जीवन मनुष्य की बहुमूल्य निधि है, पता नहीं कितने भिन्न भिन्न प्रकारों के जन्मों के बाद मनुष्य जीवन प्राप्त होता है। अपने आपको भाग्यशाली, मानकर ही जीवन को सही माप-दंडो के अनुरुप चलाने में साहित्य की अपनी विशिष्ठ भूमिका होती है। पेशे से वकील होते हुए भी बचपन से साहित्य के प्रति सदा अनुराग रहा है। कुछ सालों से लेखन के प्रति झुकाव बढ़ गया है। कोई जरुरी नहीं बड़े-लेखकों की श्रेणी में आऊ, पर अच्छा लिखूं, सुधार को सदा मान्यता दूँ। कोशिश भर ही समझे, मेरे लेखन को, और मेरा मार्ग-दर्शन करे। शुभकामनाओं के साथ,

Kamal Bhansali कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी सुविचार
2 दिन पहले

शीर्षक: सच-झूठ

एक झूठ रँगत बदल देती चेहरे की
नजरे बदल जाती साथ चलने वालों की

क्या है ऐसा सच में ? निखर जाता मुखड़ा
कहीं वो ही तो नहीं हमारे दिल का एक टुकड़ा

सच हर पल हसीन होता है जिन्दगीं के लिए
मटमैला हो जाता, झूठ से बहें पसीने के लिए

आसान होता झूठ का, निकलना समस्या के लिए
सच तकलीफ से बाहर आता, सही अस्तित्व के लिए

इतना कहना सही, झूठ की कोई उम्र नहीं होती
सच को आँच नहीं, सही है जग की ये किवदंती

झूठ बराबर पाप नहीं सच बराबर तप नहीं
सच हमें मंजूर नहीं तो प्रभु को झूठ पसंद नहीं

जिसके पास है वापस जाना, अगर सही होकर जाना
अपनों से झूठ, गेरों से कोई बहाना, कभी भी न करना
✍️ कमल भंसाली

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Kamal Bhansali कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी कविता
3 दिन पहले

शीर्षक: सर्दी खास होती

तमस सर्दी का गहराया
भास्कर कहीं नजर न आया
बर्फीली हवाओ ने कंपकपाया
खुश्बू, मौसम की ने बताया
देखों, सर्दी का सुहावना पल आया

पतों ने फूलों से कहा
कल तुम चले जाओगे
किसी गर्म गुलदस्ते में
सज के खिल जाओगे
खुबसुरत अंगुलियो का
तपिश भरा स्पर्श पाओगे
माहोल की मधुरता मे
मुस्कराते नजर आओगे

एक फूल सर्द होकर बोल "दोस्त"
मधुर से मधुरतम सर्दी
जिदगी की उष्णता है
पल पल दो पल की जिन्दगी
अहसास की अमरता है
क्योंकि,सच्चे रिश्तों की गर्मी पास होती
बन्दिशों में तो जिंदगी
उदास ही होती है
तभी तो सर्दी खास होती है
✍️ कमल भंसाली

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1 सप्ताह पहले

शीर्षक: नहीं

इस हसरतों वाले सँसार में
इंसान के हालात अच्छे नहीं
मुरादे इतनी बढ़ गई सँसार में
भगवान की भी हालत अच्छी नहीं

रिश्तों में अब कोई एतबार नहीं
प्रेम मे अब कोई पागल भी नहीं
मिजाज में अब कोई तस्वीर नहीं
जिंदगी में अब कोई हिस्सेदार नहीं

कौन है, कौन नहीं अब कोई फर्क नहीं
अर्थ की दुनिया में फुर्सत भी तो नहीं
जाने वाले तेरे कदमों के कोई निशाँ नहीं
शुकुन! अब कोई रोने वाला भी तो नहीं

तस्वीर दुनिया की में अब कोई रँग नहीं
किसी भी कहानी में अब कोई दम नहीं
आज की तारीख में कोई आश्वासन नहीं
"कमल" गौर कर, तुम भी तो कुछ नहीं
✍️ कमल भंसाली

-Kamal Bhansali

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1 सप्ताह पहले

शीर्षक: नव पथ
वक्त रुठा रहा, पर जिंदगी चलती रही
कहीं वफ़ा, कहीं बेवफाई थकाती रही

मुकद्दर का, अपना ही अंदाज था
मुझे अपने योंही चलने पर नाज था

कशमकश के, जब भी कोई क्षण आते
उन्हीं में से छण कर, कुछ गंभीर हो जाते

ये जीवन है, मन के बुलबुले कुछ समझाते
पंख बन कर, चिंतन के बिंदू, सुलझ जाते

काँटों की कितनी हस्ती ? फूल तो खिलते
मुस्कान की हल्की डाली, पर भी मुस्कराते

जीवन विशेष तो कदम मंजिल को तलाश ही लेते
गम की कहां औकात ? जो खुशी के आंसू रोक पाते

