zinadgi khak na thi... khak udaate gujri....

हां माना कि दिलों में बसी है बेबसी,
चलो ये भी माना कि अपनों से बेहतर है अजनबी..
यहाँ रास्ते दुस्वार हैं और मंजिले उस पार हैं..
फिर भी ऐ-ज़िन्दगी तुझे ज़ीने को दिल तैयार है..

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चन्द दिनों में जो भूल जाये,
वो यादें ही क्या..
बार बार ना आये जिनमे ज़िक्र यार का,
वो बातें ही क्या...

तुम ज़िन्दगी में शामिल ना भी हो, तो क्या फर्क है..
इश्क़ बेपनाह तो था ही, अब बेपरवाह भी हो गया..

पिरोकर कुछ लफ्ज़ों में मन का शोर,
शायरी में अपनी ख़ामोशी लिखती हूँ..
कुछ अनकहे दर्द, कुछ अनदेखी खुशियां,
ख़्वाहिशें जो दिल में नाकाम रखती हूं..

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बात चली है राम बनने की पर सच तो ये है साहब,
उस दौर के हम रावण भी नही बन सकते...

विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं..

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बहुत कुछ पढ़ लेती हूं, खामोशियां भी उसकी..
कभी कभी सब कहा गया, सबकुछ नही होता..

बिना उसकी झलक के, शायरी भी कहां आसां होती है,
कभी ख्वाब कभी ख्याल, याद कहां बेनिशां होती है...

आसां कहा है आसमाँ को आसमाँ बने रहना...
तन्हा बे-वजूद रहकर, सबका आसरा बनना..

जीत तो लेंगे ताक़त से किसी को,
फिर तारीफें भी सुनोगे,
डरकर सलाम भी होगा..
पर बात तो प्रेम से जीतने पर है,
जब किसी की दुआओं में भी,
हमारा नाम होगा...

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#gandhigiri

बात आज से लगभग 8 साल पहले की होगी। मैं ओर मेरी फ्रेंड कॉलेज जाने लगे चौराहा पार करके हम आगे जा रहे थे तो सामने देखा एक शॉप पर कोई बच्चे को मार रहा है हम वहां गए तो देखा शॉपकीपर कोई 8,9 साल के बच्चे को छड़ी से मार रहा था जैसे ही बच्चे के एक छड़ी लगी तो वो बहुत कराहा फ़टे कपड़ों में इतनी ठंड में मार मेरा मन बैचैन हो गया मैं वहां से तुरन्त जाना चाहती थी, पर पता नही क्यों में उस बच्चे के पास गई और शॉपकीपर एक ओर छड़ी उसके मारनी चाही तो मैने उसे हाथ से पकड़ ली। असल मे दर्द अब हुआ जब छड़ी मेरे हाथ मे जोर से लगी। बच्चे की पीड़ा अब जाकर समझ आयी थी । शॉपकीपर ने मुझे जाने के लिए कहा मैंने पूछा तो उसने बताया बच्चे ने चोरी की है और अब बता नहीं रहा है समान कहा है मैंने बच्चे के आंसू पोछे ओर विश्वास दिलाया की उसे कोई नही मारेगा उसने सच बता दिया । फिर मेने उसे समझाया कि ऐसा करना गलत है । हालांकि वो शायद ये समझा ना हो पर मैं समझ गयी थी गलती उसकी नही है उसकी जिंदगी से जुड़े हर उस शख़्श की है जिसने उसको ये शिक्षा दी। उसके मा पापा की जो उसे सही शिक्षा ना दे सके उस शॉपकीपर की भी जो प्यार से उसे समझा भी ना सका उन खड़े लोगो की जो हिंसा को देख रहे थे। ऐसी चीजो से उसे भी गलत ही सीख मिलती। कॉलज आते टाइम मेरे हाथ मे बहुत दर्द हो रहा था हालांकि ये कोई गांधीगिरी नही थी, पर आज सही मायनों में मुझे सत्य, अहिंसा और प्रेम का सही मतलब पता चल गया था ।

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