केवल इतनी जगह बनानी है तुम्हारे दिल में.. की तुम मुझे भुलाने की कोशिश करो। ~रूपकीबातें....... (Introvert Writer)️️...... Insta- Roop_ki_baatein

Roopanjali singh parmar मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी विचार
4 घंटा पहले

मैं तुम्हें वैसे ही देखती हूँ जैसे किसी पिंजरे में कैद परिंदा देखता है आसमान को।
उसे आसमान चाहिए, मुझे तुम!
-रूपकीबातें
#रूपकीबातें #roop #roopkibaatein #roopanjalisinghparmar

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Roopanjali singh parmar मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
4 घंटा पहले

बड़ा अजीब है वो, मेरा होता नहीं,
और मुझे किसी का होने नहीं देता।

खुद चैन की नींद सोता है रात-रात भर,
और मुझे ख़्यालों में आ सोने नहीं देता।

देख कर आँखों को नम चूम लेता है मुझे,
खींचकर बाहों में मगर रोने नहीं देता।

कुछ इस तरह से भी मुझे थाम लेता है वो,
की अंधेरे में साया भी मेरा वो खोने नहीं देता।
- रूपकीबातें
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तुम सच में नहीं हो.. यह दिन में कई बार दोहराती हूँ। तुम्हारे ना होने के सच को स्वीकार नहीं कर पा रही हूँ, इसलिए रट रही हूँ। कहते हैं की एक ही बात को बार-बार कहा जाए तो दिल उसे सच मान लेता है।
रात में नींद नहीं आना या कहीं खोया रहना यह सब बातें बड़ी आम हो गई हैं। कुछ नया है तो बस इतना कि मुझे पता ही नहीं होता मेरी आँखों में आँसू है। अजीब है ना मुझे यही नहीं पता कि मेरी आँखें भरी हुई हैं।
..
कल की ही बात है.. थाली लगा कर खाना खाने बैठी तो करीब एक घण्टे तक रोटी के कौर को थाली में इधर से उधर घुमाती रही। फिर अचानक ख़्याल आया की मुझे खाना भी था।
ऐसी बहुत सी बातें हैं जो अब रोजाना होती हैं।
मैं बोलते-बोलते यह भी भूल जाती हूँ कि मुझे बोलना क्या है या जो बोल रही हूँ वो क्यों बोल रही हूँ।
भूलने लगी हूँ या खुद को खोने लगी हूँ समझ नहीं आता।
वैसे खुद को कैसे खोया जाता है?
यह अगर तुम्हें पता हो तो मुझे ज़रूर बताना। शायद फिर मेरे लिए खुद को वापस पा लेना आसान हो जाए।
अजीब बात यह है की यह सब जो मैंने लिखा है मुझे इसका अर्थ नहीं पता। यह सब पढ़ने पर मुझे बड़ा बेतुका सा लग रहा है। यह सब क्यों लिखा यह भी नहीं पता।
नहीं! मैं पागल नहीं हूँ बस बेचैन हूँ।

पता है क्या..
रॉकस्टार मूवी में रणवीर कपूर का किरदार 'जनार्दन जाखर' अच्छा सिंगर बनने की चाहत में अपना दिल तुड़वाना चाहता था। यह मूवी देख मज़ाक-मज़ाक में मुझे भी लगा की अच्छा राइटर बनने के लिए ज़रूरी है कि मेरा दिल टूट जाए।
मगर जब पहली बार दिल टूटा तो बहुत तक़लीफ़ हुई बहुत ज़्यादा, थोड़ी बदल गई हूँ मैं शायद और लिखना तो दूर सोचना समझना ही ख़त्म सा हो गया है।
मेरी पसंद-नापसंद एक जैसी हो गई है।
थोड़ा रूखा और थोड़ा अनमना सा व्यवहार हो गया है।
खुशी की बात पर भी खुशी महसूस नहीं होती और हंसना/मुस्कुराना बस औपचारिकता बन गए हैं।