तलाश, मकसदों के लिए नव-पथ निर्माण करता
जीना एक कला है, दिल को, अब यही समझाता

ह्र्दयगार के भाव, मेरे स्वं चिंतन के जब दीप जलाते हैं
मंजिलों के ज्योतिर्मय पथ पर, कदम स्वतः बढ़ जाते है

✍️ कमल भंसाली

-Kamal Bhansali

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1 सप्ताह पहले

*जिंदगानी*

रोशनी चांद से भी होती
रोशनी सितारों से भी होती
पर अपनी क्षमतानुसार होती
दीप की लौ यही हमें समझाती

जिंदगी मुस्करातीं भी है
कभी कभी रोती भी है
हकीकत में ज्यादा हारती है
छोटी सी जीत का जश्न मनाती है

सुख की सुधा जब बरसती
जिंदगी लहलहाती
दुःख की घटा जब छाती
जिंदगी कहराती
दस्तूर अपने जीने के
बेखूबी से निभाती

भूले नादान करते
समझदार इसे जी ते
बताओ,उन्हें क्या कहते ?
जो इसे रोज कंधों पर ढो ते

इंसान की छोटी सी कहानी
उसी का नाम है, जिंदगानी
दावा नहीं किस ने पहचानी
न मैने, न तुमने कभी इसे जानी
✍️ कमल भंसाली

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1 सप्ताह पहले

विश्वास*

"उससे हमनें कहा, अपनी वफ़ा पर जरा गौर करे
जबाब आया दिल पर दरवाजा नहीं, माफ करे
अगर नहीं चाहत पर विश्वास, खुदा आपकी खैर करे
शंका है अगर इनायत पर, तो दूसरे दिल की सैर करे"
✍️ कमल भंसाली

-Kamal Bhansali

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1 सप्ताह पहले

शीर्षक: कभी तो

कभी तो कुछ ऐसे ख्याल आये
जिंदगी को कुछ हसीन पल मिल जाये
वो हँसे और हम खिलखिलाये
कभी तो....

गम को क्या कहे, हम सोचते रह गये
कम कर ते, तो ये और बढ़ जाये
पहेली है जिंदगी, कैसे समझा जाये
कभी तो....

कल के ख्याल में आज को ढूंढ रहे
साँसों को चाहतों का जहर पिला रहे
हम खुद कितने अनजान हो रहे
कभी तो.....

चाह स्वतन्त्र की कितनी भारी हो रही
मौत भी दबे कदमों से निहार रही
कटी पतंग की डोर फिसल रही
कभी तो....
✍️ कमल भंसाली

-Kamal Bhansali

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2 सप्ताह पहले

शीर्षक: हाल-बेहाल

बड़ा शौक था, जिंदगी तुझे सजाने का
फिजा को रास नहीं आया ऐसा करने का

दयार ए बहार में कुछ ऐसा घुल आया
हर रंग तेरा फीका पड़ने को हो आया

ये कैसा सितम है बदलते मौसम प्यार का
साँसों को डर है बिखर कर तार तार होने का

खुदगर्ज हुई नियत न समझे मतलब एतबार का
नब्ज क्या बिगड़ी ? नज़रिया बदला गया यार का

शिद्दत से बढ़ता रोग दे रहा दूर रहने का अहसास
प्यार का जलवा भी भूल गया आलिंगन का विश्वास

नाजुक सा दर्द कर रहा बेहाल, प्यार हुआ फटेहाल
तन्हा हुआ दिल देख रहा खुद का हुआ हाल- बेहाल
✍️ कमल भंसाली

-Kamal Bhansali

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3 सप्ताह पहले

*तमन्ना*
कुछ बात है तेरे आने में
वरना हम इँतजार कैसे करते ?
महफिल में तुम्हारी खूबसूरती
के हजारों चर्चे होते है
वरना दिल को बीमार कैसे करते?

कहते है खुशनुमां पल
की कोई हसीन तस्वीर हो
न भूलने वाली याद हो
वफ़ा की चाहत कोई चाँद हो
वरना हम वक्त योंही बर्बाद कैसे करते ?

दो लफ्जो में कह देते
तुम्हारी अदाए कत्ल से कम नहीं है
वरना हम चुप कैसे रहते ?
सुना था साथ तुम्हारा
किसी जन्नत से कोई कम नहीं है
वरना मरने की तमन्ना हम कैसे रखते ?
✍️कमल भंसाली

-Kamal Bhansali

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3 सप्ताह पहले

तमाम उम्र ये सोच भारी रही
की उनकी जुल्फों में मेरी उम्मीदें
उम्र भर कश्मशाति रही
बेपरवाह सी उनकी उँगलिया
अपने केशुओं में और भी उलझाती रही
बेबस हुई मेरी निगाहे
उनकी इनायत ढूँढती रही
खुद को इतना बेअसर न करना था
इस सोच में जिंदगी गुजरती रही
✍️ कमल भंसाली

-Kamal Bhansali

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