ज़िन्दगी कविता या कविता ज़िन्दगी यही सोचते हुए उम्र के पल गुजार दिए ,जो दिल देखता सुनता है लिख देती हूं .ज़िंदगीनामा वेबसाइट है मेरी और कुछ मेरी कलम से ब्लॉग काव्यसंग्रह 2 अपने और 15 सांझे पब्लिश हो चुके हैं . पर कलम अभी भी कहती है कि बहुत कुछ लिखना बाकी है .

तन्हा कोई चलता नहीं
ज़िन्दगी के सफ़र में
देखा जो गौर से तो
पाया तनहाइयाँ हमसफर हैं

दो की गिनती कुछ यूँ ...

दो पल का साथ
दो आँखे ..
दो हाथ ...
दो परिंदों का जोड़ा
और ...
दो रोटी का सवाल
आखिर क्यों
इतना अहम् है
दो का होना ..?

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एक सूरज "उम्मीद "का
उतरा है बर्फीली वादी में
गुनगुना रही हवा वह गीत
जिसकी धुन ,सहमी सी
वक़्त लिख रहा वही पन्ने
जिसके लफ्ज़ धुंधला कर बुन रहे एक कहानी
"परछाइयाँ " इन देवदारों की कह रही है
ज़िन्दगी , अभी भी इतनी" तन्हा तो नहीं !!"
#ranjubhatia

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बेनाम रिश्ते

बेनाम से
इस रिश्ते की गहराई
तब ले आती है
मेरे उदास होंठो पर
एक मीठी सी मुस्कान
जब तुम किसी
"पुराने टोटके" की तरह
अपनी बेख्याल, बेवजह बातों को
सिर्फ "मुझे"
अपने जहन में सोच कर
एक पल हंसाने को
लिखते हो
कहते हो !!
#ranjubhatia

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#काव्योत्सव2 #भावनाप्रधान
तुम्हारे होने का
एहसास ही
हरा भरा कर देता है
घर के ,मन के ,आँगन को
सिर्फ "देह "से कोई मौजूद हो साथ
यह सोच ही बे बुनयादी है
जो बसा हो
आत्मा के अंतस में
जीवन रस की तरह
वह कहाँ फिर दूर होता है....?
गवाह है यह लिखते हुए हर लफ्ज़
जिसके हर भाव में
सिर्फ रूप ही तुम्हारा है
#ranjubhatia

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#काव्योत्सव2 #प्रेम
कल रात हुई
इक हौली सी आहट
झांकी खिड़की से
चाँद की मुस्कराहट
अपनी फैली बाँहों से
जैसे किया उसने
कुछ अनकहा सा इशारा
मैंने भी न जाने,
क्या सोच कर
बंद किया हर झरोखा
और कहा ,
रुक जाओ....
बहुत सर्द है यहाँ
ठहरा सहमा है हुआ
हर जज्बात....
शायद तुम्हारे यहाँ होने से
कुछ पिघलने का एहसास
इस उदास दिल को हो जाए
और दे जाए
कुछ धड़कने जीने की
कुछ वजह तो
अब जीने की बन जाए !!

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#काव्योत्सव2 #प्रेम ( मातृ दिवस पर माँ के लिए)

शब्दों का संसार रचा
हर शब्द का अर्थ नया बना
पर कोई शब्द
छू न पाया
माँ शब्द की मिठास को

माँ जो है ......
संसार का सबसे मीठा शब्द
इस दुनिया को रचने वाले की
सबसे अनोखी और
आद्वितीय कृति

है यह प्यार का
गहरा सागर जो हर लेता है
हर पीड़ा को
अपनी ही शीतलता से

इंसान तो क्या
स्वयंम विधाता
भी इसके मोह पाश से
बच न पाये है
तभी तो इसकी
ममता की छांव में
सिमटने को
तरह तरह के रुप धर कर
यहाँ जन्म लेते आए हैं
#ranjubhatia