फिर जब एक बार और दिल टूटा तो कुछ महसूस नहीं हुआ। दर्द, तक़लीफ़, बेचैनी, आँसू सब हैं।
मगर कुछ कमी सी लगती है, यह सब महसूस नहीं होते।
यह कैसे सम्भव है कि घाव हो, खून बहे मगर दर्द ना हो।
क्या शरीर के किसी अंग की तरह ही मेरी आत्मा सुन्न हो गई है..?
..
आईने पर दिख रही स्वयं की छवि को छूकर यकीन दिलाती हूँ कि "मैं ज़िंदा हूँ"।
मुझे महसूस ही नहीं होता मेरा होना और सबसे अजीब बात यह है कि 'मैं' मेरे यूँ ना होने पर, हुई मेरी कमी को किसी और से पूरा करना चाहती हूँ।
मैं अन्य किसी से मेरी कमी को भरना चाहती हूँ।
-रूपकीबातें
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कभी-कभी दिल बस बात करना चाहता है।
क्या कहना है नहीं पता, बस बात करना है या शायद दिल खुद को बहलाना चाहता है और इसलिए किसी को थोड़ी देर ही सही मगर सुनना चाहता है।
मैं व्यस्त होना चाहती हूँ। इतनी व्यस्त कि मुझे खुद की धड़कनों को सुनने या महसूस करने का भी वक़्त न हो।
अकेली होती हूँ तो मुझमें शोर बहुत होता है। जो कानों पर हाथ रखकर भी दूर नहीं होता।
जानते हो सबसे बड़ा डर क्या होता है.?
अकेले हो जाने का डर!
यह डरावना होता है, बेहद डरावना।
मेरी पढ़ाई भी सब ख़राब लगने लगी है.. मैंने अब तक लोगों के बिना जीना नहीं सीखा।
ये लोग जो प्रेक्टिकल होते हैं.. इन्होंने कौन सी पढ़ाई की है?
यह भी तो सीखना रह गया है।
मुझे सीधा-सीधा भावनाओं को ज़ाहिर करना भी नहीं आता और क्योंकि मैं ऐसी हूँ तो बड़ा नुकसान है मेरा। मैं खुद से भी वो बातें नहीं कहती जो मेरा दिमाग मेरे दिल से कहता है।
तुम्हें यकीन नहीं होगा मगर मेरे अन्दर एक समय में हजार बातें चलती हैं। एक जंग छिड़ी रहती है.. अंदर बहुत शोर है बहुत ज़्यादा। मैं घण्टों एक ही मुद्रा में बिना किसी कारण के छत को निहार सकती हूँ। रात में नींद नहीं आती मगर दिन भर बिना नींद के लेटी रह सकती हूँ। बिना खाए भी लगता है पेट भरा है।
चलो छोड़ो यह सब, मैं बस बात करना चाहती हूँ।
-रूपकीबातें
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Roopanjali singh parmar मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी विचार
1 महीना पहले

अर्थी जितनी छोटी होती है,
कांधे को उतनी ही पीड़ा देती है।
- रूपकीबातें
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Roopanjali singh parmar मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी विचार
7 महीना पहले

यदि टूट चुकी ईश्वर की मूर्ति भी पूजा के लिए स्वीकार्य नहीं होती, क्योंकि वह खंडित हो चुकी है।
तो वह टूट चुका इंसान क्या करता है..
क्या वह स्वयं को स्वीकार करता है।
नहीं! वह त्याग देता है.. स्वयं को भी और इस असंवेदनशील संसार को भी।
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Roopanjali singh parmar मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी विचार
7 महीना पहले

पानी जिस भी जगह पर ठहरता है ,उस जगह को पूरी तरह से गला देता है।
तो क्या आँखों में रोक कर रखे गए आँसू देह को नहीं गलाते..?
क्या ऐसी देह दलदल में तब्दील नहीं हो रही, जहाँ खुशियाँ और भावनाएं धंसती जा रही हैं..

सुनो, तुम जवाब मत देना,
मेरे सवाल ख़त्म नहीं होते।
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Roopanjali singh parmar मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी ब्लॉग
7 महीना पहले

