મોઘમ ઈશારામાં સમજો તો સારુ, શબ્દોનો શણગાર મને ના ફાવે...

मुख़्तसर हो चला है इश्क अाहिस्ता अब,
खो रहा है असर लब्ज-ए-रूह भी अपना।

काफिला हाला कि खूब रखता हूं आसपास,
अकेला रहता हूं अंदाज-ए-जज़्बा-ए-बयाँ से।

मलाल ये नहि कि उसने हमे खारिज़ कर दिया,
रंजिश इस बात पर है कि बाद मे वो बहोत रोये होंगे।

बचे-कूचे चंद अल्फाज़ जोड़ लाया हूं
एक टूटे हुए रिश्ते को संजोने आया हूं।

काफी खस्ता हालत हो चली है मरीज़-ए-इश्क की,
मशरूफ़ है आलमे हकीमी ईलाज-ए-दर्द-ओ-ग़म मे।

मुद्दआ कुछ खास नहि था बहस का,
नैना चार मिल गये आपस मे बेवजह।

शिकायत रहती है अक्सर खामोशी की,
ये तो देखो प्यार भी है कितना बेसुमार।

किया है और करेंगे इन्तज़ार तमाम उम्र,
इस दिल को अब और काम भी क्या है।

यूं ही कटता रहा सफर जिंदगी का अनवरत,
अपने ही बिछड़ते रहे अक्सर जीने की राह मे।

चंद साँसे तु महफूज़ कर दे ए जिंदगी,
आखिरी रस्म बाकी है उनसे मिलने की।