रश्मि रविजा, लेखिका. काँच के शामियाने उपन्यास पुरस्कृत एवं चर्चित. बन्द दरवाजों का शहर कहानी-संग्रह प्रकाशित. खुसरो दरिया प्रेम का साझा कहानी संग्रह .मुम्बई आकाशवाणी ,विविध भारती एवं बिग एफ.एम से कहानियों का प्रसारण . पत्रिकाओं,समाचार पत्रों में आलेख प्रकाशित.

Rashmi Ravija मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
3 साल पहले

काली कॉफ़ी में उतरती सांझ 

थके कदमो से...

घर के अंदर  घुसते ही

बत्ती  जलाने का भी मन नहीं हुआ 


खिड़की के बाहर उदास शाम,

फ़ैल कर पसर गयी है

मुस्कुराने का नाटक करने की ज़रूरत नहीं आज

जी भर कर जी लूं, अपनी उदासी को

कब  मिलता है ज़िन्दगी में ऐसा मौका!

अपने मन को जिया जा सके

मनमुताबिक!



मोबाइल .... उफ़्फ़!!!

उदासी को जीने के मुश्किल से मिले ये पल

....कहीं छीन ना लें!!

साइलेंट पर रख दूं

लैंडलाइन का रिसीवर भी उतार ही दूं ..

ब्लैक कॉफी के साथ ये उदासी ....

एन्जॉय  करूं ... इस शाम को...!


सारे कॉम्बिनेशन सही हैं

धूसर सी साँझ ...

अँधेरा कमरा ...

ये उदास मन 

..... और काली  कॉफी!! 


शाम के उजास को अँधेरे का दैत्य

लीलने लगा है

आकाश की लालिमा, समाती जा रही है उसके पेट में

दैत्य ने खिड़की के नीचे झपट्टा मार

थोड़ी सी बची उजास भी हड़प ली

छुप गए उजाले नाराज़ होकर


घुप्प अँधेरा फैलते ही

तारों की टिमटिमाहट

से सज गई 

महफ़िल आकाश की

जग-मग करने लगें हैं, जो

क्या ये तारे 

हमेशा ही इतनी ख़ुशी से चमकते रहते हैं?

या कभी उदास भी होते हैं!!


मेरी तरह!!


इन्ही तारों में से एक तुम भी तो हो

पर ...

मुझे उदास देख क्या कभी खुश हो सकते थे तुम?

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Rashmi Ravija मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
3 साल पहले

"उम्र की सांझ का बीहड़ अकेलापन "



जाने क्यूँ ,सबके बीच भी अकेला सा लगता है.

रही हैं घूर,सभी नज़रें मुझे

ऐसा अंदेशा बना रहता है.

यदि वे सचमुच घूरतीं.

तो संतोष होता

अपने अस्तित्व का बोध होता.

ठोकर खा, एक क्षण देखते तो सही

यदि मैं एक टुकड़ा ,पत्थर भी होता.


लोगों की हलचल के बीच भी,

रहता हूँ,वीराने में

दहशत सी होती है,

अकेले में भी,मुस्कुराने में

देख भी ले कोई शख्स ,तो चौंकेगा पल भर

फिर मशगूल हो जायेगा,निरपेक्ष होकर

यह निर्लिप्तता सही नहीं जायेगी.

भीतर ही भीतर टीसेगी,तिलामिलाएगी


काश ,होता मैं सिर्फ एक तिनका

चुभकर ,कभी खींचता तो ध्यान,इनका

या रह जाता, रास्ते का धूल ,बनकर

करा तो पाता,अपना भान,कभी आँखों में पड़कर


ये सब कुछ नहीं,एक इंसान हूँ,मैं

सबका होना है हश्र,यही,

सोच ,बस परेशान हूँ,मैं.

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Rashmi Ravija मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
3 साल पहले

बहुत याद आता है नीम का वो पेड़ 


बड़े दिनों बाद आई बिटिया
हवा में घुली,मिटटी की सोंधी महक ने जैसे की हो शिकायत 
पाय लागू काकी, राम राम काका, कईसी  हो रामसखी

पूछते चल पड़े  विकल कदम, 
मिलने को उस बिछड़े साथी से, 
दिया था जिसने साथ,हरपल हरदम 

शाम होते ही उसकी शाखाओं पर गूंजता,
पंछियों  का कलरव
जड़ों के पास लगा होता,
बच्चों का जमघट


रात होती और जमा होती बहुएं,
घर घर से 
जो दिन के उजाले में होती किवाड़ों के पीछे,
बड़े बूढों के डर से.
हंसी ठिठोली होती
बांटे जाते राज
पोंछे जाते आंसू
और समझाई जाती बात

मनाया था,इस नीम के पेड़ ने ,उन रूठे बेटों को
जो,घर से झगड़ ,आ बैठते थे,इसकी छाँव
दिया था दिलासा,उस रोती दुल्हन को 
जब रखी थी उसकी डोली कहारों ने
और सुस्ताने बैठे थे पल भर ,इस ठांव.

