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Saroj Verma verified बाइट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी ब्लॉग
1 सप्ताह पहले

संस्कृति..!!


संस्कृति को राष्ट्र का मस्तिष्क कहा गया है, युगों युगों से मानव ने दीर्घकालीन विचार मन्थन के बाद जिस सभ्यता का निर्माण किया है, वही संस्कृति कहलाती है, संस्कृति मानव जीवन का अभिन्न अंग है, उसके बिना मानव का जीवन उसी प्रकार निष्प्राण है, जैसे शरीर में मस्तिष्क के बिना धड़ निष्प्राण और व्यर्थ रहता है, शरीर मे जैसे मस्तिष्क का महत्वपूर्ण स्थान होता है, उसी प्रकार संस्कृति हमें चिन्तन का अवसर देती है, संस्कृति के बिना मानव की कल्पना नहीं की जा सकती।।
          राष्ट्र का स्वरूप निर्धारण करने वाले तत्वों मे से एक तत्व संस्कृति भी है, इसमे ज्ञान और कर्म का समन्वित प्रकाश होता है, भूमि पर बसने वाले मनुष्य ने ज्ञान के क्षेत्र में जो सोचा और कर्म के क्षेत्र में जो रचा है, वही राष्ट्रीय संस्कृति होती है और उसका आधार आपसी सहिष्णुता और समन्वय की भावना है।।
        संस्कृति जीवनरूपी वृक्ष का फूल है, जिस प्रकार वृक्ष का सौन्दर्य पुष्प के रूप मे प्रकट होता है, उसी प्रकार जन का चरम उत्कर्ष एवं उसके जीवन का सौन्दर्य संस्कृति के रूप में प्रकट होता है, जैसे पुष्प की सुन्दरता और महक से वृक्ष का सौन्दर्य निखरता है, उसी प्रकार संस्कृति के कारण ही जन का जीवन सुन्दर ,सुगन्धमय और सद्भावनापूर्ण बनता है, जिस राष्ट्र की संस्कृति जितनी श्रेष्ठ होगी ,उस राष्ट्र के जन का जीवन भी उतना ही श्रेष्ठ और उत्तम होगा।।
         मनुष्य अपने सतत कर्म करता हुआ सदैव ज्ञान की खोज में लगा रहता है, मनुष्य ज्ञान द्वारा जो सोचता है और कर्म द्वारा जो प्राप्त करता है, वह उसकी संस्कृति में दिखाई पड़ता है,इस प्रकार संस्कृति जीवन के विकास की प्रक्रिया है, हर जाति के जीवन जीने का एक अलग रंग-ढ़ंग होता है, अतः विविध जनों की विविध भावनाओं के अनुसार राष्ट्र में अनेक संस्कृतियाँ फलती-फूलती रहतीं हैं, परन्तु सब संस्कृतियाँ अलग अलग होतीं हुईं भी वास्तव में सहनशीलता और आपसी मेल-जोल की एक मूल भावना पर आधारित होतीं हैं।।
          इस प्रकार सभी संस्कृतियाँ एकसूत्र में बँधकर सम्पूर्ण राष्ट्र की सम्मिलित संस्कृति को व्यक्त करती हैं,किसी राष्ट्र के सबल अस्तित्व के लिए इस प्रकार की एकसूत्रता आवश्यक हैं।।

समाप्त___
सरोज वर्मा__

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4 सप्ताह पहले

प्रजेन्टेशन..!!

