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Rajesh Maheshwari verified कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
10 घंटा पहले

सूर्योदय

सूर्योदय हो रहा है
सत्य का प्रकाश विचारों की किरणें बनकर
चारों दिशाओं में फैल रहा है
मेरा मन प्रफुल्लित होकर
चिंतन मनन कर रहा है
प्रभु की कृपा एवं भक्ति का अहसास हो रहा है
समुद्र की लहरों पर
ये प्रकाश की किरणें पडती है
तो तन, मन हृदय एवं आँखें
ऐसे मनोरम दृश्य को देखकर
शांति का आभास देती है
सुख और सौहार्द्र का वातावरण
सृजन की दिशा में प्रेरित कर रहा है।
आज की दिनचर्या का प्रारंभ
गंभीरता से नये प्रयासों की
समीक्षा कर रहा है।
शुभम्, मंगलम्, सुप्रभातम्
हमारी अंतरात्मा
वीणा के तारों का आभास देकर
वीणावादिनी सरस्वती व लक्ष्मी का
स्मरण कर रही है
तमसो मा ज्योतिर्गमय के रूप में
दिन का शुभारंभ हो रहा है
सूर्यास्त होने पर
मन हृदय व आत्मा में समीक्षा हो रही है
और आगे आने वाले कल की
सुखद कल्पनाओ मे खोकर
जीवन का क्रम चलता रहा है
और चलता रहेगा।

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1 दिन पहले

माँ

माँ का स्नेह
देता था स्वर्ग की अनुभूति।
उसका आशीष
भरता था जीवन में स्फूर्ति।

एक दिन
उसकी सांसों में हो रहा था सूर्यास्त
हम थे स्तब्ध और विवेक शून्य
देख रहे थे जीवन का यथार्थ
हम थे बेबस और लाचार
उसे रोक सकने में असमर्थ
और वह चली गई
अनन्त की ओर

मुझे याद है
जब मैं रोता था
वह परेशान हो जाती थी।
जब मैं हँसता था
वह खुशी से फूल जाती थी।
वह हमेशा
सदाचार, सद्व्यवहार, सद्कर्म,
पीड़ित मानवता की सेवा,
राष्ट्र के प्रति समर्पण,
सेवा और त्याग की
देती थी शिक्षा।

शिक्षा देते-देते ही
आशीष लुटाते-लुटाते ही
ममता बरसाते-बरसाते ही
हमारे देखते-देखते ही
एक दिन वह
हो गई पंच तत्वों में विलीन।

आज भी
जब कभी होता हूँ
होता हूँ परेशान
बंद करता हूँ आंखें
वह सामने आ जाती है।
जब कभी होता हूँ व्यथित
बदल रहा होता हूँ करवटें
वह आती है
लोरी सुनाती है
और सुला जाती है।
समझ नहीं पाता हूँ
यह प्रारम्भ से अन्त है
या अन्त से प्रारम्भ।

