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उठाना खुद ही पड़ता है... अपना थका टूटा बदन लेकर ..

की जब तक साँसे चलती हैं...

कन्धा कोई
नही देता.....

इंसान को अपनी औकात भूलने की बीमारी है....

और कुदरत के पास उसे याद दिलाने की अचूक दवा...

आज उसने एक अजीब सवाल कर दिया मुझसे....

मरते तो मुझ पर हो फिर जीते किसके लिए हो..??

आप होते जो मेरे साथ तो अच्छा होता....

बात बन जाती अगर बात तो अच्छा होता....

सबने माँगा है मुझसे मुहब्बत का जवाब....

आप करते जो सवालात तो अच्छा होता.....

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अंजाम-ए-वफ़ा ये है जिसने भी मोहब्बत की...

मरने की दुआ माँगी.... जीने की सज़ा पाई....

वादा दोनों ने किया था.....जीना मरना एक साथ...

फिर कहीं ज़िस्म नीला हुआ.... कहीं हुए पीले हाथ.......

आज कोई नया ज़ख्म नहीं दिया उसने....

पता करो यारो....वो खैरयत से तो है....

सुनों......इतने भी प्यारे नहीं हो तुम.....

बस मेरी चाहत ने तुम्हें सर पे चढ़ा रखा है....

किस कदर अजीब है ये सिलसिला-ए-इश्क़.....

मोहब्बत तो कायम रहती है... पर इन्सान टूट जाते है....

तुम्हारे गुस्से की भी कम्बख्त आदत सी हो गयी है....

इश्क़ अधूरा सा लगता है....जब तुम गुस्सा नहीं करते....