रेनू! सलोनी कहाँ है?उससे कहो कि लड़के वालों के आने का टाइम हो गया है, जरा तैयार हो जाएँ,मधु ने अपनी छोटी बेटी रेनू से पूछा।।
     शायद छत पर होगीं, रेनू ने जवाब दिया।।
    उसे तैयार कर दे उसे और देख तू ज्यादा तैयार मत होना, पता चला फिर से पिछली बार की तरह लड़के वाले तुझे ही पसंद कर लें,मधु बोली।।
      ठीक है मां,अभी दीदी से तैयार होने को कहतीं हूं, रेनू बोली।।
     और उधर सलोनी के पापा सुधीर ने भी पूरे घर में उथल-पुथल मचा रखी है,ना जाने कितने बार तो वो बाजार दौड़े,सारी चीज़ें अपने तरीके से की,बैठक की सफाई उन्होंने खुद की और साज सज्जा का ख़ासतौर से ख्याल रखा,जो भी नाश्ता बनाया गया है मेहमानों के लिए पहले उन्होंने ही चख कर देखा कि अच्छा बना है या नहीं।।
    सुधीर ने अपने तरीके से सारी जांच कर लेने के बाद मधु से पूछा, सलोनी तैयार हुई या नहीं,इस बार थोड़ा कायदे से तैयार करना उसे।।
     हां, मैंने अभी रेनू से कहा है कि उसे तैयार कर दे,मधु बोली।
    तभी रेनू ने छत पर जाकर देखा कि सलोनी उदास खड़ी है।।
   चलो दीदी! तैयार हो जाओ,रेनू बोली।।
     नहीं रेनू!मेरा मन नहीं कर रहा है,तीन बार ऐसा हो चुका है ,लड़के वाले आते हैं,मेरा सांवला रंग देखकर मना करते हैं या तो दहेज की रकम बढ़ा देते हैं,
    नहीं दीदी ऐसा मत सोचो,चलो तैयार हो जाओ शायद इस बार सब ठीक हो,रेनू बोली।।
      सलोनी तैयार होकर लड़के वाले के सामने पहुंची, उससे सवाल पूछे गए।।
    फिर चाय नाश्ता हुआ उसके बाद लंच, फिर और भी बातें हुई और बात फिर से दान दहेज पर आ कर अटक गई।।
    लड़के वाले बोले,आपकी बेटी भी तो सांवली है।।
       इस बार रेनू चुप नहीं रह पाई और बोल पड़ी__
आप लोगों को पता है,मेरी दीदी आॅलराउण्डर रही हैं और काॅलेज में गैल्डमैडलिस्ट लेकिन हमारे देश की सबसे बड़ी बिडम्बना है कि मां बाप बेटी के दहेज के लिए तो खर्चा करते हैं लेकिन उसकी पढ़ाई में खर्चा नहीं करना चाहते और इस तरह दहेज के नाम पर उसके हिस्से की जमा-पूंजी बेटी को भी नहीं मिलती,ले जाता है कोई और।।
      लड़के वाले उनकी बेटी को देखने आते हैं और मां बाप उसे एक प्रोडक्ट की तरह उसकी नुमाइश करते हैं,और घर को ही प्रेजेन्टेशन का माहौल बना दिया जाता है कि हमारा प्रोडक्ट पसंद कर लिया जाए, लेकिन ये कभी नहीं देखा जाता कि लड़की में भी काबिलियत है,क्या पता लड़की को भी मौका मिले और वो उस लड़के से भी आगे निकल जाए लेकिन नहीं लड़की की काबिलियत हमेशा लड़कों से कम आंकी जाती है।।
     आखिर कब तक बेटी के मां को इस तरह की प्रेजेन्टेशन देनी पड़ेगी और आप लोग क्या मेरी दीदी को रेजेक्ट करेंगे,हम लोगों को आपका लड़का पसंद नहीं है और इतना कहकर रेनू , सलोनी से बोली__
    चलो दीदी! तुम अपने इंटरव्यू की तैयारी करो, नौकरी मिल जाएगी तो तुम्हें किसी के सहारे की जरूरत नहीं है और रेनू, सलोनी को अंदर ले गई।‌
     सब चुप होकर देखते रह गए।

समाप्त__
सरोज वर्मा__
   

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1 महीना पहले

अंज़ाम..!!

वो महफ़िल में आए कुछ इस तरह
जैसे अंधेरे में जल उठे हों चिराग़ कई

देखीं जो झुकती हुई निगाहें उनकी
यूं धड़का जोर से नादां दिल ये मेरा

दोनों में भ्रम कायम है बस यही काफ़ी है
हमने उनसे कहा नहीं, उन्होंने हमसे पूछा नहीं

मन तो किया कि उनकी बंदगी कर लूं
लेकिन होंठों का बंधन खुल ना सका

इज़हार-ए-इश़्क हो ना सका, नतीजा ये
हुआ कि अब ये आंखें दिन रात बरसतीं हैं

उसके बाद तो ये आलम रहा कि जिन्दा रहते
हुए ,ना वो जिन्दा रहें और हम जिन्दा हैं...!!

SAROJ VERMA__

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2 महीना पहले

विकास...!!

