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पड़ोस  में  रहने  वाले  अंकल  रोज़  कचरा  घर  के  बाहर  फ़ेंक  देते  थे । जब  उन्हें  कहा  गया  तो  वह  नहीं  माने  तो  मैंने  उन्हें  रोज़  कभी  केले, सेब  नाशपति  आदि  फल  देने  शुरू किये । यह  क्रम  2  हफ्ते  तक  चला  और  एक  दिन  वे  पूछ  बैठे  तो  मैंने  उन्हें  बताया  कि  यही  कचरा  आपको  बीमार  करेगा  और  आंटी  के  जाने  के बाद  आप  अकेले  हो गए  है, बच्चे  आपके  बाहर  रहते  है।  आपका  ख्याल  कौन  रखेगा? डेंगू , मलेरिया  जैसी  बीमारियों  से  लड़ने  के  लिए यही  फल  काम  आएँगे। अंकल  को  यह  बात  समझ  आयी और  उन्होंने  कूड़ा  कूड़ेगाड़ी  में  डालना  शुरू  किया ।

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तंग गलियाँ

भरम है सदियों का, पल भर में टूटने वाला,
ये बात वक़्त के सब हुकमरां समझते हैं...."

कल सारी रात बरसता रहा यह पानी
गरजता रहा, तरसता रहा, सिसकता रहा यह पानी

दरख्तो ने चेताया, धरती ने भी समझाया
सबकी सुनी पर अपने मन की करता रहा यह पानी

कुछ लुट गया, टूट गया, छूट गया या कोई रूठ गया
मेरे ही सवालो से मुझे शरमसार करता रहा यह पानी

इस बार की बारिशो ने तो बीमार कर दिया है
अब जिस्म को और भी भिगोता रहा, गलाता रहा यह पानी

उसे याद न करें, भूल जाए हम
इन्ही कोशिशो को पानी पानी करता रहा यह पानी

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यूँ बेसबब सवाल न करना
किसी के गमों का हिसाब न करना

उन परिंदो का खूब ख्याल तो ठीक है
पर वो उड़ जाए तो उनका इंतजार मत करना

सरबराह न बन सको तहाफुज़ न दे सको
तो मुझसे कभी प्यार भी मत करना

बड़ी मुश्किल से बनाया है मैंने तुझे अपना
कम से कम तू तो जमाने की तरह बात मत करना

एक मैं हूँ जो भीगते हुए गुरुद्वारे पहुँच गई
एक तू है रब कि कभी अपने मेहर की बरसात न करना

कुछ और दिन लगाए रखो आइने में अपनी तस्वीर 'साद'
थोड़े दिन अपने लफ्जो से किसी को शरमसार मत करना

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