Hey, I am reading on Matrubharti!

कुछ तो ख्वाब सजाएं है
हमनें रूह -ए-सकून के...

खाएं हैं धोखे दिल की आवाज पर
ख्मखाह क्यों इसकी आवाज सुनी...

शब्दों के अनुबंध में
बस दो गवाह होते हैं,
एक दिल
दूसरा भाव...

सुलगती सी रूह में
एक कतरा इश्क़ का बाकी है...

दिव्या राकेश शर्मा

वह कोना

लैंप की हल्की रोशनी
और बोगनवेलिया की बेल
कुछ कंगूरे टंगे हैं दीवार पर
एक झरोखा भी है
लटका है जिसमें
एक मखमली परदा।
कुछ इस तरह सजाया है
मैंने घर का वह कोना...
बना है एक आला भी
जलती है जिसमें
श्रद्धा की धूप
और आशीर्वाद बन
फैल जाती मेरे पूरे घर में...

कुछ वक्त चुराकर
यहाँ बैठते हैं हम
और लौट जाते हैं
कभी कभी दस साल पीछे
सहेज लाते हैं
उन बारिश की बूंदों को
जो गिरी थी मेरी हथेलियों पर
तुम्हारी हथेलियों की नरमी पा...

इन सुनहरी यादों से सजाया है
मैंने घर का एक कोना।

उठती है गर्म भाप
यहाँ रखे हुए चाय के कपों से
और बनाती हूँ मैं
उससें भी आकृतियां
इन आकृतियों में
ढूंढती हूँ अनेकों किरदार
जो छिपें है इनमें ही कहीं
बन कर कहानियां..

इन कहानियों के किस्सों से
सजाया है मैंने घर का वह कोना...

कुछ धागे जो उलझे गए हैं
ले आती हूँ उन्हें भी
बैठकर इस कोने में
सुलझाती हूँ उनकी उलझन
करती हूं कोशिशें खोलने की
पडी हुई गिरहों की
और महकाती हूँ रिश्तों को...

इन रिश्तों की चमक से
सजाया है मैंने घर का वह कोना।

थककर जब बैठी हूँ
यहां रखी हुई कुर्सी पर
तब महसूस किया तुम्हारे स्पर्श को
सहलाते हुए मेरे माथे के
तब मुस्कुराती है
बोगनवेलिया की बेल
और बिखेर देती है अपनी पत्तियां
इन पत्तियों की सरसराहट से
सजाया है मैंने घर का वह कोना..

कुछ शरारतें भी सजी हैं
मासूमियत से यहाँ पर
रखे हुए हैं कुछ खिलौने भी
जिनसे खेलता है बचपन
और इस बचपन से सजाया है
मैंने मेरे घर का वह कोना...

यहाँ की दीवार पर
हल्दी के हाथ छपे है
हैं शामिल इसमें कुछ आँसू
और कुछ जिद्दे भी
कुछ गीत विदाई के
टंगी हुई है तस्वीरें
इन पलो को समेटे
बाबुल की दुआओं से
सजाया है मैंने घर का यह कोना...

उम्र के उस पायदान पर
जब झुर्रियां होंगी हाथों पर
और चमकेगी सफेदी
हम दोनों के बालों पर
तब हम यहीं आ बैठेंगे
और ओढ लेंगे एक गर्म चादर
तब तजुर्बे की सफेदी से
सजाऊंगी मैं मेरे घर का यह कोना...

दिव्या राकेश शर्मा...

और पढ़े

मेरे दुपट्टे के अवगुंठन में
बंधी हुई है बहुत सी गिरह।
जिनकी संख्या बढती जा रही है
मेरे हर अनुभव के साथ।
बहुत सहेज कर ओढ लेती हूं मैं
और ढूंढती हूँ गलतियां...

दिव्या राकेश शर्मा✍️

और पढ़े

एक कोशिश..

न पीने की चाहत है जाम कोई
चाहत है इश्क की तश्नगी मेरी।

खुलूस है मोहब्बत उनकी देखो
बस मौत बन गई पसंदगी मेरी।

रेख्ता है निगाहों में ख्वाब उनके
वो बन गई है जैसे जिंदगी मेरी।

मौजूं भी मालूम नहीं वफा का
बन गई है फरावाँ बंदगी मेरी।

नाकर्दकार बन गया हूँ जमाने में
दिव्या रास न आई सादगी मेरी।

दिव्या राकेश शर्मा।

और पढ़े

हर शख्स बेईमान अब होने लगा है
ईमान मोहब्बत में भी दिखता कहाँ है..

प्रेम में पीड़ा होती है... मौन पीड़ा...

कवि की कविता का किरदार है औरत

प्रेम का सागर लहलाये वो हैं औरत।

वो नारायणी जीवन दायनी

अमृत लुटाती प्रेरणा दाई हैं औरत।

कपडो मे लिपटी वो ममता की मूरत

रिश्तों में है उसकी जरूरत।

जीवन में उसका कभी अपमान ना करना

तेरे इस वजूद की मान है औरत।


दिव्या राकेश शर्मा।

और पढ़े