मानव शरीर में तीन अंग महत्वपूर्ण और प्रमुख हैं__
मस्तिष्क, हृदय और पेट
इसमें सबसे ऊंचा और प्रथम स्थान मस्तिष्क का है,उसके बाद हृदय और पेट का, पशुओं का हृदय और पेट समानांतर रहता है परन्तु मानव का नहीं।।
     मानव शरीर में पेट का स्थान सबसे नीचे और मस्तिष्क का सबसे ऊपर होता है,पेट और मस्तिष्क समानांतर रेखा में होने के कारण पशु का पेट भरने से ही सम्पूर्ण संतुष्टि मिल जाती है किन्तु मानव को सिर्फ पेट की ही भूख नहीं होती,उसे तो और भी कुछ चाहिए।
     सम्भवतः इसीलिए मनुष्य के मस्तिष्क और हृदय ने उसके पेट पर विजय प्राप्त कर ली अर्थात् पशु अभी भी पेट को पाल रहा है और मनुष्य कितना आगे निकल गया है?मानव पेट से भूख , हृदय से भाव और मस्तिष्क से विचार का जन्म होता है ‌
        पशु पेट और हृदय समानांतर होने से उसमें भूख और भाव समान हैं किन्तु मानव जब सजग होकर खड़ा हुआ तो उसके पेट का स्थान सबसे नीचे आ गया,हृदय का उसके ऊपर और मस्तिष्क का सबसे ऊपर, परिणाम यह हुआ कि भूख पर भाव ने विजय प्राप्त कर ली,इसी विजय भाव के  ही कारण मनुष्य में सौन्दर्यानुभूति का विकास हुआ।।
       भौतिकता की उन्नति से मनुष्य में स्वार्थ,लाभ, घृणा,द्वेष आदि की वृद्धि होती है और उसमें दया, करूणा,प्रेम, सहानुभूति आदि मानवीय भावनाओं का अभाव हो जाता है ।।
      सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास के द्वारा ही मानव में दया, करूणा,प्रेम, सहानुभूति आदि मानवीय भावनाओं का विकास होता है और इस प्रकार सांस्कृतिक तथा अध्यात्मिक विकास मानव को सच्चे अर्थों में मानव बना देता है।
        पशु और मनुष्य की शरीर रचना तुलना करने पर ज्ञात होता है कि पशु के पेट,मन और मस्तिष्क एक सीध में हैं, किन्तु मनुष्य  के शरीर में पेट सबसे नीचे है, हृदय उससे ऊपर हैं और मस्तिष्क सबसे ऊपर है।।
       भाव यह है कि पशु भोजन,भाव -विभोरता और बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में समान रूप में व्यवहार करता है और इसके कारण उसकी स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता किन्तु मानव जीवन में भोजनादि दैनिक आवश्यकताओं की अपेक्षा दया, करूणा,प्रेम,आदि हार्दिक भावों की श्रेष्ठता हैं और उससे अधिक श्रेष्ठ बुद्धि है।।
     संस्कृत साहित्य में पशु और मनुष्य के अंतर को निम्न रूप से कहा गया है_____

आहार निद्रा भय मैथुनम् च,
सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
ज्ञानम् हि तेषामिधिकम् विशेषम्,
ज्ञानेन हीन: पशुभि: समाना:।।

उपरोक्त पंक्तियों में मानव शरीर को मानव समाज का प्रतीक कहा गया है।।

saroj verma....
        

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2 महीना पहले

संतुलन..!!

अगर जीवन के किसी मोड़ पर चलते चलते आपको ठोकर लग जाए और थोड़ी देर के लिए आप अपना संतुलन खो दे तो इसका ये मतलब नहीं कि आप हतोत्साहित होकर रोने बैठ जाए अपने मन को स्थिर रखकर एकाग्रता से सोचे कि आप गिरे किस वजह से आपके अंदर ऐसी क्या कमी थी फिर थोड़ा विश्राम करें और फिर अपने गंतव्य की ओर बढ़ चले क्योंकि अभी आपके लिए विराम लेने का समय नहीं आया है ये तो आपके लिए अल्पविराम था ताकि आप फिर से अपने अंदर एक नवशक्ति और प्रबल इच्छाशक्ति का संचार कर सके जो कि आपको अपने एक नए उज्जवल भविष्य की ओर ले जाएगी।।

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2 महीना पहले

बावरा मन..!!

तुम कोई पाइनेप्पल केक तो नहीं
या फिर कोई वनीला आइसक्रीम
जिसे देखते ही मन खुशी से भर जाए

तुम कोई रेड चेरी लिपस्टिक तो नहीं
या के कोई बनारसी साड़ी जिसे पाने
को मन लालायित हो उठे.....

तुम तो मेरे लिए हो मटके का ठंडा जल हो
या फिर बांस का बना हुआ पंखा जिसे झलने
पर चेहरे का पसीना सूख जाता है...