जब एक पुरुष एक बेटी का पिता बनता है, तो वह अनेक पहलुओं में मानसिक और भावनात्मक रूप से बदल जाता है। अब वह स्वयं को नारियल के व्यक्तित्व के रूप में कठोर प्रकट नहीं करता बल्कि वह स्वभाव से कोमल होता जाता है और उसकी बेटी उसके कोमल, प्रेममय पक्ष को देखती है। जो कभी एक बहादुर पुरुष था, वह अब एक रक्षक के रूप में उस समय चिंतित हो जाता है जब उसकी छोटी सी बच्ची लुका-छिपी का खेल खेलते-खेलते पलंग के नीचे छिप जाती है।
वह अब गुस्सैल युवक के रूप में नहीं रह पाता बल्कि वह एक ऐसा इंसान बनता चला जाता है जो अपनी बेटी को थोड़ा सा भी रोता देख परेशान हो जाता है।
एक बेटे से प्रेमी तक का सफ़र तय करके फिर पति बन आखिरकार जब एक पुरुष बेटी का पिता बनता है तो वह एक योद्धा, गुमनाम नायक और सदैव के लिए अपनी बेटी का निस्वार्थ प्रेमी बन जाता है जो उसके लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
यह सच है की हर लड़की एक राजकुमारी बनने का सपना देखती है लेकिन सच कहूँ तो मैंने ऐसा कभी ख़्वाबों में भी नहीं सोचा क्योंकि मेरे साथ आपने सदैव राजकुमारी की तरह ही व्यवहार किया है और मुझे सदैव ही अत्यधिक प्रेम दिया है।
वैसे तो हर दिन आपका ही दिन है और मैं बहुत बार आपको कह चुकी हूँ मगर फिर भी मैं आपको केवल यह बताना चाहती हूँ कि आप मेरे लिए पूरी दुनिया में सबसे अनमोल हैं। आपके जैसा निस्वार्थ प्रेम मुझे कोई कर ही नहीं सकता। जैसा आप मुझे महसूस कराते हैं, जितना प्यार करते हैं, जितनी आप मेरी परवाह करते हैं, मेरी हर ज़िद पूरी करना और हमेशा ही मुझ पर अपना पूरा ध्यान रखना.. यह सबकुछ आपके अलावा कोई कर ही नहीं सकता।
मैं हमेशा आप से कहती हूँ मैं आप जैसी नहीं बन सकती। सच कहूँ तो आप जैसा बनना मेरे बस में ही नहीं है.. इतनी महानता, इतना प्रेम और इतनी निस्वार्थ भावना सभी के लिए फिर चाहे कोई अपना हो या पराया.. मुझ में आपका ऐसा एक भी गुण हो इतनी अच्छी नहीं हूँ मैं।
आप जैसा पिता पाकर मैं तो धन्य हो गई। प्रत्येक जन्म आप मेरे ही पिता बनना।
आपको पितृदिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं♥️♥️
कृपा बनाए रखना और हाँ पार्टी हमेशा की तरह अपन रात में करेंगे।
बहुत-बहुत प्यार आपको परमार साहब।
- रूपकीबातें
♥️♥️
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8 महीना पहले

स्वयं का लगाया नागफनी भी गुलाब लगता है

(भाग-3)

डूबने से बचना हो तो हाथ-पैर चलाना ज़रूरी होता है।
अब मैं रोज घर पर ही घण्टों तक लेशन रीड करने लगी। बात करते वक़्त सही बोलने का प्रयास करना शुरू किया और सबसे कहा ग़लत शब्द पर टोक देना और जब इससे भी सुकून नहीं मिला तो आध्यात्मिक पत्रिका पढ़ना शुरू किया। एक योगा सुबह ठीक 4 बजे करना था। तो रोज बिना किसी के जगाए वो योगा भी किया।
क्योंकि मेरी समस्या बड़ी नहीं थी इसलिए कुछ दिन में ही वह चार अक्षर मैं सही और स्पष्ट बोलने लगी। सरल शब्दों में कहूँ तो मेरा तुतलाना बंद हो गया।

इस बात को वर्षों हो चुके हैं मगर मुझे आज तक समझ नहीं आया कि लोग केवल कमियां ही क्यों देखते हैं, खूबियां क्यों नहीं। किसी का मज़ाक बनाकर उसका अपमान करके, उसे खुद से कम आँककर, नीचा दिखाकर कौन सी ख़ुशी मिलती है।
किसी से यह कहना.."अरे तू कितना मोटा है या कितनी मोटी है"। तू पतला/पतली है।
काला/ गोरा/ साँवला या किसी के चेहरे पर बेहूदा टिप्पणी करना..
किसी के तुतलाने या हकलाने का मज़ाक बनाना..
यकीन मानिए बहुत आसान होता है।
किसी के रंग-रूप या शारीरिक बनावट पर टिप्पणी करना या बेवज़ह ही बिना मांगे सलाह देना ही बड़ा बेतुका है।
मज़ाक भी तब तक ही अच्छा लगता है जब तक हद में हो।
क्या आप स्वयं का मज़ाक बनता देख या अपमान होता देख ख़ुश होंगे..?
मुझे लगता है लोगों को आईने में अपनी सूरत नहीं सीरत देखनी चाहिए.. मगर व्यक्ति कुछ बोलने से पहले स्वयं को नहीं देखता।
मैंने कहा ना.. "स्वयं का लगाया नागफनी भी गुलाब लगता है।
मगर, क्या किसी का मज़ाक उड़ाकर और उसको दुःखी करके आपको सुकून की नींद आ जाती है..?
मुझे तो नहीं आएगी!
💔
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Roopanjali singh parmar मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी ब्लॉग
8 महीना पहले

