All is well .......

झुकने का अर्थ यह कदापि नही होता ,
कि आपने "सम्मान" खो दिया
हर कीमती वस्तु को उठाने के लिये झुकना ही पड़ता
है ,
" प्रभु " एवं "बुजुर्गो" का "आशीर्वाद" इनमे से एक है!

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ना दूर रहने से टूट जाते है
और ना पास रहने से जुड़ जाते है ,
रिस्ते तो एहसास के वो धागे है
जो याद करने से और मजबूत हो जाते है ।

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विचार हो ऐसा जो सकारात्मक हो ।
मन हो ऐसा जो इच्छा रहित हो ।।
दिल हो ऐसा जो दानी हो ।
आख हो ऐसा जो दूसरो के दुख दर्द हो सके ।।

हाथ हो ऐसा जो दूसरो के काम आ सके ।
पैर हो ऐसा जो दूसरो का बोझ उठा सके ।।
सेवा करो इतना जिसकी कोई सीमा ना हो ।
बोलो ऐसा जो दूसरो को ज्ञान दे सके ।।

कपड़ा हो इतना जो तन ढक सके।
घर हो उतना जिसमे रह सके ।।
भोजन करो ऐसा जो सात्विक हो ।
सामान हो इतना जो उपयोग हो सके ।।

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अपने घर में सुख और शान्ति का ऐसा माहौल बनाए ।
जिसको पड़ोसी के घर में भी महसूस किया जाए ।।

चिट्ठी का संदेश मोबाइल को :

मेरा भी टाइम आयेगा
जब डाकिया बाबू मुझे लाएगा ।
परिवार को एक साथ बैठाएगा
जब अपना पैगाम सुनाएगा ।
सभी रिश्तों नातों का हालचाल बतायेगा
कभी हसायेगा कभी रुलायएगा

मेरा भी टाइम आयेगा
परिवार के लिये खुशियाँ लाएगा
जब बेटे का नौकरी का लेटर आयेगा ।
माँ बाप की उदासी को दूर करेगा
जब बेटा मनी ऑर्डर भेजवायेगा।

मेरा भी टाइम आयेगा

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रात हुई जब शाम के बाद! तेरी याद आई हर बात के बाद! हमने खामोश रहकर भी देखा! तेरी आवाज़ आई हर सांस के बाद!

याद मीठी सी दिला कर चले गये,
दिल हमारा अपने साथ उठाकर चल गये.
सब महफ़िल देखती ही रह गयी,
वो मस्त आँखो से पिलाकर चले गये. -

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रेत पर नाम कभी लिखते नहीं;
रेत पर नाम कभी टिकते नहीं;
लोग कहते है कि हम पत्थर दिल हैं;
लेकिन पत्थरों पर लिखे नाम कभी मिटते नहीं!

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अर्ज किया है...

वो तुम्हें Dp दिखाकर गुमराह करेगी,

मगर तुम आधार कार्ड पर अड़े रहना।

मकान चाहे कच्चे थे
लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे…
चारपाई पर बैठते थे
पास पास रहते थे…
सोफे और डबल बेड आ गए
दूरियां हमारी बढा गए…
छतों पर अब न सोते हैं
बात बतंगड अब न होते हैं…
आंगन में वृक्ष थे
सांझे सुख दुख थे…
दरवाजा खुला रहता था
राही भी आ बैठता था…
कौवे भी कांवते थे
मेहमान आते जाते थे…
इक साइकिल ही पास था
फिर भी मेल जोल था…
रिश्ते निभाते थे
रूठते मनाते थे…
पैसा चाहे कम था
माथे पे ना गम था…
मकान चाहे कच्चे थे
रिश्ते सारे सच्चे थे…
अब शायद कुछ पा लिया है,
पर लगता है कि बहुत कुछ गंवा दिया…
जीवन की भाग-दौड़ में –
क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है?
हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी,
आम हो जाती है।
एक सवेरा था,
जब हँस कर उठते थे हम…
और
आज कई बार,
बिना मुस्कुराये ही
शाम हो जाती है!!
कितने दूर निकल गए,
रिश्तो को निभाते निभाते…
खुद को खो दिया हमने,
अपनों को पाते पाते…

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