप्न
घनेरे।।

कुछ जिंदगी बदल देती है और कुछ मिलकर बदल जाते हैैं
जिंदगी है, बदलती ही रहती है।

सूनेपन की परछाई में मनभावन का रूप दिखा ।
चंदन सा महका मन उपवन मरुस्थल में विश्वास जगा।।

"पास आओगे विश्वास जमेगा होगा न तब
छल व्यवहार,
आज मांगती हूं मैं
तुमसे अपना
प्रेमभरा मनुहार"।

अंधेरे से शिकायत करने की अपेक्षा
एक दीप जलाना
बेहतर है

अंतर्मन की ज्वाला, क्यों मुझको तड़पाती है?
अपनों ने मुंह मोड़ लिया
तो याद उनकी क्यों
आती है?

कविता
क्यों रिश्ते मजबूर हो गए? अपने अपनों से दूर हो गए यह सवाल मन में उठता है नहीं कोई भी हल मिलता है। वक्त के धारे में सब खोये । बंद आंख कर मन में रोये। रिश्ते तो वही है सारे, पर सब के सब बेनूर हो गए। दादी बुआ चाचा ताया, घर में थे रिश्ते बहु तेरे, हिल मिल कर सब रहते थे। आदर प्यार मान मिलते थे, मिल बांट के खा लेते थे। लगा ठठाके जोर जोर से, जख्मों को भी सी लेते थे ।दूर हो गए हमसे रिश्ते ज्योंखिलौने चूर हो गए। बुआ तो ससुराल चली गई, ताया ताई शहर दूसरे। चाचा चाची अलग हो गए, दादा दादी ओल्ड होम में ।खोखले हुए संवेदनाओं से, संवादों से भी दूर हो गए सारे रिश्ते मजबूर हो गए हम अपनों से ही क्रूर हो गए।

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