तुम्हें देखकर सांसें नहीं रूकती वो तो
चलने लगती है ये देखकर कि तुम हो
मेरे पास हो, मेरी जिन्दगी में हो....

तुम पास होते हो तो लगता हैं कि मैं
कितनी अमीर हूं, तुम हो तो मैं तृप्त
हूं, संतुष्ट हूं,पूर्ण हूं,खुश हूं...

तुम मेरे साथ दिन रात तो नहीं रह सकते
लेकिन मैं तुम्हारे बिन जीने का सोच भी
नहीं सकती,क्या करूं बावरा मन है मेरा..!!

SAROJ VERMA...

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2 महीना पहले

तपिश..!!

मई की तपती दुपहरी और रविवार का दिन, शोभा अपनी स्कूटी घर के सामने खड़ी करती हुई,मन ही मन बड़बड़ाती हुए बोली,अभी तो सिर्फ दिन के ग्यारह बजे है, और आग बरस रही है, अभी तो मई का पहला हफ्ता ही हैं और इतनी जानलेवा गर्मी, अभी तो पूरा महीना पड़ा है , अच्छा हुआ मेरे college की गर्मियों की छुट्टियां है, नहीं तो ऐसी गर्मी में कौन पढ़ाने जाता और सब्जियों का थैला उठाते हुए उसकी नजर white colour की car पे पडी।
अरे,ये car किसकी है? आखिर घर पे कौन आया है?
और वो अंदर गई,देखा तो सौरभ था।।
और कैसे आना हुआ? शोभा बोली
दिव्या की शादी है, अगले महीने भइया ने कहा कि तुम लोगों को भी निमंत्रण दे दे, सौरभ बोला।।
शोभा बोली भैया को हम लोग अब तक याद है, जो अपनी बेटी की शादी मे हमें बुला रहे हैं।
भइया की आखिरी बेटी की शादी है ना इसलिए और मेघा मुझे juice दे चुकी है, सौरभ बोला।
मेंघा को क्या पता कि तुम्हे juice नहीं जलजीरा पसंद है , गर्मी में, शोभा बोली।
अच्छा ,क्या खाओगे? शोभा बोली
कुछ भी बना लो, सौरभ ने कहा
इतने में मेघा और बादल दोनो बच्चों ने बाहर जाते हुए कहा
मां हम friends के साथ movie देखने जा रहे हैं
अच्छा ठीक है, शोभा बोली
और ध्यान से गर्मी बहुत है!
शोभा बोली मैं कपडें Change करके आती हूं।
और सौरभ बैठे -बैठे कमरे को निहार रहा था,
और शोभा कपड़े change करके आ गई,
और नई car कब खरीदी,शोभा बोली
अभी तीन महीने ही हुए हैं, सौरभ ने कहा
चलो तुम comfortable हो जाओ, तब तक मैं खाना बना लेती हूं।
सौरभ आराम करने चला गया और शोभा रसोई में।
शोभा lunch ready करके सौरभ को जगाने गई,
सौरभ उठो , lunch ready है
हां आता हूं....
शोभा ने खाना परोसना शुरू किया, ये लो सबकुछ तुम्हारी पसंद का बनाया है
इतना सब बनाने की क्या जरूरत थी और तुम्हे अभी भी मेरी पसंद याद है,सौरभ बोला।।
कैसे भूल सकती हूं, शोभा ने कहा।
तुम अब भी खाना बहुत अच्छा बनाती हो,सौरभ बोला।
thanku और तुम्हारे बीबी और बच्चें कैसे हैं ? शोभा ने पूछा।
सब ठीक है और तुम इस उम्र में, इतनी धूप में सब्जियां लेने गई थीं, तुम्हारी आदत अभी तक गई नहीं, खुद बाजार से सब्जियां लाने की, सौरभ ने कहा।
कुछ आदतें बहुत आसानी से नहीं जाती, शोभा बोली।
और इसी तरह की औपचारिक बातों में lunch खत्म हो गया।
सौरभ बोला , अच्छा अब मैं चलता हूं और भी जगह मथुरा में card बांटने है और शाम को आगरा वापस जाना है,
शोभा बोली ठीक है,
और सौरभ जाने लगा तो इतने में बच्चे भी आ गये और सौरभ उनकी तरफ देखते हुए, नीचे उतर गया,car start की और चला गया।
तभी बादल ने कहा, आप लोगों के divorce को इतने साल हो गए, ये तब भी यहां आ जाते हैं, हमे और आपको परेशान करने।
बहुत तपिश थी, मौसम में और बादल की बातों में।

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2 महीना पहले

'मै'..!!

