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पता नहीं?



नदिया के पास कभी गया ही नहीं,

'किनारा' क्या होगा, पता नहीं?



दुनिया की भीड़ मे गहरा उतरता गया,

'खोजना' क्या है, पता नहीं?



भगवान का नाम लेती रहती है दुनिया,

वो भी 'थक गया होगा क्या' , पता नहीं?



पानी तो आंखो मे बहोत है दुनिया के,

वो 'खुशी' है या 'गम', पता नहीं?



मंज़िल कहाँ मिली है मुझको,

दूसरों को 'राह' दिखाऊ, पता नहीं?



दुनिया मशगूल है उपकार जताने मे,

'हिसाब' कैसे किया, पता नहीं?



किस्मत से आज़ाद है सब,

'सपने' कहाँ से लाए, पता नहीं?



रास्ता मंज़िल सब एक से है यहाँ,

'शुरुआत' कहाँ से करू, पता नहीं?



पहचान तो बहोत है मेरी,

कहाँ हु मैं, पता नहीं?



Chirag Koshti

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#kavyotsav2



‘ बचपन खो रही थी ‘



जा रहा था घर, शाम बाह़े खोल रही थी,

दिन ढल रहा था, रात हो रही थी।



एक मोड़ आया रस्ते मे, BUS अपनी गति खो रही थी,

खिड़की के बाहर देखा तो अजीब सी हरकत हो रही थी।



देखा जब बाहर तो आँखे नम हो रही थी,

फूटपाथ की बाहों मे छोटी सी लड़की सो रही थी।



मासूम से चेहरे पे धुल इधर-उधर हो रही थी,

ठण्ड की लहरो मे कच्ची सी नींद खो रही थी।



डर न था उस परी को कुछ हो जाने का,

कुदरत के साये मे मीठे सपने बो रही थी।



दुनिया इस नन्ही परी को ठुकरा रही थी,

वो परी फिर भी नींद मे मुस्कुरा रही थी।



इश्वर की बनाई दुनिया मे इंसानियत सो रही थी,

वो मासूम परी फूटपाथ पे अपना बचपन खो रही थी।



- Chirag Koshti

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