सहलाया था, पत्तियों ने दुलार से 
,उन फफोलों को
जब निकलती थी माता
मासूम  नौनिहालों को.

पहनी रहती ,बच्चियां 
नीम के खरिकों के टुकड़े 
नाक-कान छिदवाने के बाद.
ताकि,पहन सकें झुमके और नथ
जब लें फेरें, अपने साजन के साथ.

सुबह होती,बांटता सबको दातुन
गाँव की चमकती हंसी रहें,सलामत 
जैसे हो,इसका प्रण.

सर पे चढ़ती धूप और 
चले आते किसान 
लिए नमक-रोटी-प्याज की पोटली
अपनी पत्तियों का बेना डुला
हर लेता उनकी थकान 

आता दशहरा और खेली जाती रामलीला 
सजती चौपाल भी और किए जाते फैसले 

चुप खड़ा देखता नीम, इस जग की लीला 
देखता,बदलती दुनिया और जग के झमेले 


तेज होती जा रही थी चाल,याद करते एक-एक पल.
अब मिलने को मन हो रहा था ,बहुत ही विकल
पर झूमता,इठलाता,खुद पर इतराता
कहाँ था वह नीम का पेड़??

खड़ा था,वहाँ  एक लिपा-पुता बेजान भवन
दंभ,अभिमान,अपने गुरूर में मदमस्त

सूरज भी भभक कर दिखा रहा था ,अपनी नाराज़गी 
पर नहीं थी, सर छुपाने को  
शीतल छाँव नीम की,ना ही वो नीम बयार 
,गाँव तो अनाथ हो गया हो जैसे.

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Rashmi Ravija मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
3 साल पहले

ऊसर भारतीय आत्माएं


रात्रि की इस नीरवता में

क्यूँ चीख रही कोयल तुम

क्यूँ भंग कर रही,निस्तब्ध निशा को

अपने अंतर्मन की सुन


सुनी थी,तेरी यही आवाज़

बहुत पहले

'एक भारतीय आत्मा' ने

और पहुंचा दिया था,तेरा सन्देश

जन जन तक

भरने को उनमे नयी उमंग,नया जोश.


पर आज किसे होश???


क्या भर सकेगी,कोई उत्साह तेरी वाणी ?

खोखले ठहाके लगाते, मदालस कापुरुषों में

शतरंज की गोट बिठाते,स्वार्थलिप्त,राजनीतिज्ञ में

भूखे बच्चों को थपकी दे,सुलाती माँ में

माँ को दम तोड़ती देख विवश बेटे में

दहेज़ देने की चिंता से पीड़ित पिता

अथवा ना लाने की सजा भोगती पुत्री में


मौन हो जा कोकिल

मत कर व्यर्थ अपनी शक्ति,नष्ट

नहीं बो सकती, तू क्रांति का कोई बीज

ऊसर हो गयी है,'सारी भारतीय आत्मा' आज.

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Rashmi Ravija मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
3 साल पहले

"लावारिस पड़ी उस लाश और रोती बच्ची का क्या हुआ,
मत  पूछ  यार,  इस  देश  में  क्या  क्या  न  हुआ

जल गयीं दहेज़ के दावानल में, कई मासूम बहनें
उन विवश भाइयों की सूनी कलाइयों का क्या हुआ

खाकी  वर्दी  देख  क्यूँ  भर  आयीं, आँखें  माँ  की
कॉलेज गए बेटे और इसमें भला क्या ताल्लुक हुआ

तूफ़ान तो आया  बड़े  जोरों  का  लगा  बदलेगा  ढांचा
मगर चंद  पोस्टर,जुलूस और नारों के सिवा क्या हुआ


हर मुहँ को रोटी,हर तन को कपडे,वादा तो यही था
दिल्ली जाकर जाने उनकी याददाश्त को क्या हुआ


जब जब झलका आँखों में व्यर्थ सा पानी 'रविजा'

कलम  की  राह  बस  एक  किस्सा  बयाँ  हुआ .

#काव्योत्सव #kavyotsav

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Rashmi Ravija मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी शायरी
3 साल पहले

गुल की खुशबू की
फिजां की बात करते हो
अमां तुम किस वतन के हो,
कहाँ की बात करते हो
कभी भूले से ना करना चर्चा,
कभी इन सिसकती हवाओं का
अगरचे लौट भी जाओ,
जहाँ की बात करते हो !!

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Rashmi Ravija मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी सुविचार
3 साल पहले

“I may not have gone where I intended to go, but I think I have ended up where I needed to be.”
― Douglas Adams,

Rashmi Ravija मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी शायरी
3 साल पहले

नींद से मेरा ताल्लुक ही नहीं बरसों से
ख्वाब आ – आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं

Rashmi Ravija मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी शायरी
3 साल पहले

दिन सलीके से उगा ,रात ठिकाने से रही
दोस्ती कुछ रोज,हमारी भी जमाने से रही