केवल इतनी जगह बनानी है तुम्हारे दिल में.. की तुम मुझे भुलाने की कोशिश करो। ~रूपकीबातें....... (Introvert Writer)️️...... Insta- Roop_ki_baatein

Roopanjali singh parmar मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी ब्लॉग
2 महीना पहले

मैं अक्सर ही तुम्हें देखा करती हूँ, जब तुम कहीं व्यस्त होते हो। मुझे पसंद है तुम्हें निहारना और बस बिना किसी वज़ह के निहारते रहना।
मैंने पहले भी कहा है "मैं अपनी पूरी ज़िंदगी तुम्हें देखते हुए गुज़ार सकती हूँ।"
जानते हो तुम्हारी इन छोटी-छोटी आँखों से मैंने बहुत बड़े ख़्वाब देखे हैं।
मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत पल भी वही है जब तुम्हारी नज़रें मुझ पर हुआ करती हैं क्योंकि खुशी से ज़्यादा उस पल मुझे खुद पर ग़ुरूर होता है।
..
तुम्हें याद है जब तुमने मेरे माथे को चूमा था,
तो मैं..
मैं बस घबराकर तुम्हारे गले लग गई बिना किसी प्रतिक्रिया के और तुम हँसने लगे जिस वज़ह से मैं चिढ़ गई थी।
सुनो,
मैं जब भी कभी तुम्हारे करीब आऊंगी ना, तो तुम्हारे हाथ को थाम और काँधे पर सिर रख चुपचाप बैठी रहूंगी। मैं तुम्हारे माथे को चूमने से पहले आँखों को चूमना चाहती हूँ।
..
मेरे सारे ख़्वाब तुमसे जुड़े हुए हैं।
और तुम्हारे ख़्वाब खूबसूरती से भरे हैं। आसमान जितनी ऊंचाई हैं उनकी। उनमें मेरी जगह है या नहीं पता नहीं लेकिन, मैं तुम्हें हमेशा कामयाब होता देखना चाहती हूँ। तुम्हें खुश देखना चाहती हूँ।
..

मैं तुम्हारे साथ, तुम्हारे पास रहना चाहती हूँ। सबसे कह देना चाहती हूँ कि "मैं सिर्फ़ तुम्हारी हूँ।" तुम्हारा हाथ पकड़ के चलना है मुझे।
तुम्हारा शहर, उसकी हर गली सबकुछ तुम्हारे साथ देखना है।
किसी ऊंची जगह पर खड़े हो जोरों से चिल्लाना है कि.. "मैं तुमसे प्यार करती हूँ।"
तुम्हारे मोबाइल की स्क्रीन पर लगी तुम्हारी तस्वीर में तुम्हारे साथ अपनी जगह बनानी है।
तुमसे झूठी लड़ाइयां लड़नी हैं और फिर तुमसे रूठना है मुझे।
तुम्हें सताना भी है और तुम्हें मनाना भी है।
तुम्हारी फ़ोटो के नीचे केप्शन में कैपिटल लेटर में 'MINE' लिखना है।
और भी बहुत सारे छोटे-छोटे ख़्वाब हैं मेरे।
सुनो,
ये ख़्वाब पूरा होगा ना।
हम साथ होंगे ना।

मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती, तुमसे दूर होना या बिछड़ना नहीं चाहती.. बस साथ रहना चाहती हूँ, उम्र भर तुम्हें निहारना चाहती हूँ और अपना हर एक ख़्वाब तुम्हारी आँखों से देखना चाहती हूँ।
बस..!
- रूपकीबातें
♥️🌺
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Roopanjali singh parmar मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी ब्लॉग
3 महीना पहले

