મોઘમ ઈશારામાં સમજો તો સારુ, શબ્દોનો શણગાર મને ના ફાવે...

मुकद्दर मे मेरे सिर्फ 'मेहनत' लिख दे मालिक,
बाकी का काम मै खुद देख लूंगा।

हर साजिश के पीछे दुश्मन का हाथ हो ये लाजमी तो नहि,
अजिज दोस्त भी बखूबी कर लेते है ये काम कई बार!

क्यूं हमे वफा के वास्ते दिए जा रहे है,
जिक्र करते है हर बात पर ये काफी नहि!!

हम तो पहले भी तन्हा थे आज भी है,
बीच मे कुछ तसल्लीयाँ भी मिली थी।

सुमार हो कुछ इस तरह से जिंदगी मे,
रंजिश भी है और चाहत भी है तुम से।

जिंदगी निजी अहसासो मे जी जाती है,
लफ्जों मे तो सिर्फ कहानियाँ लिखी जाती है।

हर जिंदगी का मकसद सिर्फ मुहब्बत नहि होता,
पर मकसद आसान लगते है जब मुहब्बत होती है।

सुमार कर लो अपने अहसास मे गम-ए-दुनिया अपनों की,
फिर ये ना हो कि गम जताने के लिए अल्फाज ढूंढते रहे।

दास्ताँ-ए-इश्क है ये कोइ अलफाजों की अलमारी नहीं,
रूह से निकली हर आह बयाँ करती है हश्र दिल का..!

महसूस कर लिया होता गर अहसास को मेरे,
आज अल्फाजों मे ढूंढने की कोशिशे ना होती।