जन्म-1 जनवरी 1952,शिक्षा-एम ए,बी. एड.,पीएच.डी.,डी.लिट्,अब तक सात पुस्तकें प्रकाशित(कविता-दिशाएँ मौन,वनजा,अक्षर अक्षर ब्रह्म /लघुकथा-चौधरी धनीराम सिंह/आलेख-लागी लगन,धनमंती,डॉ आर बी भण्डारकर संचयिता /देश की अनेक प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ,निबन्ध,कहानी,लघुकथा,व्यंग्य और आलेख आदि प्रकाशित/म प्र शासन में व्याख्याता,प्राचार्य,जवाहर नवोदय विद्यालय में प्राचार्य/दूरदर्शन में विभिन्न पदों पर रहकर उपमहानिदेशक पद से सेवा निवृत्त/अब स्वतंत्र लेखन.कई पुरस्कार व सम्मान प्राप्त.

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8 महीना पहले

# काव्योत्सव 2


# प्रेरणादायक-


       * मैं अकेला *

             - डॉ आर बी भण्डारकर


अकेला चला था मैं।

सोचा था-

लोग जुड़ते जाएँगे, कारवाँ बनता जाएगा


लोग जुड़ते रहे,पर  कारवाँ नहीं बना,

'मेरे' स्वार्थ ने,'मेरी' ईर्ष्या ने,अहम् ने

टिकने नहीं दिया किसी को।


'मैंने' स्वार्थ साधा

'लोगों' ने स्वार्थ साधा,

लोग जुड़ते रहे;

स्वार्थ सधते गए;लोग हटते गए।


कुछ यों ही बन गए दुश्मन

अहम् ने मरोड़े कान

दुश्मनी दिन-दूनी,रात चौगुनी होती गई।


कैसा बेढब जमाना ?

सत्य कुचल गया

नैतिकता ठिठक गई;

लोग गुस्साए,चिल्लाए और सहम गए।


पीछे है निविड़ अंधकार

आगे घोर निराशा;

कब तक जिएँगे

लिए एक रौशनी की आश?

दिखते तुलसी भी

अब तो उदास;

फिर भी मन में है भरी-पूरी आश।

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#kavyotsav2 # motivational




# काव्योत्सव:-


# प्रेरणादायक-


           * आह्वान *

                     - डॉ आर बी भण्डारकर


केवल पत्नी ही मत समझो

मत उसको यों व्यंग्य बनाओ;

नारी तो जननी होती है

मत उसका उपहास उड़ाओ।


कविता तो कविता होती है

मत उसको चुटकुला बनाओ;

हास्य-व्यंग्य तो हास, व्यंग्य है

यों मत फूहड़ता फैलाओ।


भावी पीढ़ी के सर्जक बन

साधु-जनो ! गरिमा अपनाओ;

संस्कार अच्छे हों,शुभ हों

कुछ ऐसी तरकीब चलाओ।


रवि से व्यापक पहुँच कहाती

तेज सूर्य-सा अब फैलाओ;

कवि-मन सत्यम् ,शिवम् ,सुन्दरम्

करुणा,शांति ध्वजा फहराओ।


घिरता घोर अंधेरा देखो

"महासेन" को मत झुठलाओ;

जगमग, जगमग हो मानवता

साधु जनो ! शुभ-दीप जलाओ।


विश्व-शांति हो जगत बन्धुता

घर-घर यह माहौल बनाओ;

जियो और जीनो दो सबको

ऐसा शुभ संदेश चलाओ।

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#kavyotsav2 # motivational

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8 महीना पहले

# काव्योत्सव:-


# भावना प्रधान-

       *  क्या शीर्षक दूँ कविते तुम्हें *

              - डॉ आर बी भण्डारकर


ये बन्द,धरने,प्रदर्शन,रेलियाँ

शिगूफे हैं उनके,स्टंट हैं उनके

पॉपुलर होने के लिए।

मन्नू तुम भी तो खूब

एक्सपर्ट हो गए हो इनमें

सब जानते हैं तुम्हें;

कहते हैं-

सक्रिय कार्यकर्त्ता है वह,

भावी नेता है वह;

तुम भी तो लगे रहते हो जी-जान से इन्हीं में।


मन्नू ! सच बताओ

कहाँ से सीखा तुमने यह सब

इतनी छोटी-सी उमर में?

