I am reading on Matrubharti!

कहाँ से लाऊं मैं इतना सबर,

तुम थोड़े से क्यों नहीं मिल जाते l

कभी मुस्कुराती आँखें भी कर देती है कई दर्द बयां,

हर बात को रो कर ही बताना जरूरी तो नहीं होता l

कुछ पल का साथ दे कर तुमने ,

पल-पल के लिए अपना मोहताज कर दिया l

घूँघट, हिज़ाब,नकाब ग़ालिब का दौर था ,

फोन पे ब्लॉक की ऑप्शन है आजकल ।

तन्हा कर गई वो मुझे सिर्फ इतना कह कर,

सुना है मोहब्बत बढ़ती है बिछड़ जाने के बाद l

हम दोनों ही धोखा खा गये ,

मैंने तुम्हे,
औरों से अलग समझा ,

और तुमने मुझे ,
औरों जैसा समझा l

काश... एक ख्वाहिश पूरी हो इबादत के बगैर ,

वो आकर गले लगा ले, मेरी इजाजत के बगैर l

गर्दिश तो चाहती है तबाही मेरी ,

मगर.......

मजबूर है किसी की दुआओं के सामने l

तुम चाहे बन्द कर लो, दिल के दरवाज़े सारे,

हम दिल में उतर जायेंगें, कलम के सहारे

किस काम की रही ये
दिखावे की ज़िंदगी,

वादे किए किसी से,
गुज़ारे किसी के साथ।