रामानुज 'दरिया' गोण्डा अवध उत्तर प्रदेश।पिता जी - श्री श्याम सगुन तिवारी,माता जी श्रीमती कुसमा देवी, ग्राम-दरियापुर माफी,पोस्ट-देवरिया अलावल,जिला-गोण्डा l साहित्य का उद्देश्य सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना नहीं होता शर्त यह है कि सूरत बदलनी चाहिए।

भूले   से   भी   जान  भूल  मत  जाना
नाज़ुक  दिल  है  ज्यादा  मत  दुखाना।

आ  गया  हूँ  मैं धनवानों की कतार में
जान  तू  ही  है  मेरा  असली खजाना।

प्यार  तुमसे  है,  बस  यही  था  कहना
आता  नहीं  मुझे  ज्यादा  बातें  बनाना।

चाह  है  मिलने  की  हम  मिलेंगे जरूर
रोक सकेगा  कब  तक  बेरहम जमाना।

-रामानुज दरिया

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मैं लड़ता ही कब तलक उससे आख़िर
जिसने ख़ुद को मिटा दिया मेरे खातिर।

उसकी तो मजबूरियां  थी बिछड़ने की
इल्ज़ाम  बेवफ़ा  का लिया मेरे खातिर।

बेशक   था  मैं   मोहब्बत   का  दरिया
तरस गया हूँ  इक बूंद प्यार के खातिर।

जिस्म-फ़रोसी से निकाल कर लायी है
उससे ज्यादा उसका दिमाग था शातिर।

चलो  अब  इक   राह   नयी   बनाते  हैं
कुछ और नहीं ,अपने प्यार  के ख़ातिर।

दुनिया  का  एक  सच ये  भी  है 'दरिया'
भेंट   होती   रहती   है  पेट  के  ख़ातिर।

सेहत  गिरती   रही  मेरी  दिन  -  ब - दिन
पीछे  भागता  रहा   मैं  स्वाद  के ख़ातिर।

हर   कोई   तुम्हारा    हम   दर्द  है   दरिया
तरसोगे  नहीं   चुटकी  भर  नमक ख़ातिर।

उलझ  जाते  हैं  सारे  रिस्ते  सही  गलत में
लड़ना  पड़ता   है   यहां   प्यार  के ख़ातिर।

हर  फ़ैसला  हमारा  सही  हो ज़रूरी तो नहीं
बहुत कुछ करना पड़ता है व्यापार के ख़ातिर।

-रामानुज दरिया

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मेरी   रातों   की   नींद   उड़ाने   वाले
मेरी   सुबह   की  सलाम   ले  जाना।

खामोशियों   के  अनछुये   रिश्तों   से
इश्क़  का  तकिया  कलाम  ले  जाना।

जा रही  हो  तो  सुनो  इक बार सनम
साथ,अपने दिल का निज़ाम ले जाना।

तेरे  इशारों पे  नाचता  फिरता था जो
साथ अपने जोरू का गुलाम ले जाना।

-रामानुज दरिया

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उसके सिवा कुछ दिखायी नहीं देता
मेरी  आँखों  से  पर्दा  हटा  दो यारों।

बड़ा  मीठा  होता  है  स्वाद झूठ  का
स्वाद  सच  का  भी  चखा  दो  यारों।

दोस्ती के लिबास में दुश्मन भी आयेंगे
जरूरतों को थोड़ी सी हवा  दो यारों।

झोपड़ी  महल  बनते  देर  नहीं लगती
अपने  हौंसलों  को  जुबां तो दो यारों।

कितनों  महल  जमींदोज़ हो गये यहां
अहंकारों को अपने रवां होने दो यारों।

सारे  रस्मों  रिवाज़  तोड़  कर  आयेगी
इश्क़ को थोड़ा और जवां होने दो यारों।

-रामानुज दरिया

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मैं   लिखूं   क्या   तेरे   बगैर
कुछ  जंचता  नहीं  तेरे बगैर।

