मैं श्रुतकीर्ति अग्रवाल, पटना, बिहार में रहती हूँ। शुरू से ही, कथा-कहानियों के माध्यम से पूरी दुनिया को और उससे भी बढ़कर इन्सान को जानने-समझने की बड़ी उत्सुकता रही जिसने पढ़ना सिखाया और कालांतर अपनी अनुभूतियों को कहानियों में ढालना भी। और अब, पाठकों द्वारा अपनी सोंच के प्रति सहमति से उत्साहित हूँ, अनुगृहित हूँ। तथा धन्यवाद देना चाहती हूँ मातृभारती को जिन्होनें मेरी कथाओं को आपतक पँहुचाया, श्रवण माध्यम में ढाला और शाॅर्ट फिल्म बनाने के लिये चुना। धन्यवाद

हिंद की सेना 

जिंदगी की हर नियामत छोड़ कर वतन चुना
ठुकरा दी जिसने दौलतें बस देश-ए-रतन चुना
जान की बाजी लगाई और खून के कतरे न गिने
नमन-नमन वीरों तुमने तो माँ-भारती हर जतन चुना

नमन मेरा ऐ वीर कि तुमने जीवन ही दाँव लगा दिया
पत्थर-काँटों से डर कैसा जब मौत गले से लगा लिया
वो शौर्य तेरा जाँबाजी तेरी वो आँखों में माँ की सूरत
कटा शीश पर गर्व नयन में हर पत्थर दिल को रूला दिया

गर्व तेरा कायम रखने की अब कसम नई पीढ़ियों पर है
तेरे रक्त की कीमत से  वतन तरक्की की सीढ़ियों पर है
सीमाएँ सुरक्षित, देश सुरक्षित, शहादतों की चर्चा हवाओं में
वंदन तुम्हारा, आँखें हुईं नम,यादें बिखरी इन वीथियों पर है

मौलिक एवं स्वरचित

श्रुत कीर्ति अग्रवाल
shrutipatna6@gmail.com

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#पतंग

(मकर संक्रान्ति पर विशेष)



माँझे में शीशे की किरचें, सबको काट गिरा देगी ये,
विपरीत हवाएँ भी आ जाएँ, फिर भी राह बना लेगी ये!

शान से नभ से बातें करती, सबसे ऊँची मेरी पतंग,
नयनभिराम और सबसे प्यारी, मेरा घमंड है मेरी पत॔ग!

कहाँ पता था वक्त थपेड़े, पर्वत को भी पिघला देते हैं,
सृष्टि अनंत जर्रा है इन्साँ, कुछ पल में बतला देते हैं!

बस दो बूँद गिरी बारिश की, लुगदी बन गयी मेरी पतंग,
वक्त ने ऐसा खेल दिखाया, और किसी की उड़ी पतंग!!

मौलिक एवं स्वरचित

श्रुत कीर्ति अग्रवाल
shrutipatna6@gmail.com

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हैसियत


तेरे नाम का सिंदुर पहन पिया
मैं बन गई तेरी मिल्कियत
तेरे रँग में रँगती चली गई
मैं भूल के अपनी असलियत

दो वचन प्यार के बोल के तुम
कब जीत गये कुछ पता नहीं
मिलती कब है इस दुनिया में
परछाई को कोई अहमियत?

जब बात पेट के जाए की
कैसे समझौता अब कर लूँ
हर ताकत से टकराऊँगी
रखती हूँ इतनी हैसियत!

मौलिक एवं स्वरचित

श्रुत कीर्ति अग्रवाल
shrutipatna6@gmail.com

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मुट्ठी भर धरती

जो जननी है मानवता की
जिसके दम पर सारी सृष्टि
संपूर्ण नहीं जीवन जिसके बिन
उसकी स्थिति पर डालें दृष्टि

क्यों जीवन उसको नहीं मयस्सर
वो इच्छित नहीं न सपना है
साँसों का भी हक नहीं जिसे
वो रक्त हमारा अपना है

वो तो अभिमान है आँगन का
शोभा है दो परिवारों की
मुट्ठी भर धरती उसको भी दें
दें सेज नहीं अंगारों की

पालें दुलारें मान नेह दें
स्वीकार करें उसको मन से
क्यों बेटों से कमतर रखें
क्यों वंचित हो वो जीवन से

मत भेद करें बेटी-बेटे में
हर संतान सहारा है
रस-रंग सुग॔ध माधुर्य सभी कुछ
उनसे संसार हमारा है

जन्म उन्हें लेने दें हँसकर
उनके अस्तित्व से प्यार करें
वो ईश्वर की सर्वोत्तम रचना
मत उसका संहार करें

मौलिक एवं स्वरचित

श्रुत कीर्ति अग्रवाल
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