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1 दिन पहले

प्रभु दर्शन

जबलपुर के समीप सुप्रसिद्ध पर्यटन स्थल भेडाघाट में एक महात्मा जी अपनी कुटिया में एकांत में रहते थे। वे किसी से भी अनावश्यक वार्तालाप नही करते थे। उनकी प्रसिद्धि दूर दूर तक थी। एक दिन कुछ छात्रों का समूह भेडाघाट घूमने के लिए गया हुआ था तभी किसी छात्र ने अपने सहपाठियों को महात्मा जी के विषय में बताया और उन सभी ने निश्चय किया कि स्वामी जी के दर्शन लाभ लेने हेतू चलना चाहिए।
वे सब उनकी कुटिया में पहुँचे और उनमें से एक छात्र ने बहुत विनम्रतापूर्वक उनसे एक प्रश्न पूछा कि महात्मा जी क्या आपने भगवान के दर्शन किए है ? महात्मा जी ने कहा कि क्या तुम अपने आप को धूल भरे आइने में देख सकते हो ? नही ना । वैसे ही प्रभु के दर्शन के लिए मन और हृदय में छाये हुये अज्ञान के धूल भरे आवरण को हटाना पडता है। त्याग, प्रबल भावना, मन की शुद्धि और हृदय में प्रेम व समर्पण हो तो अवश्य ही तुम्हारी व्याकुलता को देख ईश्वर अपने स्वरूप का आभास करा देंगे। आप लोग दिन रात परिश्रम करके पढाई करते हो तब जाकर परीक्षा में अच्छे अंको से उत्तीर्ण होते हो। तुम्हारी माता गृहकार्य को सुचारू रूप से संपन्न करके घर को व्यवस्थित रखती है, तुम्हारे पिताजी कठिन परिश्रम से धनोपार्जन करते है तब तुम्हारा भरण पोषण होता है।
हमें किसी भी कार्य को करने के लिए अथक परिश्रम और कार्य के प्रति समर्पण करना होता है तभी सफलता प्राप्त होती है। आप भी यदि मन से श्रद्धापूर्वक धर्म से कर्म करते हुए, समर्पण के साथ प्रभु की भक्ति करें तो निश्चित ही आपको ईश्वर के स्वरूप का आभास होगा। इतना कहकर स्वामी जी माँ नर्मदा की संध्या आरती के लिए प्रस्थान कर गये।

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2 दिन पहले

मोह

शहर के एक प्रसिद्ध व्यापारी श्री पोपटमल जी को कुत्तों को पालने का बहुत शौक था मानो वे उन्हें अपने से भी ज्यादा प्यार करते थे। एक दिन वे प्रातः काल भ्रमण के साथ साथ अपने कुत्तों को घुमा रहे थे तभी उन्होंने देखा कि एक साधु जो कि रामदास जी के नाम से प्रसिद्ध थे वे भी प्रातः भ्रमण का आनंद रहे थे। उनके पास आने पर पोपटमल जी ने उनका अभिवादन किया और उनके साथ साथ वार्तालाप करते हुए चलने लगे। उनसे धार्मिक विषयों पर चर्चा करते हुए पोपटमल ने स्वामी जी से कहा कि मैं मोक्ष चाहता हूँ और इस हेतु मैं क्या करूँ ?
स्वामी जी ने मुस्कुरा कर कहा यह कठिन विषय है और तुम पहली सीढी को छोडकर सीधे अंतिम सीढी पर पहुँचना चाहते हो। वह व्यापारी बोला आप मुझे उपाय तो बताए। उसकी हठधर्मिता देखकर स्वामी जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि मोक्ष प्राप्त करने के लिए ईश्वर से सच्चे मन से प्रार्थना करो। व्यापारी ने स्वामी जी से पूछा कि मैं ऐसा क्या करूँ की ईश्वर प्रसन्न हो जाए? स्वामी जी हंसते हुए कहा कि तुम जितनी सेवा, प्यार स्नेह व समर्पण अपने कुत्तों के प्रति रखते हो वैसा ही भाव तुम प्रभु के प्रति रखकर समर्पित हो तो प्रभु की कृपा स्वमेव हो जाएगी और तुम्हें मोक्ष का रास्ता दिख जाएगा।
मुझसे कल मिलना और बताना कि इस दिशा में तुमने क्या किया। दूसरे दिन पुनः प्रातः काल स्वामी जी से मिलने पर वह व्यापारी कहने लगा कि स्वामी जी आपने बहुत कठिन कार्य बता दिया है। मैंने अपने इन कुत्तों को बचपन से पाला है और मैं इन्हें भूल नही पाता। मेरा इनके अलावा किसी चीज में प्रयास करने पर भी मन नही लगता है। मैने मोक्ष की कल्पना यह देखकर छोड दी है। मुझे सांसारिक जीवन ही अब जीना है। स्वर्ग की अनुभूति मेरे दिल दिमाग से उतर गयी है। यह तो आप जैसे साधु संतो के लिए ही संभव हो सकता है। मुझे क्षमा करे मैने आपका समय इस चीज के चिंतन हेतु व्यर्थ ही नष्ट किया। स्वामी जी यह कहकर कि देर आयद दुरूस्त आयद अपने मार्ग पर आगे बढ गए।