ख़्वाब  आते  नहीं  तेरे   बगैर
चेहरा  हंसता  नहीं  तेरे  बगैर।

साँसें  रुकी रुकी सी लगती हैं
दिल धड़कता  नहीं  तेरे बगैर।

मोती पलकों  पर  जमीं  सी है
पलकें झपकती नहीं तेरे बगैर।

सूना - सूना इश्क़-ए-अम्बर  है
रौनक़  आती  नहीं  तेरे  बगैर।

यूं  तो  मज़ा  बहुत  आ  रहा है
पर  गुमशुदा  हूँ  मैं  तेरे   बगैर।

-रामानुज दरिया

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कोई  राह  हमें  भी  दिखा दो
चलना  तो  हमें  भी सिखा दो

भटक रही है दर-बदर जिंदगी
किसी ठिकाने हमें भी लगा दो।

कब तक रहेंगे मजधार में ख़ुदा
किसी किनारे हमें भी लगा दो।

सोया सोया स है ये जुनून मेरा
अब तो नींद से हमें भी जगा दो।

बन्द क़िस्मत का ताला जो खोल दे
ऐसे जादूगर से हमें भी मिला दो।

जिस प्याले को पीकर अमर हुये
दो बूंद उसका हमें भी पिला दो।

लगाये रखा जिसने सीने से हमें
मिटा उसके सारे शिकवे गिला दो

तेरे आशियाने में रोशनी कम हो
मेरे दिल का हर कोना जला दो।

यूं तो मिले होंगे तुझे लाखों सनम
इक बार खुद से हमें भी मिला दो।

-रामानुज दरिया

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चीखती है कोख़ मां की बेटे की लताड़ से
ढह जाते हैं सारे किले चाहे बने हों पहाड़ से।

शर्म से झुक जाता है सर एक गुरु का, जब
चयन शब्दों का करता है शिष्य, तिहाड़ से।

चरण स्पर्श करवाती है सभय्ता अनजान से
असभ्य भी आते हैं किसी न किसी कबाड़ से।

हो सकता है कि अपनी सल्तनत पर गुमान हो
पर राई स है व्यक्तित्व,भले लगते हों पहाड़ से।

-रामानुज दरिया

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अब उनसे क्या कहना।।
की ओठों पर, अब भी लाली लगाती हो कि नहीं।
अब उनसे क्या कहना।।
की आंखों में काजल लगाती हो कि नहीं।
अब उनसे क्या कहना।।
की शाम होते छत पे जाती हो कि नहीं।
अब उनसे क्या कहना।।
की आईने के सामने मुस्कुराती हो कि नहीं।
अब उनसे क्या कहना।।
शाम मेरी याद दिलाती है कि नहीं।
अब उनसे क्या कहना।।
की तुलसी के नीचे दिया जलाती हो कि नहीं।
अब उनसे क्या कहना।।
गमलों को पानी पिलाती हो कि नहीं।
अब उनसे क्या कहना।।
सावन के मौसम में खुद को झुलाती हो कि नहीं।
अब उनसे क्या कहना।।

-रामानुज दरिया

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कुशल चापलूसों के बीच रहकर हम व्यक्तिगत विवेक भी खो बैठते हैं।

-रामानुज दरिया

बेड़ियां पैरों की मैं तोड़ न सका
चाह कर भी उसे मैं छोड़ न सका।

मुश्किलों का दौर जब भी गुलाबी हुआ
आंसुओं को भी मैं पोंछ न सका।

गुनाह - दर - गुनाह मैं बस करता रहा
अदालत-ए-इश्क मैं कभी सोंच न सका।

सुरमयी आंखों का कोई कसूर न था
रुख मयखानों का कभी मोड़ न सका

हथेलियां मोम की पत्थर सी हो गयी
जिम्मेदारियों का तबस्सुम तोड़ न सका

इश्क की तालीम पढ़ेंगे रांझा और हीर भी
सिल-सिले मोहब्बत को कोई रोक न सका।

ऐसा नही की कोशिश कमतर हुई 'दरिया'
पर बिखरे ऋण को कोई जोड़ न सका।
-रामानुज दरिया

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