नाम- लता तेजेश्वर 'रेणुका' जन्म - 28.03, ओडिशा, निवास-नवी मुंबई, 4भाषाओं में सृजन विधाएँ-कविता शेरो-शायरी संस्मरण लघूकथा कहानी उपन्यास, हाइकू, मुक्तक,5संकलन, 6पुस्तकें प्रकाशित,एक पुस्तक का संपादन 30विख्यात पत्रिका,अखबार ब्लॉग,वेबसाइट आकशवाणी औरराजस्थान रेडियो यू ट्यूबपर रचनाएं प्रसारित, 2राष्ट्रीय और रीडर्सचॉइस अवार्ड समेत 12सम्मान प्राप्त,राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रीय सम्मेलनों में भागीदारी, 'विविध भारतीय भाषा संस्कृति संगम' की अध्यक्षा, भारतीय भाषाओं के उत्थान में कार्यरत।latakottapalli@gmail.com

Lata Tejeswar renuka verified बाइट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
2 महीना पहले

#radical

दिव्यता
***********
सूरज का संसार है
धरती का उपवन,
जल वायु अग्नि दे रहे हिदायत
तेरा मेरा कुछ नहीं जग में
सब कुछ प्रकृति है जान।

समय तू है
उड़ान भी तेरा है
पंखी जब नीड छोड़ जाएगी
निश्चल हो जाएगा जग सारा।

संभल जा रे मानव
ना कुछ तेरा मेरा
जब तक जान है जी ले
कर्म, कर्तव्य, जीवन, रिश्ते
सब कुछ माया है
नित्य जो पूजे दिव्यता को
वही दिव्यता पावे।

©लता तेजेश्वर रेणुका

©लता तेजेश्वर रेणुका

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#Gandhigiri

सड़क पर घूमते एक लड़के को खिलौने बेचते हुए देखा। जिसका दाम 40रुपये था। मेरी बेटी मेघा के 30रुपये में पूछने पर उसने मना कर दिया। मैं पास खड़ी थी। तभी रास्तेके किनारे एक अँधा आदमी वैसे ही खिलौने लिए बेच रहा था। मेघा तुरन्त उसके पास गयी और पूछा,"अंकल ये कितने रुपये की है?" उसने कहा '50रुपये'। तब मेघाने मेरी ओर देखा। तुरन्त मुझसे 50रु लेकर उस अंधे के हाथ में दिया। अंधेने वहीं एक आदमी से निश्चित कर पैसे जेब में रखे। उस खिलौने लिए बेटीके चेहरे पर खुशी और संतृप्ति देख मैं आश्चर्यानंद में डूबी हुई थी।

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1 साल पहले

#kavyotsav -2
मेरी कलम

क्यों न जाने लगे ऐसा,
कोई करे मेरा इंतज़ार -
चातक जैसे निरिक्षण करती
बारिश की झंकार।
मेरी कलम ढूँढ़े मुझे,
पाँत करे बेकरार -
हाथ बढ़ाए पी लिया
जैसे अमृत का पनसाल।
झलक गई मेरे गले से
कुछ बूंदों का फनकार-
चांदनी रात में बहगया
कुछ शब्दों का चमत्कार।
अमृत जैसे शब्दों को
कलम से जब उतारा,
जैसे दिव्यास्त्र से छूटा
तीरों का फव्वारा।

मौलिक, लता तेजेश्वर रेणुका

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1 साल पहले

#kavyotsav -2
निर्झर

झर झर कंपमान है निर्झर तू,
द्रुतगामी मेघ से भी द्रुततर,
न कोई स्थान, काल, चराचर
न मानती कोई विघ्न, विलाप हलाहल।
ना पर्वत या कोई धरोहर
पुनः पुनः टकराती हुई पाषाण से,
असीम चुंबी प्रांत से निकल कर
न मानी कभी व्यथा, चिंतन, विराग
ऋषि, मुनि और गुणियों समान।
सकल चराचर की अमृत धरा है तू,
मराल मृदु दोर्लित मंदगामी तू कहीं,
शीतल जल प्रवाह कटितट को जब टकराए
बूँद बूँद जल राशि बिखरते
विचलित मन की प्यास बुझाए।
नारिंगना जैसी सर्पिल चाल, लचकाए, बलखाए-
नाट्य प्रावीण्य से भरपूर तब अंग
वन मध्ये नाचे हिरन जैसे
निर्झर झरती अविराम तू वैसे।
उग्र शिवजी के मस्तक से तू निकली
कभी प्रखर कभी सौजन्य भी
कभी प्रलय रौद्र और प्रचंड भी
कहीं शांत निम्नगा और प्रसन्न भी।

क्रोधित नागिन जैसी तू उछल कर
लांघती हुई सारी दीवार
तांडव करती उग्र शिव की तरह-
नित्य निठुर और निर्मम तू
निमेष मात्र, निकृंतन कर देती नगर नार।

कैसे वर्णन करे तेरी काया ?
तेरा अस्तित्व ही है जग का साया।
मौलिक, लता तेजेश्वर रेणुका