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2 दिन पहले

आखिर वह क्या रहस्य था।

विकास एक प्रकृति प्रेमी व्यक्ति था जिसे कुत्तों से बहुत प्यार था। उसके पास अलशेसियन श्रेणी का एक कुत्ता था जिसे वह चीकू नाम से पुकारता था वह भी यह नाम सुनकर आत्मविभोर होकर जहाँ भी रहता था तुरंत अपने मालिक के पास भागकर आ जाता था। विकास की पत्नी कमला को जानवरों से कोई स्नेह नही था और वह उनसे बहुत डरती थी। एक दिन चीकू ने एक मामूली सी गलती पर अपने मालिक के नौकर का हाथ काट लिया जिससे उसे बहुत पीडा हुयी। इस घटना के बाद से कमला के दिमाग में यह बात घुस गयी थी कि चीकू के कारण परिवार में कोई ना कोई अप्रिय घटना घट सकती है और उसने विकास को चीकू को हटाने के लिये बहुत दबाव बनाकर स्पष्ट कह दिया कि या तो चीकू रहेगा या वह रहेगी। विकास ने अनेको बार अपनी पत्नी को इस विषय में समझाना परंतु वह उसे समझा पाने में असमर्थ रहा। कमला अपनी बात पर अडिग थी अंततः विकास को अपने सबसे प्यारे और वफादार कुत्ते चीकू को बहुत अनिच्छा के साथ एक गांव के पास छोडना पडा। अकेले होने के कारण चीकू की कुछ ही दिनों में मृत्यु हो गयी।
इस घटना के दस वर्ष बाद विकास को अपने परिवार के साथ प्रदेश के एक सुप्रसिद्ध अभयारण्य में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वे भी अन्य पर्यटकों के साथ साथ जीप सफारी में भ्रमण हेतु रवाना हुये रास्ते में उन्हें एक स्थान पर एक बहुत सुंदर और बडा शेर देखने को मिला। उसे देखते ही विकास के मुंह से अचानक चीकू स्वर का आर्तनाद हुआ। उसके मुँह से धीरे से चीकू शब्द निकला। उस शेर ने उस शब्द को सुनकर पीछे की ओर घूमकर देखा और देानो एक दूसरे की ओर टकटकी लगाये जैसे एक दूसरे में खो गये। ऐसा लगा जैसे उनमें आँखों ही आँखों में वार्तालाप चल रहा हो। यह दृष्य इतना भावपूर्ण था कि विकास और शेर तो इसमें मग्न हो गये परंतु बाकी के पर्यटक और शासकीय कर्मचारी भाग खडे हुए। अब उच्च अधिकारियों को इसकी सूचना प्राप्त होते ही उनके द्वारा बख्तरबंद गाडियाँ एवं सशस्त्र सुरक्षाबलों को भेजा गया। वहाँ पहुँचकर उन्होंने शेर को घेरने का प्रयास जैसे ही प्रारंभ किया वैसे ही वह शेर मानो विकास को अंतिम बार नमस्कार करते हुए अपनी पूर्ण शक्ति के साथ दहाडकर घने जंगल में चला गया।
विकास ने वन्य अधिकारियों से पुनः वहाँ जाने का निवेदन किया परंतु सुरक्षा की दृष्टि से उसके वहाँ जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। उस शेर की जांच करने के उपरांत यह पता हुआ की उसकी गिनती उस जंगल में मौजूद शेरों में नही थी। काफी प्रयास करने के बाद भी वरिष्ठ अधिकारी उस शेर के बारे में कुछ पता नही लगा सके। यह एक अद्भुत घटना थी जिसका संबंध पुनर्जन्म से था या महज एक इत्तफाक जिसका रहस्य आज भी बना हुआ है।

