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Priya Vachhani कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
3 महीना पहले

सुनो
और कुछ तो नही खोया मैंने
इक तुम्हें खोने के बाद
बस ज़रा लबों से हँसी खो गयी
नींद तो आती है मगर
कहीं सपने खो गए
दिल तो दे गए तुम वापस
मगर उसके अरमां खो गए
प्यार तो अब भी है मगर
बस अहसास खो गए
आँसू तो बेइंतिहा हैं मगर
फिर भी न जाने किसकी
तलाश है इन आंखों को
फूलों की खुशबू तो
बसी है फ़िज़ाओं में मगर
सांसे ढूंढती हैं उसी महक को
यूं भी नही के सब खो गया है
कुछ पाया भी है
होंठो को मिली भीगी मुस्कान
मिला यादों का ज़खीरा
ओस में भीगे अरमान
गजब का मिला अकेलापन
और बेमुरव्वत सी तन्हाईयां भी
साथ चलती हैं अब
मुहब्बत में मिली रुआवाईयाँ भी
यूं भी नही के सब खोया है मैंने
एक तुम्हें खोने के बाद
हाँ बहुत कुछ पाया भी है
बस एक तुम्हें न पाकर
प्रिया

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Priya Vachhani कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
9 महीना पहले

खुद से ही अपने आँसू छुपा रहे हैं कैसे कहें बिटिया
हम कैसे तेरी विदाई का सामान बना रहे हैं....
हर पल डर रहता है कहीं कोई कमी न रह जाए
कमी होने से ससुराल में तुझे कुछ सुनना न पड़ जाए
कहीं सोच पापा की परेशानी, तू अपना मन न मार जाए
ज़माने भर की खुशियां तेरे कदमो में लुटाना चाह रहे हैं
कैसे कहें बिटिया कैसे तेरी विदाई का सामान बना रहे हैं ....
आज तक प्राइस टेग देखनी वाली तेरी माँ
आज बस तेरी ही खुशीयों को देख रही है
मन की हर इच्छा पूरी करे तू बस यही सोच रही है
पापा भी तेरी पसंद का हर सामान दिलाना चाह रहे हैं
कैसे कहें बिटिया कैसे तेरी विदाई का सामान बना रहे हैं ....
जब मजाक - मजाक में लोग तुझसे कहते हैं
कितने दिन हैं शादी में, गिना तुझे चिढ़ाते रहते हैं....
सोच तेरी विदाई के क्षण हमारा मन सिहर जाता है
बेटी की विदाई का दर्द ,बेटी वाला ही समझ पाता है
लाख जतन करें फिर भी नयनों के कोर भीगे जा रहे हैं
कैसे कहें बिटिया कैसे तेरी विदाई का सामान बना रहे हैं ....
दुनियां की रस्मों को निभाना भी जरूरी है
बेटी की विदाई माँ - बाप की मजबूरी है
पर इतना याद रखना घर से विदा होगी तू
कभी न हमारे दिल से जुदा होगी तू
बेटी संग हम दामाद के रूप में बेटा पा रहे हैं
कैसे कहें बिटिया कैसे तेरी विदाई का सामान बना रहे हैं ....
प्रिया वच्छानी
#बेटीकीविदाई #माँपापा #दहेज #विदाईकीतैयारी

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Priya Vachhani कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
10 महीना पहले

खामोश छत
दरकती दीवारें
घुटती हुई चौखट
शोर मचाते बर्तन
कांटो के बोझ तले फूल
मुरझाया सा सूरज
खिसकती जड़ो की मिट्टी
बदला बदला सा है सबकुछ
न जानें क्यों पहले से अब
वो मंजर नहीं रहे
घर अब घर नहीं रहे।
प्रिया

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Priya Vachhani कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी शायरी
10 महीना पहले

डुबोकर दर्द की स्याही में जब कलम चलाई
घाव बनें नासूर तब कहीं कविता बन पाई।
प्रिया

