एक कविता संग्रह ’अच्छे दिनों के इंतज़ार में’ सृजनलोक प्रकाशन से प्रकाशितl कई प्रमुख पत्र पत्रिकाओं यथा, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, अहा! जिंदगी, कादम्बिनी, बाल भास्कर आदि में रचनाएं प्रकाशित। अन्तर्जाल पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं पर निरंतर सक्रिय। 21 साझा संकलन प्रकाशित। प्रतिलिपि कविता सम्मान से सम्मानित।

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● मेरी धड़कनें आहिस्ता धड़कने लगी थी

वो सजकर घर से निकलने लगी थी
दीवानों की दुनिया में आँधियाँ चलने लगी थी।

आईनों पर भी हुस्न का ख़ुमार चढ़ गया
जब से वो हस्ना संवरने लगी थी।

उनके कदमों ने क्या छूआ घर की दहलीज को
चांदनी भी आँगन में ठहरने लगी थी।

ज़रा सी क्या भीग गई उनकी चुनर बारिश में
ऋतुएँ अपने कपड़े बदलने लगी थी।

एक दफ़ा उन्होंने क्या देखा पलकें उठाकर
दिलों में तमन्नाएँ पलने लगी थी।

जब भी वो नज़र आए हँसते हुए
मेरे उपवन में खुशबु महकने लगी थी।

तेज होते सुना था इश्क़ में दिल की धड़कनों को
मेरी धड़कनें ज़रा आहिस्ता धड़कने लगी थी।

सवेरा आहें भरता था उनकी अंगड़ाई पर
रातें उनकी करवटों पर मचलने लगी थी।

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• तुम्हारे जाने के बाद
तुम्हारे जाने के बाद
कितना कुछ बदल गया है अचानक ही
अब चांदनी रात का चाँद प्यारा नहीं होता
फूलों की रंगत फीकी सी हो रही है
पंछी खामोश से उड़ते रहते है
चिड़ियाँ चहचहाना भूल गई दिखती है
पेड़ो की पत्तियों पर पीलापन छाया है
तुम्हारे जाने के बाद
तुम्हारे जाने के बाद
मैं ज़रा सा लापरवाह हो गया हूं
बाइक की रेस बढ़ती ही जाती है
बहते पानी में तैरने से डर नहीं लगता अब
धुआँ कुछ ज्यादा ही प्यारा लगने लगा है
सिगरेट अब हर कहीं मिलने लगी है
गरम रोटी की खुशबू अब पहचानी नहीं जाती
अँधेरा अपना सा लगता है
और डर लगता है उजालों से
डर लगता है मुझे
मुझे डर लगता है तुम्हारे जाने के बाद
तुम्हारे जाने के बाद
याद नहीं रह पाता जो याद रहना है
भूलना ही याद है और यादें नहीं भुला पाता
तुम्हारे जाने के बाद दिन इतने लंबे हुए है
और रातों की लंबाई तो मापी नहीं जाती
तकिया भारी हो चुका हैं मेरे अश्क पीकर
बिस्तर रात भर चुभता है तेरी यादों की तरह
और आँखों की सूजन
होंठों की मुस्कान पर भारी पड़ती है
लोग कुछ ज्यादा ही हाल पूछते है हँसते हँसते
तुम्हारे जाने के बाद
तुम्हारे जाने के बाद
किसी के आने कोई गुंजाइश नहीं रखी मैंने
तुम्हारे उपहार संभाल नहीं पाऊँगा
मुझे माफ़ करना, माफ़ कर देना
जी नहीं पाऊँगा तुम्हारे जाने के बाद
और मरने में अब कुछ बाकी भी नहीं रहा
मैं ज़िंदा कहाँ हूँ?
मैं ज़िंदा कहाँ हूँ, तुम्हारे जाने के बाद ?