मैंने कहा, मैं सही हूं
वो बोली मैं सही हूं
सिर्फ 'मैं-मैं' के चक्कर में
सालों की दोस्ती टूट गई
ये 'मै'भी अजीब चींज है.. यारों!!
जहां भी घुसता है, कुछ ना कुछ
टूट ही जाता है।।

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Saroj Verma verified बाइट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी विचार
2 महीना पहले

जहाँ स्त्री का सम्मान होता है वहाँ देवता निवास करते हैं और वहीं पर सुख समृद्धि होती हैं, इसलिए जिस घर की स्त्री का मन शांत रहता हैं वो घर भी शांतिपूर्ण बन जाता हैं।।
#शांतिपूर्ण

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2 महीना पहले

बुर्के वाली मोहतरमा..!!

का हुआ ?इतनी देर काहे लग रही है? मेंहदी लगाने वाली अभी तक आई क्यो नही? देवकी मन ही मन बुदबुदाई।।
       का हुआ बड़की भौजी,मन ही मन,काहे बड़बड़ा रहीं हों, शकुंतला ने अपनी बड़ी भाभी देवकी से पूछा।।
    अब का बताएं,बिट्टी !देखो तो कब से मेंहदी वाली का इंतज़ार कर रहे हैं,टेम से आ जाती तो बन्नी के मेहंदी लग जाती,कित्ते सारे काम पड़े हैं,कल बारात हैं,सारे नेगचार अच्छे से निपट जाएं तो का बुराई है, देवकी बोली।।
    सही कह रही हो,भौजी!! बिटिया का ब्याह,कितनी बड़ी जिम्मेदारी है,हम तुम्हारे मन की बात अच्छी तरह समझ सकते हैं, शकुंतला बोली।।
       तभी बुर्के में एक मोहतरमा घर के अंदर हाज़िर हुई!!
   उसने एक लड़की से पूछा__
   होने वाली दुल्हन कहां है जी?
  अंदर होगी,आप अंदर चली जाइए और इतना कहकर वो लड़की चली गई।।
     वो बुर्के वाली मोहतरमा अंदर गई और हैरानी से दुल्हन को ढूंढने लगी।।
      तभी शकुंतला ने देखा आखिर ये बुर्के वाली कौन है?
उस बुर्के वाली के पास जाकर पूछा__
    तुम कौन हो जी!!और क्या काम है?
   जी मैं नाज़नीन, मेंहदी लगाने आई हूं, होने वाली दुल्हन को,दुल्हन कहां है?उस बुर्के वाली ने जवाब दिया।।
     आ जाओ, हमारे साथ अराध्या के कमरे में ले चलते है और भी लड़कियों को भी मेंहदी लगवानी होगी, शकुंतला बोली।।
      हां.. हां..क्यो नही लेकिन थोड़ी देर बाद, पहले दुल्हन को अकेले में मेंहदी लगा देते हैं, भीड़ भाड़ में ठीक से नहीं लग पाएगी, नाज़नीन बोली।।
    ठीक है.. ठीक है...बस आधे घंटे और तुम ये बुर्का ओढ़े क्यो खड़ी हो यहां तो सब लड़कियां हैं,उतार दो इसे, शकुंतला बोली।।
    हां जी उतार देती हूं,एक बार दुल्हन के पास ले चलिए, नाज़नीन बोली।।
     और शकुंतला ने नाज़नीन को आराध्या के कमरे में पहुंचा दिया।।
      शकुन्तला जैसे ही नाज़नीन को आराध्या के कमरे में छोड़कर आई,उधर से देवकी एक लड़की को साथ में लिए आ रही थी।।
        बिट्टी!!जे रही मेंहदी वाली,जरा इसे आराध्या के कमरे में छोड़ आइओ, देवकी ने शकुंतला से कहा।।
     भौजी!!का बात कर रही हों,जे मेंहदी वाली है तो बा कौन है?जिसे हम आराध्या के कमरे में छोड़कर आए, शंकुतला बोली।।
     और दोनों भागी..भागी आराध्या के कमरे में पहुंची और उन्होंने जो देखा तो हंसे बिना ना रह सकी।।
     शकुन्तला बोली... का दामाद बाबू, आराध्या से मिलवे का मन था तो बता देते ऐसे बुर्के में नाज़नीन बनके आने का जरूरत रही और दोनों ननद-भौजाई ,रूपेश के ऐसे रूप को देखकर हंस पड़ी।।

                   समाप्त___
                    सरोज वर्मा__🌹🙏😀

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