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4 दिन पहले

अमरता

रमेशचंद्र नामक व्यक्ति जो कि एक हाई स्कूल से प्रधानाध्यापक के पद से रिटायर हुये थे, उन्होने यह निर्णय लिया कि प्रतिवर्ष किसी शाला में गरीब बच्चों को अध्ययन हेतु स्कूल यूनिफार्म, किताबें एवं अन्य सुविधाओं की व्यवस्थाएँ प्रतिवर्ष करायेंगे और इसे गोपनीय रखते हुए उस शाला के व्यवस्थापकों को भी उनकी पहचान न मालूम पडे ऐसी व्यवस्था करके उन्होंने अपना सेवाकार्य प्रारंभ कर दिया। उन्होंने अपनी भावनओं और कार्यों को कभी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नही होने दिया। यहाँ तक कि उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाओं से शाला प्राचार्य अवगत तो थे परंतु उन्हें भी ऐसे सद्कार्य में लिप्त व्यक्ति के नाम, पता या पहचान की कोई जानकारी नही थी। यह कार्य निर्बाध गति से बिना किसी अवरोध के संपन्न हो रहा था।
एक दिन अचानक ही रमेशचंद्र जी का हृदयाघात के कारण स्वर्गवास हो गया। उनकी नातिन जो कि बचपन से ही रमेशचंद्र जी के साथ रहती थी, उसने उनके समस्त दस्तावेजों को सुरक्षित रूप से रख दिया था। एक दिन प्रातःकाल के समाचारपत्रों में कुछ बच्चों की मार्मिक अपील छपी थी कि एक सज्जन जिनके माध्यम से हमारे षिक्षा संबंधी सभी खर्चांे की पूर्ति होती थी, पिछले तीन महिनों से वह दान राशि नही प्राप्त हो रही है, यदि इसे तुरंत नही जमा करवाया गया तो अगले माह से हम सब के नाम शाला से काट दिये जायेंगे। यह पढकर रमेषचंद्र जी की नातिन चैंकी, तभी उसे याद आया कि उनके दादा जी की फाइलों को जमाते समय उसने एक फाइल में अनेक गरीब बच्चों के नाम एवं शिक्षण संस्थाओं के नाम देखे थे। कही ऐसा तो नही कि ये वही बच्चे हो।
वह फाइल लेकर उस शिक्षा संस्थान के प्राचार्य के पास जाती है और बच्चों के नामों का सत्यापन करने के बाद उसने यह सुविधा पुनः अपने स्वर्गीय दादा जी स्मृति में प्रारंभ करने का निर्णय लिया। वे सभी बच्चे जो इस सुविधा से लाभान्वित हो रहे थे, के साथ साथ अन्य सभी बच्चों एवं कर्मचारियों ने भरे हृदय से अपनी श्रद्धांजली रमेशचंद्र जी के प्रति समर्पित की। यह देखकर उनकी नातिन भाव विभोर हो गई और उसके मन में यह विचार आया कि व्यक्ति अपने जीवन में मान सम्मान] सेवा] सहृदयता] सद्कार्यों आदि गुणों से मृत्यु के पश्चात भी जनमानस के दिलों में सदैव जीवित रहता है। उसने भी अपने जीवन में यह प्रण लिया कि वह भी अपने दादाजी के बताये हुये पथ पर चलेगी।

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Rajesh Maheshwari verified कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कहानी
7 महीना पहले

स्वरोजगार



मैने प्रतिदिन प्रातः उसे समाचार पत्र बेचते देखा है। वह अभावों का जीवन जीता था, पर स्वाभिमानी था। रात में शिक्षा प्राप्त करने के लिए मेरे निवास पर आता था और अध्ययन करता था। एक दिन वह अपनी कडी मेहनत से पढाई में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ और मुझसे इनाम में एक साइकिल प्राप्त की। अब वह पूरे चाल के कपडे प्रतिदिन साइकिल पर ले जाता था और धोबी से धुलवाकर शाम को उसे वापिस पहुँचाकर धन कमाता था। दो वर्षों के बाद इस जमा पूंजी से उसने वाशिंग मशीन खरीद ली और स्वयं कपडे धोने का काम करने लगा। आज वह एक ड्रायक्लीनिंग की दुकान का मालिक है। इसके साथ साथ उसने एक नया काम भी चालू किया, वह प्रतिदिन आवश्यकतानुसार चाल के घरों का दैनिक जरूरतों का सामान लाकर पहुँचाने लगा। उसका यह व्यापार भी चल निकला।

