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बने रौशन जहाँ सारा दिए ऐसे जलाएंगे
मनाओ ईद को अब तुम,दीवाली हम मनाएंगे।

हम अपनी एकता से इक नई दुनिया बसायेंगे
महोब्बत का तराना हर जुबाँ पर छोड़ जायेंगे।

दिलो को साफ पहले करलो तुम अपने महोब्बतसे
यकीनन एक दिन इस मे ही बस श्री राम आएंगे।

बचाना आपका जिम्मा जहाँ की बदनिगाही से
सुलगती रेत में हम प्यार का चश्मा बहायेंगे।

रखेंगे वेद की कोई रुचा हम अपने सीने में
तुम्हारे दिल में रबकी रहेमातोको छोड़ जायेंगे।

मेरे महेबुब मजहब सिखले कोई महोब्बत का
चलो फिर देखले कोई हमे कैसे लड़ाएँगे।

दिए की ज्योत में 'महेबुब' सबके गम भी जल जाएँ
चलो अबके दिवाली इस तरह से हम मनाएंगे।

महबूब सोनालिया

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उदास रहने से तो मुस्कुराना अच्छा है।

मैं मुस्कुराने लगूँ तो भी आंख भर आए !

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दोनों खामोश

रह कर भी

बातें करें।

कितनी दिलचस्प

हैं प्यारकी

बोलियाँ

-महबूब सोनालिया

मेरे हाथों में लकीरे ही नहीं अब साहिब
वक़्त से हाथ मिलाने की सजा पाई है।

महबूब सोनालिया

<div>इस से पहले की मैं खुद से भी हार जाऊँगा</div><div>ज़िन्दगी तेरे भी एहसाँ उतार जाऊँगा</div><div><br></div><div>मार दूं कैसे भला अपने ही बातिन में जमीर</div><div>इस तरह जीत के ऐ दोस्त, हार जाऊंगा</div><div><br></div><div>कुछ मेरे शेर, मेरी सोच, मेरे अफ़साने।</div><div>दे के दुनिया को यही यादगार जाऊँगा</div><div><br></div><div>मेरे मलबूस* पे रोती ही जायेगी दुनिया</div><div>और मैं जिस्म को हंस कर उतार जाऊँगा</div><div>*कपडे</div><div><br></div><div>हक़ बयानी* के तराने ही गा रहा हूँ मगर।</div><div>जल्द इस शहर से भी संगसार^ जाऊँगा</div><div>* सत्यनिष्ठ ^ लहूलुहान</div><div><br></div><div>ज़िन्दगी गम की हिफाजत में काट दी मैंने</div><div>मैं तो महबूब यूँ ही बेकरार जाऊँगा</div><div><br></div><div dir='ltr'>महबूब सोनालिया</div>

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