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#काव्योत्सव2 #भावप्रधान

मुक्ति की भाषा
"सुनो .."
तुम लिखती हो न कविता?"
"हाँ " लिखती तो हूँ
चलो आज बहुत मदमाती हवा है
रिमझिम सी बरसती घटा है
लिखो ,एक गीत प्रेम का
प्यार और चाँदनी जिसका राग हो
मदमाते हुए मौसम में यही दिली सौगात हो
गीत वही उसके दिल का मैंने जब उसको सुनाया
खुश हुआ नज़रों में एक गरूर भर आया,

फ़िर कहा -लिखो अब एक तराना
जिसमें इन खिलते फूलों का हो फ़साना
खुशबु की तरह यह फिजा में फ़ैल जाए
इन में मेरे ही ,प्यार की बात आए
जिसे सुन के तन मन का
रोआं रोआं महक जाए
बस जाए प्रीत का गीत दिल में
और चहकने यह मन लग जाए
सुन के फूलों के गीत सुरीला
खिल गया उसका दिल भी जैसे रंगीला

वाह !!....
अब सुनाओ मुझे जो तुम्हारे दिल को भाये
कुछ अब, तुम्हारे दिल की बात भी हो जाए
सुन के मेरा दिल न जाने क्यों मुस्कराया
झुकी नज़रों को उसकी नज़रों से मिलाया
फ़िर दिल में बरसों से जमा गीत गुनगुनाया
चाहिए मुझे एक टुकडा आसमान
जहाँ हो सिर्फ़ मेरे दिल की उड़ान
गूंजे फिजा में मेरे भावों के बोल सुरीले
और खिले रंग मेरे ही दिल के चटकीले
कह सकूं मैं मुक्त हो कर अपनी भाषा
इतनी सी है इस दिल की अभिलाषा..

सुन के उसका चेहरा तमतमाया
न जाने क्यों यह सुन के घबराया
चीख के बोला" क्या है यह तमाशा"
कहीं दफन करो ,यह" मुक्ति की भाषा"
वही लिखो जो मैं सुनना चाहूँ
तेरे गीतों में बस" मैं ही मैं "नज़र आऊं...

तब से लिखा मेरा हर गीत अधूरा है
इन आंखो में बसा हुआ
वह एक टुकडा आसमान का
दर्द में डूबा हुआ पनीला है.....

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#काव्योत्सव2 #प्रेरणादायक
कौन हो तुम ?

प्रश्न "अक्सर यह कई बार दोहराया 

पहचान ही खुद से खुद की 

कौन समझ पाया ?

झाँका ,मैंने आँखों में वक़्त की 

और धीरे से फुसफुसाया 

एक छवि न जाने किसकी 

नजरों में समायी 

दिल की बात  धीरे से लबो पर आई 

मैं हूँ एक नदिया ..

जो बहती है अपने ही भीतर 

ज़िन्दगी के हर मुश्किल मुकाम पर 

तुमने ही तो बहना सिखाया 

उदास जब भी हुआ मनवा 

तुमने हँसना सिखाया 

जब भी डगमग हुआ विश्वास मेरा 

तुमने ही मेरी इच्छा शक्ति को जगाया 

अब मुझसे क्यों करो सवाल तुम 

कौन हूँ मैं ? और यह खेल किसने रचाया 

मैं से मैं "की पहचान खुद की बातचीत से ही हो पर विश्वास खुद पर भी हो और उस शक्ति पर भी जो वक़्त की धारा में हमें बहाये चलता है 

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#काव्योत्सव2

एक पल 

यह है 

एक पल 

वह था 

अभी जो छुआ 

वो लम्हा भी "यही है "

एक लम्हा जो तब" चुराया "

वो भी वही था 

कुछ लम्हों से मिले 

शाम के ढलते सायों में 

कुछ को पाया 

सुबह के सुबकते उजालों में 

 बंद मुट्ठी खोल के देखा 

तो पाया 

ज़िन्दगी मुस्करा रही थी हथेली पर !!

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