An engineering graduate with some writing skill.A complete book worm.

मेरे झरोखे पे बैठा कबूतर रात भर जागता रहा।
जम्हाई हम दोनों ने साथ में ली।

हम इंसानों ने सब कुछ बदल दिया है मानो।
'मस्त' मैकश

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खिड़की से पीठ मोड़ कर, करवट बदल ली हमने,
वास्ते ऐ रात तेरा चेहरा पुराना ना हो।

माना तू दिल-अजीज है खुशनसीब भी लेकिन,
हर ऐरा गैरा, राह चलता, तेरा दीवाना ना हो।

'मस्त' मैकश

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जुलाई बारह के पन्नों में तस्दीक सी एक दर्ज थी,

'ये जो फैला दिया करते हो ना हाथ पर रख दिल अपना!

ये शहर इतना भी अमीर नहीं जो तुम्हारी गरीबी समझे।'

'मस्त' मैकश

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भर सकता था झोली में जितना,उतना प्यार लाया हूँ।

मैं छोटी मौसी के घर से,बड़ी मौसी के अचार लाया हूँ।

'मस्त' मैकश

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