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प्रेम

तुमको प्यार किया क्यों? इतना
स्वयं नहीं यह जाना।
जलती रही अग्नि -सी खुद मैं,
तुमको ना पहचाना ।


दिल का कोई खाली कोना,
कर देता है पागल सा ।
उनको कौन कहे? समझाएं?
जीवन है प्रेम- पिपासा।


प्रेम? एक अभिशाप और,
चीत्कार भरा सपना है।
 मौन -मोन रह प्रेम -चिता में
तिल-- तिल कर तपना है।


धूं--धू कर जब चिता जलेगी
उनको भी तपना है।
प्रेम --अश्रु नयनो से झर -झर
तर्पण भी करना है ।।



इति

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उद्यान के हर फूल की किस्मत में,
वसंत हो ,यह जरूरी तो नहीं।
हर इंसान के भाग्य मैं,
किसी का प्यार हो

यह जरूरी तो नहीं।। 1 ।।

फूल के अस्तित्व के खातिर

कांटे चुभन देकर, बुराई मोल लेते हैं ।

पर फूल भी इन कांटों के

इस त्याग को समझे,

यह जरूरी तो नहीं।। 2।।

सच्चे प्रेमी अपने प्यार की खातिर,

खुद को ही मिटा लेते हैं ।

पर वह प्यार भी उस बलिदान को समझें

यह जरूरी तो नहीं।। 3।।


दीपको के जलने से, 

दिवाली जगमगाती है

पर दीपक भी बाती के 

इस प्राणोत्सर्ग को समझे

यह जरूरी तो नहीं ।। 4।।


विधाता की इस दुनिया में

सुख- दुख का बंटवारा है।

सुख-दुख के इस बाटे मैं

हर एक को सुख ही मिले।

यह जरूरी तो नहीं ।। 5।।



इति

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Dr Mrs Lalit Kishori Sharma कोट्स पर पोस्ट किया गया English विचार
3 महीना पहले

in this world we travellers meet, meet to depart and to pain others heart..
LMSHARMA

आदमी चौरासी लाख योनियों से पार होकर फिर मनुष्य जन्म लेता है । दुर्भाग्य है कि वो फिर से एक नई योनी ढूंढ ने लगता है।

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