×

लघुकथा ओनलाईन किताबें पढ़ें अथवा हमारी ऐप डाऊनलोड करें

    मेरा हमसफ़र
    by Saadat Hasan Manto
    • (0)
    • 2

    प्लेटफार्म पर शहाब, सईद और अब्बास ने एक शोर मचा रखा था। ये सब दोस्त मुझे स्टेशन पर छोड़ने के लिए आए थे, गाड़ी प्लेटफार्म को छोड़ कर आहिस्ता ...

    मेरा नाम राधा है
    by Saadat Hasan Manto
    • (3)
    • 97

    ये उस ज़माने का ज़िक्र है जब इस जंग का नाम-ओ-निशान भी नहीं था। ग़ालिबन आठ नौ बरस पहले की बात है। जब ज़िंदगी में हंगामे बड़े सलीक़े से ...

    कल्लू-बल्लू
    by Ajay Kori
    • (2)
    • 23

     "कल्लू - बल्लू"ठंड का वो मौसम था... सुबह के 7:00 am बज चुके थे...। आज का मौसम भी बहुत अजीब था .. वैसे रोज़ मैं सुबह उठता नहीं था... ...

    ओ पी डी
    by Ved Prakash Tyagi
    • (11)
    • 115

    ओ पी डी प्रदीप भाई ये लो गरमा गरम कॉफी और पीकर बताओ मैंने भाभी से अच्छी बनाई या नहीं........ हाँ राजेश तूने कॉफी बहुत अच्छी बनाई है लेकिन ...

    नदी बहती रही.... - 1
    by Kusum Bhatt
    • (3)
    • 36

    ‘‘सलोनी!’’ किवाड़ तो बन्द थे..., अन्दर कैसे घुस गई...! मैंने ही किये थे इन्हीं हथेलियों से .... तुम रोई थी... छटपटाई थी.... तड़फ कर कितना कुछ कह रही थी... आकुल ...

    तब राहुल सांकृत्यायन को नहीं पढ़ा था - 1
    by Arpan Kumar
    • (1)
    • 19

    यह कहानी अनुरंजन की कैशोर्य कल्पनाशीलता की है। उसकी अनगढ़ता और दुःसाहस की है। एक ग्रामीण किशोर की अदम्य जिजीविषा भी है यहाँ। जाने क्या है इस कहानी में ...

    मेरा और उसका इंतिक़ाम
    by Saadat Hasan Manto
    • (11)
    • 107

    घर में मेरे सिवा कोई मौजूद नहीं था। पिता जी कचहरी में थे और शाम से पहले कभी घर आने के आदी न थे। माता जी लाहौर में थीं ...

    प्रेम — रंग, अफवाह, खुशबू
    by Sushma Munindra
    • (5)
    • 61

    उन्नति ने नहीं सोचा था फेस बुक पर रक्षा मिलेगी। उन्नति का मन यॅूं भी भटका सा रहता है। जब से बेटी की शादी हुई, बेटा आई.आई.टी. करने खड़गपुर गया ...

    नदी की उँगलियों के निशान - 2
    by Kusum Bhatt
    • (2)
    • 36

    भुवन चाचा के चेहरे पर धूप की तितली बैठी, माधुरी हवा में उड़ी उसके पंख पकड़ कर मैं भी उड़ने लगी.... उस विजन में हम दो लड़कियाँ जिंदगी की नौवीं-दसवीं ...

    काँटों से खींच कर ये आँचल - 6
    by Rita Gupta
    • (11)
    • 63

    अब अपने आगे के नौ महीने के अज्ञातवास की भी हमें पूरी तयारी करनी थी. एक भी चूक दीक्षा की गृहस्थी के लिए घातक होती. उसी रात को दीक्षा ने ...

    एक अदद फ्लैट - 4
    by Arpan Kumar
    • (3)
    • 34

    नंदलाल बैठे हुए सोचने लगे...ये बुज़ुर्ग कोई पैंसठ साल के होंगे। व्यास जी पचपन के और वे स्वयं भी तो पचास पार कर ही गए हैं। अलग अलग उम्र ...

    मूत्री
    by Saadat Hasan Manto
    • (10)
    • 125

    कांग्रस हाऊस और जिन्नाह हाल से थोड़े ही फ़ासले पर एक पेशाब गाह है जिसे बंबई में “मूत्री” कहते हैं। आस पास के महलों की सारी ग़लाज़त इस तअफ़्फ़ुन ...

    मुलाक़ाती
    by Saadat Hasan Manto
    • (8)
    • 138

    “आज सुबह आप से कौन मिलने आया था” “मुझे क्या मालूम मैं तो अपने कमरे में सौ रहा था।” “आप तो बस हर वक़्त सोए ही रहते हैं आप ...

    एक गधे का दर्द
    by Ajay Amitabh Suman
    • (4)
    • 76

    अपना गधा संपन्न था , पर सुखी नहीं। दर्द तो था , पर इसका कारण पता नहीं चल रहा था। मल्टी नेशनल कंपनी में कार्यरत होते हुए भी , ...

    नदी की उँगलियों के निशान - 1
    by Kusum Bhatt
    • (1)
    • 31

    नदी की उंगलियों के निशान हमारी पीठ पर थे। हमारे पीछे दौड़ रहा मगरमच्छ जबड़ा खोले निगलने को आतुर! बेतहाशा दौड़ रही पृथ्वी के ओर-छोर हम दो छोटी लड़कियाँ...! ...