यूँ ही जागते हुए अचानक मैं तुम्हें सोचने लगती हूँ। तुम मेरे ख़्यालों के बीच यूँ चले आते हो जैसे हौले से माँ की गोद में नींद आ जाती है.. या जैसे मेरी आँखों में तुम्हें देखते ही आँसू आ जाते हैं।
बस ख़बर ही नहीं लगती।
तुम्हें सोचती हूँ तो लगता है जैसे मैं तुम्हें बहुत क़रीब से जानती हूँ। जैसे मेरे जितना क़रीब कोई तुम्हारे है ही नहीं।
मैं तुम्हारे स्पर्श से ही तुम्हारे दिल का हाल जान जाती हूँ और तुम्हारी हथेली पर तुम्हारी धड़कनों को महसूस कर लेती हूँ।
अच्छा लगता है मुझे, तुम्हारे सीने पर सिर रख तुम्हारी धड़कनों को सुनना और यूँ सुनते हुए गहरी नींद सो जाना।
जानते हो.. कभी-कभी महसूस होता है जैसे मैंने तुम्हारे चेहरे को अपनी हथेली में भर लिया है और इस हथेली से जब चाहूँ उसे मेरे रोम-रोम में उकेर सकती हूँ या शायद उकेर लिया है।
कभी किसी रोज़ तुमसे बात होगी तो यह ज़रूर बताऊंगी की मैं तुमसे कितना प्रेम करती हूँ। क्योंकि मैं यह तो नहीं जानती की सबसे ज़्यादा करती हूँ या नहीं। मैं केवल इतना जानती हूँ कि मैं जितना कर सकती हूँ उससे अधिक करती हूँ।
कितना ग़ुरूर होता है खुद पर जब तुम भीड़ में खड़े होने पर भी मुझ पर नज़र रखते हो.. यह मैं तुम्हें शब्दों में नहीं बता सकती।
जब तुम मुझे कहीं जाता देख रोककर इशारों में पूछ लेते हो.. कहाँ..?
और मैं बस मुस्कुराकर तुम्हें जवाब दे दिया करती हूँ।
जब तुम मुझे परेशान नहीं करना चाहते और बस इसलिए किसी के मुझसे किए गए सवाल का जवाब भी खुद दिया करते हो तो बस..
यकीन मानो बहुत अच्छा लगता है।
जानते हो क्या..
मैं जिस कमरे में दिन-रात रहा करती हूँ उसकी दीवारों पर मेरे हाथों की छाप से तुम्हारी छवि बनती जा रही है और मैंने अपने हाथों की मुट्ठी बना ली है.. जिसे मैं खोल नहीं रही। डर रही हूँ कि कहीं यह हाथों की छाप किसी को स्पर्श करते ही उसके मन में तुम्हारी छवि ना बना दे।
डर रही हूँ कि यह मुट्ठी खुल गई तो तुम्हारी छवि चारों ओर बन जाएगी और फिर मुझे ईर्ष्या होगी इन दीवारों से, लोगों से, सब से।
मेरे लिए मुमकिन हो तो मैं तुम्हें तुमसे भी नहीं बांटू।
चाहती हूँ जिस वक़्त मेरे ये प्राण मेरी देह को छोड़ रहे हों उस आख़िरी वक़्त भी तुम मेरे ही समीप रहो और मैं हमेशा की तरह तुम्हारे सीने पर सिर रख तुम्हारी धड़कनों को सुनते हुए हमेशा के लिए सो जाऊं।
-रूपकीबातें
🌼🍁
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3 महीना पहले

किसी के जाने के बाद एक जगह ख़ाली हो जाती है। एक रिक्त स्थान!
ऐसा रिक्त स्थान जो कभी नहीं भरता।
मैं कभी-कभी सोचती हूँ कि लोग ज़िंदगी से जाते क्यों हैं?
हाँ! मगर किसी के ज़िंदगी में आने पर कभी मेरे दिल में इतने सवाल नहीं उठे। मुझे लगता है कि किसी का चले जाना एक ऐसा विषय है जिस पर कभी कोई किताब नहीं लिखी गई या शायद कोई चर्चा ही नहीं कि गई।
क्योंकि चर्चा की जाती या किताब लिखी जाती तो यह सवाल मुझे आधी रात को खींचकर मेरे रिक्त होते स्थान की ओर नहीं ले जाता।
'वो चला गया'.. यह वाक्य तुम्हें दुःखद नहीं लगता?
अच्छा! अजीब बात यह है कि किसी की अनुपस्थिति हमें उस इंसान के और भी करीब कर देती है और उपस्थिति तो जैसे महसूस ही नहीं होती।
यहाँ 'अनुपस्थिति' का अर्थ केवल मृत्यु का होना नहीं है। दरअसल मृत्यु होने पर तो हमें प्रेम हो जाता है।
जानते हो मेरा मानना है कि "ज़िंदा इंसान सब को बुरा लगता है, मुर्दे पर तो केवल प्यार ही आता है।"
जब हम इंसानों को किसी से नफ़रत हो जाए तो हम हर सम्भव प्रयास करते हैं जताने का मगर मोहब्बत जताने के नाम पर पीछे हट जाते हैं और थोड़ी भी कोशिश नहीं करते.. अजीब नहीं है यह!
..
जब अचानक कोई आपके जीवन से चला जाए तो उस खाली जगह को भरने की हमारी नाकाम कोशिश मुझे समझ नहीं आती क्योंकि उस इंसान के रहते यह क्यों नहीं कहा कि 'हम उसके बिना रह नहीं सकते।'
क्यों किसी को खो देने के बाद ही हम यह कहते हैं कि 'उसके बिना जीवन व्यर्थ है।'
मैंने पहले भी कहा है "शोक प्रकट करना प्रेम प्रकट करने से कहीं अधिक सरल है।"
कभी-कभी कह देना अच्छा होता है बस इसलिए सुनो..
मैंने पहले भी कहा है आज पुनः कह रही हूँ.. "मैं तुमसे प्रेम करती हूँ और तुम्हारे बिना मेरे जीवन की कल्पना भी मेरे लिए संभव नहीं है।"
-रूपकीबातें
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Roopanjali singh parmar मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी शायरी
4 महीना पहले

