Hey, I am on Matrubharti!

कोई मंज़िल के क़रीब आ के भटक जाता है

कोई मंज़िल पे पहुँचता है भटक जाने से

परवाने का तो जो होना था हो चुका

गुज़री है रात शमा पे क्या देखते चलें

जल्वा-गर हुस्न-ए-हसीनाँ में हैं वो इस शान से

चाँद जैसे ऐ 'रुद्र' तारों भरी महफ़िल में है

लबों पे तेरा नाम आए तो राहत सी मिले है

तू नज्म है?इश्क है? दुआ है?
क्या है?

वो चेहरा किताबी रहा सामने

क्या ख़ूबसूरत पढ़ाई हुई

हमें जब से मुहब्बत हो गइ है

ये दुनिया खुबसूरत हो गइ है

मोहब्बत का तुम से असर क्या कहूँ

नज़र मिलीं नहीं दिल धड़कने लगा

आप जमाने कि राह से ना आए

राह सीधी है हमारे दिल की

बस सीधे चले आए और समा जाए

ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ माशा-अल्लाह

तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं

डूबा हूँ इस क़दर तसव्वुर में

शक ये होता है मैं हूँ या तू है