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1 साल पहले

#काव्योत्सव -2
आईना
*******
आईना हूँ मैं,
रोज सैकड़ों चेहरे आ खड़े हो जाते हैं
मेरे सामने कई सवाल लिए,
कुछ चेहरों में उदासी छाई होती है
कुछ चेहरों पर खुशी तो कुछ गम के साये
कोई पलकें ठपठपाते हैं
तो कोई गुर्राते नज़र आते हैं।
कोई असहनीय वेदना से सिहर उठता है
कोई गिरगिट की तरह रंग बदलता है
कोई मुस्कुराता है तो कोई प्यार से मुझे निहारता है
कोई चेहरे पे चेहरा लगाकर अपना असलियत छुपाता है
तो कोई संदिग्ध नजरों से देखता है
एक नन्ही-सी बच्ची कभी
आ खड़ी हो जाती है मेरे सामने
मासूमियत का आईना चेहरे पर लिए
जिन आँखों में छल-कपट अभी कोसों दूर है
सोचती हूँ क्या नसीब है मेरा
चेहरे तो बहुत दिखते हैं मगर इनमें से
कौन-सा चेहरा खुदमें उतारूं
या शून्य रह जाऊँ यूँ ही
लाखों में भी अकेले जब तक कि
टूट कर बिखर न जाऊँ मेरे नसीब की तरह।

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1 साल पहले

#kavyotsav -2
शहीद की वर्दी
मैं उस शहीद सैनिक के शरीर की वर्दी हूँ
जिस पर कई गोलियाँ छेद कर निकल गईं
रक्त सिक्त मेरे शरीर के पसीने में
बूंद-बूंद रक्त से मिल रही थी।
खून से भरी वर्दी की गंध दूर-दूर तक फैल रही थी
झाड़ियों में उसके प्राणहीन शरीर के टुकड़े
लटक रहे थे जो देख रहे थे उस सैनिक की
निस्तेज आँखों में करवट लेते कई सपने जिसमें थे
एक बेबस माँ का चेहरा
जो बेटे की बाट जोह रही थी, जिसकी सुर्ख आँखें
बेटे को एक नज़र देखने को तरस रही थीं
उन आँखों में था उसकी अविवाहित बहन की
शादी के सपने जिन्हें पूरा करने की जिम्मेदारियाँ थीं
उसकी आँखों में था सुनहरी शादी की जोड़े में
उसकी दुल्हन का चेहरा
जिसने डेढ़ साल पहले ही उसकी दरवाजे पर
लाल रंग की हथेली का छाप छोड़ा था।
उसकी नज़र देख रही थी तीन महीने की
मासूम बेटी की मुस्कान को
जिसे गोद में भरने को उसकी बाहें आतुर थीं।
सब से परे उन आँखों में लहरा रहा था
एक आज़ाद भारत की पताका
और वह गर्व से सैलूट दे खड़ा था सीने में गोली लिए
वो एक शरीर नहीं था
उसमें बसा था हँसता-खेलता पूरा एक देश,
जिसमें कई जिंदगियाँ जोड़ी थी
जो धरती पर मिट्टी का लेप लगाए
शान से सो रहा था।
लता तेजेश्वर 'रेणुका'

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1 साल पहले

#kavyotsav -2
शहीद की वर्दी
मैं उस शहीद सैनिक के शरीर की वर्दी हूँ
जिस पर कई गोलियाँ छेद कर निकल गईं
रक्त सिक्त मेरे शरीर के पसीने में
बूंद-बूंद रक्त से मिल रही थी।
खून से भरी वर्दी की गंध दूर-दूर तक फैल रही थी
झाड़ियों में उसके प्राणहीन शरीर के टुकड़े
लटक रहे थे जो देख रहे थे उस सैनिक की
निस्तेज आँखों में करवट लेते कई सपने जिसमें थे
एक बेबस माँ का चेहरा
जो बेटे की बाट जोह रही थी, जिसकी सुर्ख आँखें
बेटे को एक नज़र देखने को तरस रही थीं
उन आँखों में था उसकी अविवाहित बहन की
शादी के सपने जिन्हें पूरा करने की जिम्मेदारियाँ थीं
उसकी आँखों में था सुनहरी शादी की जोड़े में
उसकी दुल्हन का चेहरा
जिसने डेढ़ साल पहले ही उसकी दरवाजे पर
लाल रंग की हथेली का छाप छोड़ा था।
उसकी नज़र देख रही थी तीन महीने की
मासूम बेटी की मुस्कान को
जिसे गोद में भरने को उसकी बाहें आतुर थीं।
सब से परे उन आँखों में लहरा रहा था
एक आज़ाद भारत की पताका
और वह गर्व से सैलूट दे खड़ा था सीने में गोली लिए
वो एक शरीर नहीं था
उसमें बसा था हँसता-खेलता पूरा एक देश,
जिसमें कई जिंदगियाँ जोड़ी थी
जो धरती पर मिट्टी का लेप लगाए
शान से सो रहा था।
लता तेजेश्वर 'रेणुका'

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2 साल पहले

#LoveYouMummy
प्रिय माँ,
मैं ठीक हूँ। आप के घुटनों का दर्द कैसा है? आशा है भाई, दवाई समय पर देता होगा। माँ आपकी बहुत याद आती है। काममें फंसकर आपसे मिलने का अवसर नहीं मिलरहा। बहुत इच्छा होती है कि उड़कर आजाऊँ और आपके पैरों केपास बैठ गोद में सर रख सो जाऊँ। आपके हाथ से सिर पर तेल लगवाकर बहुत दिन हो गया है। आपके हाथ सिर पर रहती है तो पूरा ब्रह्मांड घूम आने की सुख मिलती है। माँ कुछ समय के लिए मेरे पास आजाओ ताकि मुझे आपकी सेवा का मौका मिले। आपके प्यारकी भूखी -आपकी बेटी लता।

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