Priya Vachhani कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
10 महीना पहले

सुनो न....
कई बार असमंजस में , मैं फस जाती हूं ...
क्या सही, क्या गलत समझ न पाती हूं
मेसेज करू या नहीं !! कही वो व्यस्त तो नहीं....
कहीं ज्यादा नजदीकी दूरी न ले आये ...
कही मेरा चुप रहना भी उसे अखर न जाये ...
बार बार मेसेज करने से मुझे डेस्परेट न समझे।।।
कही कुछ न कहने से मेरा कम इंटरेस्ट न समझे...
उफ्फ कितना काम मे वो व्यस्त रहता है...
ऐसा भी क्या काम, कि मुझसे दूरी सहता है...
पूरा दिन इसी सोच में बिताती हूं
कैसे कहूँ मन ही मन तुमसे कितना बतियाती हूं..
प्रिया वच्छानी

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Priya Vachhani कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
10 महीना पहले

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Priya Vachhani कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
10 महीना पहले

सुनो ....
आना तो है हमको पास
पर अभी कोई जल्दी नहीं....
भर जाने दो ज़ख्मो को
सूखकर बिखर जाने दो
नमक इन आंखों का...
उड़ जाने दो सारी महक
इन हवाओ में...
ताकि यादों के दरवाजे से
आ ना सके कभी कोई महक
नमक की परत को साथ ले
करने इन ज़ख्मों को नासूर...
सुनो.....
मुझसे मिलने से पहले
झाड़ लेना सारे पुराने
ख्वाबों की किरचन को...
कहीं ये किरचन नए रास्तों पर
नए ज़ख्मों की सौगात न दे जाए।
प्रिया

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Priya Vachhani कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी शायरी
1 साल पहले

मुक्तक हायकू

मेरी गलती , गिनने से पहले , ये काम करो
इक बार तो,आईने में खुद को ,निहारा करो
हासिल क्या है ,तुम्हें इस जहां में,ज़रा देख लो
उसके बाद , किसी और को तुम ,परखा करो ।
प्रिया

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Priya Vachhani कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
1 साल पहले

याद है एक छाते के नीचे
आधे आधे भीगते
अदरक इलाइची की
सौंधी सी महक को
वो आधी आधी प्याली
चाय में बांटना ...
किताबों के पन्नो में
मोर पंखों को सहेज
उन्हें तन्हाई में छूते हुए
एक दूजे की छुअन का
अहसास करना ....
शब भर जागना
तारों को गिनना
चाँद से बातें कर दिल की
खुद से शर्माना
मैंने अब भी संभाल रखा है
उन महकते पलों को
भीगते हुए इस ..
तकिये के गिलाफों में....
प्रिया

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Priya Vachhani कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
1 साल पहले

मेरे घर का आईना

मेरे घर का आईना भी
कितना झूठ बोलता है
आज खड़ी हुई इसके सामने
तो दिखाने लगा मुझे
मेरे बालों से झांकती
हलकी सी चाँदी
चेहरे पर उभरती
अनुभव की रेखाएं
हल्का रंग बदलती आँखे
उनके आस-पास बनते
काले से घेरे
चेहरे की परिपक्वता
मगर.......
कहाँ परिपक्व हुई मैं अभी
अब भी कभी-कभी जागता है
मेरे अंदर का बच्चा
जो करना चाहता है
बच्चों जैसी नादानियां
जिसमे छुपी हैं अब भी
बच्चों जैसी शरारतें
खेलना चाहता है मिटटी में
फिर उन्हीं दोस्तों संग
वहीँ झगड़ना, वहीँ खेलना
तितलियों को पकड़ना
मोर के पंखों को
किताबों में संजोना
न परवाह समय की
न फ़िक्र दुनियादारी की
बस चाहता है एक
उन्मुक्त सा जीवन जीना
बताओ........
कहाँ परिपक्व हुई मैं अभी
कितना झूठ बोलता है न
मेरे घर का आईना...
प्रिया

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