मुझे खूब याद है

जब तुम अपनी माँ के गर्भ में थे

तब मैंने ऐसी कोई कहानी भी तो

नहीं सुनाई थी,तुम्हारी माँ को

और आज भी मैं इन सबकी

ए, बी,सी ,डी भी नहीं जानता हूँ।

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मन्नू ! तुम इन सब कामों को छोड़ दो;

मन्नू जाते ही हो, तो जल्दी लौट आया करो !

कितनी बार,कितनी तरह से

समझाया माँ ने तुम्हें

पर तुम कान ही नहीं धरते हो।

सच मन्नू,तुम्हें देर हो जाती है

तो तुम्हारी माँ बिलबिलाने लगती हैं;

तुम्हारी छोटी बहिन

बिलख-बिलख कर रोने लगती है।


जब तुम लौटते हो,शाम को

हँसते, गुनगुनाते,

तुमने देखा होगा?

सबके चेहरे खिल जाते हैं;

सब भूल जाते हैं,उलाहने।

माँ मन ही मन सुस्मित

ताना देतीं हैं-

देर कर ही दी,कब से बाट जोह रही हूँ

मैं और लाली बिटिया भी।


"माँ चिंता मत किया करो

कुछ नहीं होता है;

कुछ पाने के लिए कुछ करना पड़ता है,

कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है।"

मैं ठगा-सा सुनता रहता हूँ,सब कुछ।

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आज सुबह से ही चला गया है मन्नू

बड़ी रैली है न ,

उनके सबसे बडे नेता आ रहे हैं।

द्वार तक निकलते -निकलते

माँ खिलाती जा रही थी कुछ;

अरे बेटा ! नाश्ता तो करता जा।

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आज कुछ जल्दी ही आ गया था

सांध्य समाचार पत्र;

भरे पड़े थे,बड़े नेता के चित्र,

भाषण के अंश।

बॉक्स में था एक समाचार-

"रैली में भीड़ बेकाबू

पुलिस ने आँसू-गोले फोड़े,

लाठियाँ भाँजी, फिर

गोलियाँ चलाई;

भगदड़ मची

कुछ दबकर,कुछ कुचलकर मरे,

कुछ पुलिस की गोली से।"


फिर उसी में छपा था,पुलिस का बयान-

"उन्होंने किसी को नहीं मारा

सभी उपद्रवियों की पत्थर-बाजी से मरे;

केवल सात मरे,सत्तर घायल हुए हैं।"


एक चित्र देखकर मैं सन्न रह गया,

कलेजा मुँह को आ गया-

हाय मन्नू! आह मन्नू !!

+    +   +   +   +   +   +   +   +

"कुछ नहीं देखते हो

मन्नू अभी तक नहीं आया है,

सदा अपने आराम की ही पड़ी रहती है तुम्हें।"

पत्नी के बिलखन-भरे,कुछ कर्कश-से स्वर

कान में पड़े;

तंद्रा टूटी,हतप्रभ मैं।

बिटिया बोली-

" भैया आता ही होगा माँ

रैली तो कब की खतम हो गयी है,

शायद मेरी किताबें लेने चला गया होगा भैया,

सवेरे कह रहा था

आज शाम को निश्चित ला दूँगा

तेरी किताबें।"


किंकर्त्तव्यविमूढ़ मैं

कैसे बताऊँ

मन्नू अब नहीं आएगा,कभी नहीं आएगा;