आज वह कार में आता जाता है। उसने एक मकान भी खरीद लिया एवं उसका नाम स्वरोजगार रखा। आज भी वह ईमानदार एवं स्वाभिमानी है, अभिमान और घमंड से बहुत दूर है। वह कई ड्रायक्लीनिंग मशीनों का मालिक है पर दीपावली के दिन आशीर्वाद लेने अपने सभी पुराने ग्राहकों के पास जाता है। उसका जीवन प्रेरणास्त्रोत है एवं स्वरोजगार के माध्यम से अपने को अमीर बनाने का एक जीता जागता उदाहरण है।

देश में जनसंख्या की असीमित वृद्धि हो रही है। रोजगार के साधनों की अनुपलब्धता के कारण देश में बेरोजगारी बढ रही है। अब सरकार के पास भी इतने रोजगार और नौकरी उपलब्ध नही है जिससे तेजी से फैल रही बेरोजगारी को रोका जा सके। आज की परिस्थितियों में स्वरोजगार ही बेरोजगारी केा दूर करने का सशक्त माध्यम बन सकता है। यह इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

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7 महीना पहले

ईमानदारी



मैं अपनी पत्नी के साथ ट्रेन द्वारा मुंबई की यात्रा पर जा रहा था। उस समय ई टिकिट प्रारम्भ ही हुआ था। यात्री तो यात्री अनेक टी.सी. भी उसके नियम कायदों से पूरी तरह परिचित नही थे। एक ही ई टिकिट पर हम दोनो का आरक्षण था। मेरी सीट को कंफर्म हो गई थी लेकिन मेरी पत्नी की सीट अभी भी वेटिंग में चल रही थी तभी टी.सी. आया, उसने टिकिट देखा और बोला कि चूकि इस टिकिट की दोनो सीटें कंफर्म नही है इसलिए यह टिकिट कैंसिल मानी जाएगी। हमारी अनुनय विनय पर उसने दो सीटें हमें उपलब्ध करा दी लेकिन लेकिन दोनो का पैसा चार्ज कर लिया। हम लोग निश्चिन्त होकर यात्रा करने लगे।

उधन वह टी.सी. परेशान था। उसे समझ नही आ रहा था कि उसने जो किया है वह सही है या नही। कही उसने हमसे गलत रूपया तो नही ले लिया। उसने फोन करके अपने मुंबई कार्यालय से वस्तु स्थिति का पता लगाया। उसे पता लगा कि यदि उसके पास सीट थी तो उसे वह हमें निशुल्क देनी चाहिए थी और यदि चार्ज ही कर रहा था तो उसे केवल एक टिकिट का पैसा लेना चाहिए था। दो सीट का पैसा लेना तो पूरी तरह गलत था। यह पता लगते ही वह टी.सी. हमारे पास आया और उसने हमारा पैसा वापिस किया और क्षमा मांगी।

हम उसकी सज्जनता और ईमानदारी देखकर अभिभूत हो गए कि आज भी हमारे देश में ईमानदार और कर्तव्यपरायण नागरिक है जो अपना काम पूरी ईमानदारी और मुस्तैदी से कर रहे है। यदि वह चाहता तो रूपए अपने पास रख सकता था क्योंकि हमने उससे किसी प्रकार का विरोध नही किया था। हमने उससे पूछा कि आपने इतना कष्ट क्यों किया तो वह बोला यदि मैं यह पैसा गलत ढंग से आपसे ले लेता तो यहाँ तो ठीक है लेकिन भगवान के पास जाकर क्या जवाब देता। मैंने प्रार्थना में अपना सर झुकाया है परंतु शर्मिन्दगी से कभी सर नही झुकाया, जो मुझे झुकाना पडता। अब मैं निश्चिन्त हूँ कि मैने अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाया है।

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Rajesh Maheshwari verified कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कहानी
7 महीना पहले