स्वयं का लगाया नागफनी भी गुलाब लगता है

(भाग-2)

घर जाते समय छुट्टी में चिल्ला-चिल्लाकर मेरा अपमान करना या मुझ पर हँसना आम हो गया था। उनके चुभते शब्द कभी मुझे दुःखी करते, तो कभी मुझे रुला दिया करते थे.. और उनके लिए सामान्य बात थी.. मगर मेरे लिए यह सब सामान्य नहीं था। अब लेशन रीड करने के नाम से ही मैं बहाने बनाने लगती.. मैं प्रार्थना करती की मेरा नम्बर आने से पहले ही क्लास ख़त्म हो जाए। याद होते हुए भी सवालों का जवाब देना मुझे बहुत मुश्किल लगने लगा था और सच कहूँ तो मुझे स्कूल जाने के नाम से ही रोना आने लगता था। कभी-कभी ना जाने का बहाना भी बना दिया करती थी, मगर ऐसा रोज नहीं हो सकता था। धीरे- धीरे मेरा मनोबल कम होने लगा। जैसे-जैसे मेरा मज़ाक बनना बढ़ता गया वैसे-वैसे मेरा आत्मविश्वास दम तोड़ने लगा। ना मुझे खेलना अच्छा लगता था और ना ही किसी से बात करना। बहुत कोशिशों के बाद भी मैं गुमसुम रहने लगी। मैं स्कूल नहीं जाना चाहती थी.. शायद कभी नहीं! रोज-रोज स्वयं का अपमान सहन करना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं होता। मुझे परेशान करने वाले बच्चे ना तो पढ़ाई में अच्छे थे और ना ही किसी अन्य गतिविधि में।
मगर स्वयं का लगाया नागफनी भी गुलाब लगता है।
एक दिन क्लास के बाद अलग बुलाकर एक सर ने मुझसे सवाल किया "आप तुतलाते हो"?.. मैंने कोई जवाब नहीं दिया बस मुस्कुरा दी.. हाँ! मगर आँखें भीग चुकी थी। तब तक उन्हें मेरी सहेली ने जवाब दिया.. नहीं!
मुझे नहीं पता उसने झूठ क्यों कहा.. ना मैंने पूछा। मगर उस वक़्त मेरे लिए यह दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत झूठ था।
मैं दुःखी थी.. बहुत अधिक दुःखी। अधिक दुःख आँखों को बर्दाश्त नहीं होता। परिणामस्वरूप मैं घर पहुंचते ही रोने लगी। अब घर पर सबको पता चल गया था। सबने अपनी-अपनी तरह से समझाया। किसी ने कहा वो उस शैतान बच्चों को डांटेंगे तो किसी ने कहा मैं तुतलाती नहीं हूँ केवल ग़लत बोलती हूँ.. मगर ऐसे सुकून कहाँ मिलना था। जब पापा जी आए तो उन्होंने मेरा चेहरा देख उदासी को भाँप लिया और बहुत प्यार से पूछा.. "किसी से लड़ लिए क्या"?
बस फिर क्या था मैंने रोते-रोते हिचकियों में सारी बात पापाजी को बता दी। उन्होंने हँसकर कहा.. "अरे! इतनी सी बात.. कल हम स्कूल चलेंगे"!
मगर मैंने उनको मना कर दिया। कभी-कभी प्यार ही सब दुःख हर लेता है। मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए और मेरे ख़त्म हो रहे आत्मविश्वास के लिए उनका इतना कहना ही बहुत था।
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क्रमशः

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