मैं नज़र ना आऊंगी तो किसे सताओगे तुम,
मेरे रूठने पर क्या हमेशा यूँ मनाओगे तुम।
मैं कैसे एतबार कर लूं तुम्हारी हर एक बात का,
जानती हूँ एक दिन मुझे छोड़कर जाओगे तुम।।
-रूपकीबातें
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4 महीना पहले

कल रात मैंने एक सपना देखा.. इतना ज़्यादा कुछ याद नहीं है बस सपना ख़राब था, बहुत ख़राब।
मैंने देखा कि मेरी आवाज़ बदल गई है। बहुत अजीब और डरावनी हो गई है। मैं बोल रही हूँ तो कानों पर हाथ रख लेती हूँ, मुझे मेरी ही आवाज़ से डर लग रहा था और फिर अचानक मेरे पैर और सिर तो बिस्तर पर हैं पर शरीर का बाकी बचा हुआ हिस्सा ऊपर की ओर उठता जा रहा है। ऐसा ही बहुत कुछ हो रहा था जिससे मुझे घुटन हो रही थी,बहुत घुटन।
मैं सपने को देखते समय नींद में खुद को यह यकीन दिलाने की कोशिश कर रही थी कि "मैं ठीक हूँ और सो रही हूँ यह केवल एक सपना है।"
लेकिन सपना इतनी वास्तविकता से भरा होता है कि..
खैर नींद में ही मैं अपने तकिए के नीचे रखी माचिस को ढूंढने लगी जो मुझे नहीं मिली क्योंकि कहाँ देख रही थी पता नहीं।
मैंने मेरे गले में पहने धागे में भगवान के लॉकेट को इतनी बेसब्री से ढूंढा की वो धागा ही खुल गया और गर्दन में हल्का दर्द होने लगा। इस सब के परे सच तो यह है कि लॉकेट मैंने सबकुछ खो देने के बाद गुस्से में साल भर पहले उतार दिया था। केवल धागा रह गया था। मगर नींद में यह भी याद नहीं रहा और हमेशा की तरह डरकर उसे तलाशने लगी। हाथों से उस इंसान को छूने की कोशिश कर रही थी जो मेरे बगल में सोया ही नहीं था। यकीन मानो मैं बहुत डर गई थी।
शायद यह सब एक पल में हुआ होगा जो मुझे पता नहीं कब हुआ, कैसे हुआ। मगर इसे मैंने सपने में जिया था। तो बस इतना पता है कि मैं डर गई थी.. आँखे खोलने की कोशिश करने के बाद भी आँखें नहीं खुली और जब खुली तो सुबह हो चुकी थी। सुबह के 8:30 बज रहे थे। फिर करवटें बदलती रही। घ्यान कहीं ओर लगाने की कोशिश की, सोने की भी कोशिश की मगर नींद नहीं आई.. हाँ! आँसू ज़रूर आ गए।
तुम्हारा सुप्रभात का कोई मैसेज ना पाकर तुम्हें कॉल किया.. यह याद दिलाने की कुछ काम था तुम्हें वो कर लेना। मगर तुमने नहीं उठाया.. कॉल कट होते ही तुरन्त मुझे तुम्हारा मैसेज मिल गया था।
मैं नाराज़ नहीं थी। बस बात करना चाहती थी। मगर जब बात नहीं हो पाई तो मैं दुःखी हो गई और शाम होते-होते मैं नाराज़ हो गई।
फिर तुम्हारे पूछने पर भी चुप रही।
मैं अकसर ही अपनी किसी भी प्रकार की अच्छी या बुरी भावनाओं को किसी के सामने प्रकट करने से खुद को रोक लेती हूँ। पता नहीं मगर मेरे लिए भावनाओं को प्रकट करना, उन्हें वास्तविक रूप में कह देना.. यह बहुत मुश्किल हो जाता है।
फिर क्या फ़र्क पड़ता है की सब मुझे कितना ग़लत समझते हैं। मैं चुप ही रहती हूँ।
यकीनन मैं उस रेत की दीवार की भांति हूँ.. जो ज़रा सी ठोकर से डह जाएगी। जिसका अस्तित्व केवल एक ठोकर लगने तक है।
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4 महीना पहले