सैनिक की पीडा



अरूणाचल प्रदेश का एक शहर है तवांग। यह भारत की अंतिम सीमा पर स्थित है। चीन के साथ युद्ध में हम पराजित हुए थे। इस शहर में शहीदों की स्मृति में स्मारक बना हुआ है। इसमें हम क्यों हारे इसके कारणों को दर्षाया गया है। उसमें दर्शाए गए कारणों में प्रमुख है तत्कालीन प्रधानमंत्री के पंचशील के सिद्धांत एवं विदेश मंत्री की अदूरदर्शिता तथा अनुभव का अभाव, चीन की ताकत को कम आंकना, हमारी सेना की तैयारी का न होना, हमारी संचार व्यवस्था एवं गोपनीय सूचनाओं को प्राप्त न करने की क्षमता इत्यादि।

इस युद्ध में हमारे अनेक सैनिकों ने बलिदान दिया। तवांग शहर का निवासी एक सैनिक अंतिम समय तक डटा रहा। उसने अपनी चौकी नही छेाडी और अंत में वीरतापूर्वक लडते हुए अत्यंत घायल हो गया। उसकी अस्पताल में यही अंतिम इच्छा थी कि देश का हर युवा इस हार का बदला लेगा एवं अपनी हारी हुई भूमि को पुनः चीन से प्राप्त करेगा। कुछ दिनों पश्चात उसकी मृत्यु हो गई परंतु उसकी आत्मा को आज तक शांति नही मिली। आज भी उस चौकी पर रात में वह सैनिक हाथों में बंदूक लिए नजर आता है। ऐसा प्रतीत होता है कि जब तक युद्ध में खोई हुई अपनी प्रतिष्ठा एवं भूमि को वापिस प्राप्त नही कर लेते तब तक उसकी आत्मा को शांति नही मिलेगी। सेना में तैनात जवान कभी कभी उसकी आवाज सुनते हुए ऐसा महसूस करते है कि वह वही कही पर मौजूद होकर अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए तैनात है। आज भी राष्ट्र के प्रति उसके समर्पण एवं बलिदान को याद कर हम अपने को गौरवान्वित महसूस करते है।

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Rajesh Maheshwari verified कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कहानी
9 महीना पहले

भ्रात प्रेम

एक शहर में रमेश और महेश नाम के दो सगे भाई रहते थे। उनके बीच में संपत्ति के बँटवारे को लेकर मतभेद थे जो कि इतने बढ़ गये थे कि उनमें आपस में बातचीत भी बंद हो गई थी।
एक दिन महेश एक दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया और उसे अस्पताल ले जाया गया। वहाँ पर चिकित्सकों ने उसका तुरंत आपरेशन करने का निर्णय लिया और इसके लिए रक्त की आवश्यकता थी। महेश का ब्लड ग्रुप बहुत ही दुर्लभ था जो कि बहुत तलाश करने पर भी उपलब्ध नही हो पा रहा था। जब इस बात की जानकारी रमेश को लगी तो वह तुरंत भागा भागा अस्पताल आया और अपना खून देने की पेशकश की क्योंकि उसका ब्लड ग्रुप भी महेश के ब्लड ग्रुप से मेल खाता था।
यह जानकर रमेश के पहचान वालों ने उसे समझाना शुरू किया कि तुम रक्तदान मत करो। यह तुम्हारा सगा भाई होते हुए भी तुम्हारे हिस्से की भी संपत्ति हडपने की फिराक में था। ऐसे व्यक्ति से इतनी सहानुभूति क्यों ? वहाँ पर महेश के हितैषियों ने भी उसके परिजनों को कहने लगे कि रमेश भाई होते हुए भी किसी दुश्मन से कम नही है। वह महेश के हिस्से की संपत्ति को भी हड़पना चाहता है। ऐसे व्यक्ति से कोई भी सहयोग लेना उचित नही है।
इतना बोलने के बाद भी रमेश ने अपना खून दिया और महेश ने उसे स्वीकार कर लिया और आपरेशन सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। अपने भाई को मुसीबत में देखकर उसके प्रति उमडे प्रेम ने दोनो के बीच के संपत्ति के बँटवारे के विवाद को सुलझा दिया और वे पुनः एक हो कर रहने लगे।

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