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मंदिर का अंदरूनी हिस्सा—धीमी अब्बर-लाल रोशनी, अगरबत्तियों की खुशबू हवा में फैली...
भारतीय संस्कृति में त्योहार केवल तिथि-त्योहार नहीं होते, वे हमारे रिश्तों की डोर...
ऋग्वेद सू्क्ति(55) की व्याख्या शतं इन्नु शरदो अन्ति देवाऋग्वेद --1/89/9भावार्थ--...
‘‘ओय अम्मा...ओय काकी...ओय दीदी...ओय मामी...! जरा घूंघट तो उठाओ!! कैमरे में आपलोग...
हर दस साल बाद लौटने वालाआरव उस पालने के सामने खड़ा था।उसकी आँखें बच्चे के चेहरे...
माटी से मुकाम तकबिहारी और सुमति की प्रेम कहानीबरगवां गांव की कच्ची गलियों में पल...
भाग एक: शौर्य रायचंद का औरा और उसकी एंग्जायटीमुंबई के सबसे महंगे और मॉडर्न बिजने...
अध्याय-२२अपूर्व की बात सुनकर विनय सोच में पड़ गया कि अपने भाई को दिए गए वचन को म...
वो पूर्णिमा की रात थी। चाँद कुछ ज़्यादा ही पास लग रहा था। आसमान भी बिल्कुल साफ़...
नौशाद इब्राहिम खान:"लेकिन गद्दार कौन हो सकता है?! इस कायरो मिशन का खाका सिर्फ एज...
कहानी - गाँव नहीं, भूतों का भंडार मैं हूँ रोहन शेखर, मैं 10वीं जमात का छात्र हूँ और दिल्ली में अपने परिवार के साथ रहता हूँ। मेरे छोटे भाई का नाम रोहन शेखर है, मेरी बड़ी बहन का ना...
अम्बरपुर शहर में समय जैसे सुस्ताने के लिए ठहर जाता था। यहाँ की सड़कें टेढ़ी-मेढ़ी थीं और हवा में हमेशा देवदार के पेड़ों की ताज़गी और गीली मिट्टी की सोंधी महक बसी रहती थी। इसी शहर क...
सुबह के छह बज रहे थे। शहर अभी पूरी तरह जागा नहीं था, लेकिन अंकित की ज़िंदगी में नींद के लिए जगह कब की खत्म हो चुकी थी। किराए के छोटे से कमरे में रखे एक पुराने से पलंग पर वह...
ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जो हमारी अक़्ल और समझ से बाहर होती हैं। आप मानें या न मानें, लेकिन उन बातों को नकारा नहीं जा सकता। वे अपने आप को सच साबित कर ही देती हैं।...
आरव एक साधारण सा युवक था। सुबह काम पर जाना, शाम को बाइक से शहर की सड़कों पर घूमना और रात को अपने छोटे से कमरे में थक कर सो जाना — यही उसकी ज़िंदगी थी। उसे नहीं पता था कि उसकी यह सा...
अमर – प्रेम – राज अध्याय 1 : अंधेरी रात, एक माँ और अधूरा सच बरसात की वह रात जैसे पूरे शहर पर बोझ बनकर उतरी थी। आसमान में बादल नहीं, बल्कि काले इरादे तैर रहे थे। कभी तेज़ बिजली...
धूप का हल्का पीला रंग खेतों की मेड़ों पर फैल रहा था। कहीं दूर एक बच्ची मिट्टी से सनी किताब लेकर भागती हुई आ रही थी। उसके नंगे पाँवों से धूल उड़ रही थी, चेहरे पर मासूम पसीना, मगर आँ...
गाँव की सुबह हमेशा की तरह शांत थी। हल्की धूप खेतों पर फैल रही थी, हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू घुली हुई थी। वह उसी गाँव में पला-बढ़ा था, सयुग जहाँ हर कोई एक-दूसरे को नाम से जानता...
सुनहरे चंदन के पेड़ों की लंबी कतारों के बीच, एक छोटी-सी गुफा थी—शांत, ठंडी और सुगंध से भरी हुई। वही थी चंदनी का घर, चंदनवन की रक्षिणी। न जाने कितने वर्षों से वह अकेले ही इस विशाल...
(बैलों का महान मेला – शुरुआत) लेखक राज फुलवरे अध्याय 1 – बैलों का सबसे बड़ा मेला सुबह का सूरज अभी धीरे-धीरे आसमान में चढ़ रहा था। एक हल्की-सी गुलाबी रोशनी खेतों पर फैल चु...
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