आँखों से बेवस

आँसू लुढ़क पड़े।

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#Kavyotsav2 # emotional

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8 महीना पहले

# काव्योत्सव:-


# हास्य-


     * गड़बड़ वन्दना *

          - डॉ आर बी भण्डारकर


हे प्रभो आनंद दाता ! वरदान हमको दीजिए,

शीघ्र सारे सद्गुणों से हमको दूर कीजिये।


दीजिए कुछ अक्ल प्रभो,शक्ल भी कुछ दीजिए,

लाउड स्पीकर की तरह आवाज भारी कीजिए।


दीजिए कुछ गप्प-ज्ञान,खादी के कपड़े दीजिए,

लोक सभा या विधान सभा में प्रभो भिजवा दीजिए।


हो सके तो हे प्रभो,मिनिस्ट्री भी दीजिए,

यदि नहीं,तो मिनिस्टरों का चमचा बना दीजिए।


बस इतना काम कीजिए,हर महीने परसाद लीजिए,

चाय भी पसंद हो तो रोज बंगले पै आया कीजिए।


दुर्लभ नहीं तुमको प्रभो कुछ,थोड़ा हमें दे दीजिए,

कंजूसी करना नहीं प्रभो,बस इतना समझ लीजिए।

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#kavyotsav2   # humours

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9 महीना पहले

# काव्योत्सव:-

# भावना प्रधान-



         * मेरा आँगन *

               - डॉ आर बी भण्डारकर


रोज सवेरे

मेरे छोटे-से आँगन में

आती थीं चिडियाँ,

 कुछ मैना,

कुछ पंडुकियाँ,

परिंदे और भी कई।


रोज सवेरे, अम्मा नियम से

बिखेर देतीं थीं दाने;

नीम के पेड़ से

लटकते खप्पर में,

भरना पानी

भूलती नहीं थीं वह;

काम यह भी था

उनकी दिनचर्या का

हिस्सा ही।


खूब हिलीं थीं अम्मा से वे चिडियाँ, 

दिन भर चहचाहतीं थीं;

अम्मा को देखकर

मौज में

गातीं-ठुमकतीं थीं

आँगन में या नीम के पेड़ पर।


अम्मा

नहीं रहीं जब से,

आँगन में

पसर गया है सन्नाटा,

अब नहीं आती है कोई चिड़िया;

न मेरी पत्नी दाना ही बिखेरती हैं।


भटक कर कभी कोई चिड़िया

आ बैठती है नीम पर,

फुदक कर मेरी नन्हीं बिटिया

बुलाती है उसे आँगन में

ब्रेड या बिस्कुट दिखाकर।

"छोटी भगा दे चिड़िया को

बीट कर देगी आँगन में"

बिटिया को डाँटती हैं मेरी पत्नी;

करती हैं मुझसे शिकायत 

छोटी की इस हरकत पर।

कहतीं हैं आक्रोश में-

" कटवा क्यों नहीं देते

मुआ यह नीम का पेड़।"


मुझे याद है

अम्मा भी कहती थीं चिडियाँ भगाने को

भेजतीं थीं मुझे नियमित

खेत पर अलस्सुबह

जब फसल में

दाने आने लगते थे।


मैं पड़ जाता हूँ सोच में,

कितना बदल गया है वक्त

अम्मा से पत्नी तक आते आते;

वक्त के इस सफर को

मुझसे बेहतर

परिंदों ने पढ़ लिया है शायद।

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# kavyotsav #emotional (भावना प्रधान)

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9 महीना पहले

# काव्योत्सव:-

# भावना प्रधान-



           * आराधना *

               - डॉ आर बी भण्डारकर


सूर्य-रश्मियों से निसृत

ओ प्रलयंकारी उष्मे !

