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Like to write But took a long pause from it Now wanna resume my writtings and would Like to publish them If found situable

खुद से खुद ही खुदा बन बैठे ।
जाने वो यह क्या कर बैठे ?

जिन्दगी के ख्वाब बहुत सुनहरे होते हैं ।
अपनो से मिले जख्म बडे गहरे होते हैं ।।
नमिता "प्रकाश"

खामोशियाँ तेरी हमें बेचैन करती हैं,
नजरें -इनायत फिर भी तस्कीन देती हैं।
चुपचाप यूँ ही जिन्दगी से चले जाना ,
गुस्ताखियों की खलिश गमगीन करती है।।
नमिता "प्रकाश"

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पिता क्या होता है ,यह अब हमने जाना।
ऊपर से सख्त ,दिल है मक्खन पहचाना।।
जहाँ की धधक से वो सदा दूर रखते ,
देते वटवृक्ष की छाया ,हैं शहद यह पुराना।।
नमिता "प्रकाश"

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क्या खता थी हमारी ,हक अदा कर दिया ।
देख कर उनके अश्क ,जुदा कर दिया ।।
नमिता "प्रकाश"

नजरों से उतर कर दिल में
वो दर्द बडा रूहानी है ।
हौले से छू ले मन को ,
यह प्यार बडा रुमानी है ।।
नमिता "प्रकाश"

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बहुत गहरी नदी, .....
बिना आवाज के बहती है ....।
बहुत गहरे दुःख .....
बिना आसुओं के होते हैं .....।।

मैसम -ए-मिजा़ज़ वो गुलजार कर गए ।
उफ्फ !वो मुस्कुरा कर कर्जदार कर गए ।।

धडकनों मे मेरी वो बस गया ऐसे ।
यादों को इत्र सा महका गया जैसे ।।

तराना-ए-जिन्दगी मेरी,
जिन्दगी-ए-तराना हो गई ।