मुझे हमेशा से यही लगता रहा है कि तुम मुझसे प्रेम करते हो। इसके पीछे का कारण यह है कि तुमने हमेशा मुझे महत्व दिया है। अपनी व्यस्त ज़िन्दगी के बीच, हर काम के बीच मेरे लिए तुम्हारा समय निकालना मुझे यह एहसास कराता रहा है कि.. मैं तुम्हारे लिए खास हूँ।
जब मैं तुम्हारे समीप होती हूँ तो मेरी हर छोटी-छोटी बात का तुम ख़्याल रखते हो। मेरी हिचकी मुझसे ज़्यादा तुम्हें परेशान करती है।
आधा दिन निकल जाने के बाद भी अगर मैंने खाना नहीं खाया तो तुम मुझे टोक दिया करते हो।
मैं किस से क्या बात करती हूँ, किसने मुझसे क्या कहा, रात को मेरी नींद कैसी रही.. इस सब का तुमको पूरा ख़्याल रहता है।
मैं समय से सोती नहीं हूँ और फिर समय से जागती नहीं हूँ.. यह सब तुमको पसन्द नहीं.. जानती हूँ मैं।
लेकिन इस सब के बाद भी तुमने यह कभी नहीं कहा कि तुम मुझसे प्रेम करते हो।
नहीं! ऐसा नहीं है कि कहना ज़रूरी है.. मगर संभव हो सके तो ज़रूर कहना।
फिर मैं अधिकार से बिना किसी असमंजस के "तुम सिर्फ मेरे हो" कह सकूंगी और मुझे यह अधिकार चाहिए।
मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ.. बिल्कुल नहीं!
मैं सहज-सरल-सत्य रूप से कह रही हूँ.. "मैं तुमसे प्रेम करती हूँ। बहुत अधिक प्रेम करती हूँ।"
नहीं! मतलब ऐसा भी नहीं है कि तुम अभी कहो या मुझे इसी वक़्त जवाब दो।
तुम्हारे पास पूरा वक़्त है सोचने के लिए.. जितना तुम चाहो उतना वक़्त है तुम्हारे पास।
मैं वक़्त पूरा दूँगी तुमको मगर फ़ासला नहीं रखूंगी।
मैं तुमसे बात करूंगी, तुमसे मिलूंगी भी।
कॉल करूँगी, मैसेज भी करूँगी।
तुम्हारा हाथ भी पकड़ूंगी और तुम्हारे गले भी लगूंगी।
तुम पर कोई बन्दिश नहीं है और अपनी सीमा भी जानती हूँ मैं। तो उस सीमा के अंदर रहकर तुमसे प्रेम तो कर ही सकती हूँ ना!
तुम इसे कुछ भी समझो मगर जब तक तुम मुझे जवाब नहीं दे देते मैं फ़ासला नहीं होने दूँगी।
तुम्हारी 'हाँ' होगी तो मुझे मेरे लिए खुशी होगी और तुम्हारी 'ना' होगी तो मुझे तुम्हारे लिए खुशी होगी क्योंकि तुम उसमें खुश रहोगे।