तव आराधन करें हम।


पेड़ झुलसे,बेहाल पशु,

बेहोश पक्षी हो रहे हैं;

नदियाँ सूखी,जलस्रोत सूखे सभी

जल रसातल को गया है।


जब जल ही नहीं है तो

क्या बिसात मानव की;

अब क्या संरक्षित करें हम

तब आराधन करें हम।


दिलीप लेते थे 'कर' प्रजा से

कठोरता पूर्वक;

जन-कल्याण में लगाते सदा

उसको दो गुना कर।


बहुत वाष्पित किया जल पृथ्वी का

हे उष्मे ! दे उसे दोगुना कर।

उमड़ पड़ें कूप सब,

झर झर झर झरने झरें।


हों वृक्ष चार गुने,

पक्षी दस गुने

लहलहा उठे तब सृष्टि फिर;

तब आराधन करें हम।


प्रतिज्ञा है ;

अब न करेंगे कुपित तुमको

भर देंगे वृक्षों से तव धरा;

तव आराधन करें हम।

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# काव्योत्सव 2 #भावनाप्रधान

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9 महीना पहले

काव्योत्सव:-

भावना प्रधान-

   * अम्मा के गाँव में *

        -डॉ आर बी भण्डारकर


अम्मा के गाँव में,ममता की छाँव में।

मुझको बहुत ही अच्छा लगता है।।


जब-जब जाता मैं अम्मा के गाँव मे ,

बचपन के प्यारे, सुनहरे-से ठाँव में;

मिलती हैं अम्मा,तो लगता है नीका,

अम्मा न होतीं तो सब होता फीका।

बिजली नहीं है,अम्मा के गाँव में।

फिर भी सुहाना लगै ममता की छाँव में।।अम्मा.....


अम्मा जो अब भी हैं लेती बलैयाँ,

चूमें हथेली मेरी,रखें आँचल की छैयाँ;

देती मिठाई जो उनने बनाई,

देती हैं 'सिन्नी' जो उनने थी पाई।

'सिन्नी' हो जाती है ,सूखी बनाव में।

फिर भी तो रहती है प्यारी स्वभाव में।।अम्मा.....


अम्मा सुनाती हैं,जग की कहानी,

जग भले समझे ये उनकी नादानी;

अम्मा की वाणी में सब कुछ है नया है,

भले ही पता मुझे,कब ,क्या हो गया है।

सब कुछ बताना है उनके स्वभाव में।

बिल्कुल भरोसा नहीं उनको दुराव में।।अम्मा....


अम्मा बताती हैं,दुनिया की चालें,

अम्मा बतातीं,कब,क्या हो सकती ढालें;

अम्मा की नजरों में मैं अब भी हूँ छोटा,

नादान,प्यारा-सा,नटखट-सा ढोटा।

चलती बहुत 'लू' है, अम्मा के गाँव में।

चना-भाजी सूखी मिले, अम्मा के गाँव में।।अम्मा....


बहुत प्यारी अम्मा,दुलारी हैं अम्मा,

अनुभव की तो,निश्चित पिटारी हैं अम्मा;

अस्थियों का ढाँचा, अब रह गयी हैं अम्मा,

हर दर्द को छिपाती हैं फुर्तीली अम्मा।

अलौकिक-सा सुख मिले, अम्मा की छाँव में।

होता न कष्ट कोई मुझे,अम्मा के गाँव में।।अम्मा.....

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# काव्योत्सव2 # भावना प्रधान

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9 महीना पहले

काव्योत्सव:-


प्रेम-


     * भगौरिया *

        - डॉ आर बी भण्डारकर

        (1)

लहक उठीं हैं अमराइयाँ

महक उठे हैं बौर;

हवा में मादकता

आज ठौर ठौर।


महुआ गदराए हैं

मस्ती चहुँ ओर;

ऐसा मनभावन ये

भगौरिया का भोर।


सज रहीं हैं बालाएँ

ले प्रियतम की आस;

आज की ये बाट भरे

मन में उजास।


रोज आती है सुबह

रोज आती है शाम;

सोलह बसंत बीते

यों तेरे ही नाम।


देह में उल्लास आज

है हँसी में खनक;

मन है अशांत,मिली

भगौरिया की भनक।


जोश में यों बाले!तुम्हें

होश नहीं खोना है;

परम्परा की थाती में

मदहोश नहीं होना है।


अब नहीं भगौरिया की

पहले की-सी शान;

