मैं तारा गुप्ता लखनऊ (उ.प्र.) से‌ मेरी लेखन की मूल विद्या कविता व, गीत एवं कहानी हैं .मेरी रचनाएं अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. वर्तमान में मैं सद्ग्रहणी होने के साथ -साथ सहित्यिक गति विधियों के साथ ही सामाजिक गतविधियों में भी संलग्न हूं.

मेरे अपने रहते है मुझसे ही खफा। सबसे मैं अपने मन की बात नहीं कहती।।

रिश्ते कहां खतम होते हैं
जिंदगी के सफर में।
मंजिलें तो वही हैं जहां ख्वाहिशें थम जाएं

मेरी आंखों की नमी, तुम्हारा राज देतीं है।
कुछ भी सुनु
तो हर आहट तेरा पैगाम देती है।

अंधेरा घना दिखता नही है कुछ
ठंडा सा झोका छूकर
निकल गया।

हवा दीपक बुझाना चाहती है
आगे मंजिल बुलाना चाहती है ।
दुआएं तेरी जो दिखती नहीं
वो मेरे साथ रहना चाहती हैं।

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चार दिन की ये जिंदगी, खुशियों से गुनगुनाना चाहती हूं ।
बने थे जो रिश्ते तेरे मेरे, उन यादों को साथ रखना चाहती हूं

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जी भर की रोते हैं तो करार मिलता है।
इस जहां में कहां सबको प्यार मिलता है।
जिंदगी गुजर जाती है, इम्तहानों की दौर से।
एक जख्म भरता है, दूसरा तैयार मिलता है।
(संकलित)

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बहते आंसू दिल के दर्द बयां करते हैं।
बह जाने दो दर्द को वरना बहुत टीसते हैं।।

जिंदगी की हर लम्हे, पल पल गुजरते हैं
यादें रुकी रह जाती हैं वीरान रस्तों की तरह

वो कोई और चिराग
होते हैं, जो हवाओं
से बुझ जाते हैं।
हमने तो जलने का हुनर,
तूफानों से सीखा है।