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• माँ
जब ईश्वर ने जगत रचा, तब अपनी काया छोड़ गया
माँ के रूप में इस धरती पर, अपनी छाया छोड़ गया।

हर मुश्किल से हर संकट से, हमको जिसने तारा है
इस अंधियारे अंतरिक्ष में,बस माँ ही एक सितारा है।

जब जब मैंने ख़ुद को किसी दलदल में धंसता पाया
माँ के हाथ का मिला सहारा तब खुद को हँसता पाया।

साथ न उनका त्यागना भले अहंकार का झोंका आ जाए
अपना बचपन याद रखना जब माँ को बुढ़ापा आ जाए।

दूर शहर में शोर में ज़िन्दगी तनहाई के हाथ रही
वो माँ की यादें थी, जो हर पल मेरे साथ रही।

जादू है उन आँखों में, मेरे छिपे अश्कों को जान लिया
हँसने का ढोंग काम न आया, माँ ने दुःख पहचान लिया।

सबने पूछा कितने पैसे कितना धन तुमने पाया है
बस माँ थी जो पूछ रही क्या तुमने खाना खाया है।

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* तुम्हारा प्यार

बांध रखा है
मैंने तुम्हारा प्यार
तनहाई के खूंटे में
यादों की मजबूत सांकल से
और अकसर जब पगलाया सावन
सौंधी महक वाली बारिश की तलाश में होता है
एक घना काला बादल उमड़ आता है मेरी आँखों में
मुझे खोकर भी तुम्हारी खूबसूरती में जरा सी भी कमी न हुई
और मैं टूटे आईने की माफ़िक बदसूरत बिखरता जा रहा हूँ
आज भी एक कली खिल उठती है दिल के बगीचे में
बारिश से भीगी मिट्टी सी महक बिखेर जाता है
ऊँचे पहाड़ से गिरते फेनिल झरने जैसा
इठलाती बल खाती दीवानी नदी जैसा
किसी बच्चे की मासूमियत जैसा
हवा में झूमती फसलों जैसा
तेरी आँखों जितना गहरा
यादों की जंजीर में कैद
तुम्हारी मुस्कान जैसा
बेहद ही खूबसूरत
तुम्हारा प्यार।

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■ मुहब्बत की राहें
इन राहों पर नाम लिखा है जाने कितने प्यारों का
लैला मजनूं हीर रांझा और कई दिलदारों का।

मुद्दत बीती गुज़र गये वो, पर कायम तासीर है
मयखानों की चंद्रमुखी, या देवदास की पारो का।

ढोला मारू मरुभूमि में, प्रेम की पावन बूंदें है
ये जमाना गवाह बना है ऐसे कई नज़ारों का।

कली-कली ज़िंदा चुनवा दी इन बागों के बैरी ने
क्या सलीम ने हश्र किया था नफ़रत के इन ख़ारों का।

भले लुटेरों की बस्ती है इश्क़ शहर के इस कोने में
इन रस्तों पर काम नहीं तीखे पैने हथियारों का।

घृणा द्वेष और ईर्ष्या को मिटना है, मिट जाना है
प्रेम दीया ही नाश करेगा नफ़रत के अंधियारों का।

क्या दृश्य रहा होगा जब मीरा मिल गई माधव की मूर्ति में
बाँसुरी से मिलन हुआ था जब वीणा के तारों का।

‘दवे’ ज़माना कब छोड़ेगा नफ़रत की ये आग उगलना
कब तक दीपक कत्ल करेंगे इन परवाने यारों का।

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● जब वो पहली बार हंसी


भागी भागी मंदिर आई
पूजा की थाली संग लाई
पुष्प कली के संग आये थे
मोह लिया वे रंग लाये थे
बिन दस्तक दिल में धंसी
जब वो पहली बार हंसी।

गिरधर के उस आंगन में
मुरलीधर के प्रांगण में
उसने उसकी प्रीत चढ़ाई
मैंने मेरी नींद गंवाई
आँखों में आकर बसी
जब वो पहली बार हंसी।

हृदय मेरा पूजा घर था
उसमें उसकी मूरत थी
मैं उसका वो मेरी ना थी
मेरे मन उसकी सूरत थी
मीठे विष नागिन डसी
जब वो पहली बार हंसी।

उसमें ऐसा क्या पाया
ना जागा न सो पाया
वो सपना था इतना हसीं
जब खुला सांसें थमी
उसने फिरकी नजर कसी
जब वो पहली बार हंसी।

पहुंचा जब तक स्वयंवर में
वो जा बैठी मंडप में
दूजे कांटे मीन फंसी
फिर क्यों मेरे साथ हंसी
थी कैसी अनमोल घड़ी
जब वो पहली बार हंसी।



विनोद कुमार दवे
206,बड़ी ब्रह्मपुरी
मुकाम पोस्ट=भाटून्द
तहसील =बाली
जिला= पाली
राजस्थान 306707
मोबाइल=9166280718

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