नमस्कार वाचकहो शाळेत असल्यापासून काव्यलेखनाची आवड आहे. मात्र गेल्या 5 वर्षापासून blogs, कथा सुद्धा लिहित आहे. मायबोली, storymirror.com, facebook, instagram, Pratilipi वर लिहित आहे. मराठी,हिन्दी, English,गुजराती भाषेत लिहित आहे. आईने लावलेली वाचनाची आवड, पत्नीची प्रेरणा, मित्रांचे कौतुक आणि वाचकांचा सुयोग्य आशिर्वाद यामुळे पुनश्चा जोमाने Matrubharati वर लिहित आहे. लक्ष असू द्या. आपला नम्र सूर्यांश (suryakant majalkar)

वो कौनसी घड़ी थी, जब हमने कलम उठायी।
तुम्हारे नाम के अलावा, लफ्जोंने की बेवफाई।

एक तरफ शायरी थी।
एक तरफ तजुर्बा ।
दिल की सुने की
दिमाग से काम ले !

बड़ा कमजोर है तेरा दिल? मेरी ऐतबार पे ऐतराज करने लगा!

मैंने खुदा से पुछा," फरिश्ते कैसे होते है?
उसने दोस्तों के नाम लेना शुरु किया!

मेहमान नवाज़ी का शुक्रीयाँ मेरे साथी। किसे वक्त है आजकल हालचाल पुछने का।

जरा बात को तुम शायर की नजरीयें से देखो।
राहत और बैचेनी दोनों महसूस होगी।

बचपन में हम खुब खेला करते थे।
लड़ा करते थे। झग़डा करते थे।

आज की कट्टी को कल भुला करते थे।
आज की दुश्मनी को कल दोस्ती में तबदील करते थे।

बचपन के दिन भी कितने सुहाने थे।
माँ की डाँट और दादी की कहानी के दिवाने थे।

गली गली भटका करते थे।
पेड़पर उलटे लटका करते थे।

पिताजी मार से आँचल में छुपा करते थे।
टीचर की सजा से बचा करते थे।

आजकल की पीढ़ी इन सबसे कौसो दूर है।
नयी तकनीक में सब मश्गुल/मजबुर है।

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ताज्जुब इस बात का है की तुम प्यार करते हो।
नफ़रत की आदत कब छोड़ दी तुमने!

तेरे प्यार के तरीके दुनिया से अलग है।
इज़हार करती हो उसमें भी हक़दारी है।

मेरी मंजिल का रास्ता इसी गली से होकर गुजरता है। गलत मत समझना मेरी मोहब्बत का घर, गली की छोर में बसता है।