मगर मुझसे पूछोगे तो मैं तुम्हारी 'हाँ' चाहती हूँ।
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Roopanjali singh parmar मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी विचार
4 महीना पहले

मैं- तुम्हें ये क्यों लगता है मैं तुमसे प्यार करती हूँ..?
वो- लगता है.. वाक़ई?.. तुम करती हो!
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Roopanjali singh parmar मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी ब्लॉग
5 महीना पहले

मैं उदास नहीं हूँ.. शायद परेशान भी नहीं हूँ.. बस कहीं भी मन नहीं लगता। खुद से बहुत ऊब गई हूँ।
रात होते ही अजीब सी वीरानी छा जाती है मुझ पर। रात में आए कुछ पुराने ख़्याल नींद को ही नहीं तोड़ते बल्कि धड़कनों को बढ़ा भी देते हैं। हाँथ काँपने लगते हैं और आँसू गालों पर लुढ़कने लगते हैं।
रोज़ सुबह बिस्तर से केवल यह सोचकर खुद को धकेल कर उठाती हूँ कि थोड़ी देर बाद फिर से वापस बिस्तर पर आऊंगी।
तुमने शायद गौर किया होगा कि तुमसे बात करते-करते अचानक खोने लगती हूँ और उदास हो जाती हूँ।
यह उदासी मुझमें नहीं है, मैं खुद एक उदासी हूँ।
सुनो, यह कोई रोग है क्या..?
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मेरा कुछ भी करने का मन नहीं होता..
खाना खाने का मन नहीं होता, नहाने का मन नहीं होता.. कहीं जाने का मन नहीं होता, किसी से मिलने का मन नहीं होता, बात करने का मन नहीं होता और यहाँ तक कि सोने का भी मन नहीं होता।
पर जानते हो सबसे अजीब क्या है..
मैं कहीं जाने के बाद वापस घर नहीं आना चाहती, किसी से मिलने के बाद उसे जाने नहीं देना चाहती.. चाहती हूँ बातें कभी ख़त्म ना हों.. सोती हूँ तो बस जागना नहीं चाहती।
लगता है ऐसे सफ़र पर निकल पडूँ जिसकी कोई मंज़िल ना हो सफ़र ख़त्म ना हो.. और मैं बस किसी का हाथ थामे जहाँ वो ले जाना चाहे जाती रहूँ।
..
जानते हो मेरे जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी क्या है..?
कोई प्यार से बात ही कर ले तो आँखें भीग जाती हैं.. किसी ने हाल पूछ लिया तो मेरे अंदर से दो आवाज़ें आती हैं..
दिल कहता है "मैं ठीक नहीं हूँ"!
दिमाग़ कहता है "मैं ठीक हूँ.."!
बिडम्बना यह है कि दिल की बात मुझे सुनाई देती है और दिमाग़ की बात सबको।
जानते हो अगर कोई मुझसे कह दे 'खुश रहो' या "ईश्वर तुम्हारी परेशानियों को दूर करे" तो आँखें आँसू बहाने लगती हैं और मैं लगभग रोने ही लगती हूँ।
मगर मुस्कुराने के मामले में तो मेरा कोई जवाब ही नहीं है.. मैं मुस्कुराने में इतनी पक्की हो चुकी हूँ कि आज वर्तमान में सबसे आसान काम है मेरे लिए 'मुस्कुराना'।
हाँ, केवल मेरी मुस्कुराहट मेरे खुद के हृदय तक नहीं जाती..
यह मुस्कुराहट मृत है इसका मेरे जीवन में कोई अस्तित्व ही नहीं रहा।
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Roopanjali singh parmar मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी विचार
5 महीना पहले

जानते हो सबसे मुश्किल क्या है..?
सबसे मुश्किल है तुम्हें रोता हुआ देखना!
क्योंकि जो आँसू तुम्हारे गाल को गीला करते हैं,
वह मेरी आत्मा भिगा दिया करते हैं।
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Roopanjali singh parmar मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी विचार
5 महीना पहले

मैंने जब-जब तुम्हें उदास देखा, मुझमें वैसी ही खामोश रही..
जैसी खामोशी किसी क्रांति के होने से पहले छा जाती है।
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