कुछ गिद्ध-आँखें

आज ताने कमान।


प्रतीक्षा है इनको कि

तुम्हें कब पाएँ;

जादू ये डालें,बस

जीवित निगल जायें।


      

            (2)

            - 


भीना-भीना पवन लिए

सौंधी सुगन्ध है,

आज भगौरिया में 

आनंद ही आनंद है।


सज गया उपवन

फूले वेला,गुलाब,जूही

चंपा,चमेली जो

सबकी पसंद है।


उड़ रहीं हैं तितलियाँ

बे-रोक टोक दौड़ती हैं,

आज देखो कोई

भौंरा भी न बन्द है।


मेले,ठेलों में है

इत्र की गंध फैली,

पान की बहार लिए 

खुशबू मन्द मन्द है।



मिल  रहे हैं दो हृदय

मचल रहा निश्छल प्रेम,

बसंत के इस मौसम में

होकर स्वच्छन्द है।


मधुकर की गुनगुन है

कोयल की कूक गूँजी,

कौओं की आज मानो

धड़कन ही बन्द है।


दूर है,अभाव आज

हतप्रभ गरीबी है,

दुख और चिंता पर

आज प्रतिबंध है।


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# काव्योत्सव #प्रेम

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9 महीना पहले

काव्योत्सव

प्रेरक-

(1)* काम वाली *
- डॉ आर बी भण्डारकर


तुम्हारा रोज आना
भाता है सबको;
परिवार के दैनिक जीवन की
एक अनिवार्य कड़ी बन गयी हो तुम।

तुम्हारा किसी दिन न आना
बहुत अखरता है सबको;
क्रोध चरम पर हो जाता है
अनाप-शनाप बकने लगते हैं सब।

आलसी,कामचोर,झूठी
न जाने कितने विशेषण चिपकाए जाने लगते हैं;
तरह -तरह के बहाने बनाना
फितरत बताने लगते हैं तुम्हारी।

तुम्हारा यह कहना,बुखार आ गया था
कल थकान भी हो गयी थी;
नहीं पसीजता वह हृदय
जिसे सुकोमल कहा जाता है।

जरा-सी असहजता में
दफ्तर न जाने वाले हम;
कभी नहीं सोच पाते
तुम भी तो हाड़-माँस की पुतला हो।

कैसी है यह विडंबना
कैसा है अपनापन;
जहाँ मानवता मर जाती है
याद रहता है केवल स्वार्थ।
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(2) * कुटुम्ब *
- डॉ आर बी भण्डारकर

जब समझ में
नहीं आने लगती हैं
रास्तों की ऊंची-नीची जमीन;
तुम चश्मा पहनने लगते हो
मेरी आँखें बनता है मेरा पोता।

भीड़ में जब सड़क पार करते
नहीं बनता है मुझसे;
तुम सहारा लेते हो "बेंत" का
मेरी पोती बड़े ही प्यार से
मुझे सड़क पार कराती है।

कुछ अवसर आते हैं
जब बाहर जाना ही पड़ता है;
घर के बाहर खड़ा होता हूँ
तो दूर की लारी
समझ मे नहीं आती है-
आ रही है कि जा रही है;
" वह तो जा रही है दद्दा "
बता देती है मेरी छोटी बहू
जो सवेरे-सवेरे चबूतरे पर
गोबर लीप रही होती है।

अब तो,किताब भी
पढ़ते नहीं बनता है;
रोज रात को मेरी छोटी पोती
पढ़कर सुनाती है रामायण
पता नहीं तुम क्या करते होंगे ऐसी स्थिति में।

छोटे थे जब मेरे पोता-पोती
मैं उन्हें उँगली पकड़कर चलाता था;
घोड़ा बनता था उनका
क्या उनके लिए ?
नहीं।
अपने लिए ।
ममत्व तो था, पर स्वार्थ भी था-
पेड़ बड़ा होगा,फल देगा;
अब फल मिलने लगे हैं।

पता नहीं तुमने क्या किया था
और अब क्या सोचते होंगे।
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#Kavyotsav2  

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