आई स्टिल लव यू - 7 Vartika reena द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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आई स्टिल लव यू - 7




































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​लेक्चर हॉल से बाहर कदम रखते ही रौक्षिण की चाल हमेशा की तरह तेज़ थी, लेकिन उसके दिमाग में एक अजीब सी कशिश चल रही थी। जैसे ही वह कॉरिडोर के सुनसान हिस्से में पहुँचा, उसने अनजाने में अपने हाथ कोट की जेब में डाले। उसकी उंगलियों ने उन पाँच छोटी-छोटी टॉफ़ियों को छुआ।


​बिज़नेस वर्ल्ड में उसे लोग 'निर्दयी' और 'कैल्कुलेटिव' कहते थे, लेकिन उस लाल पांडा जैसी लड़की ने उसके इस कड़े सूट की जेब में टॉफियाँ डालकर उसके पूरे सिस्टम को हिला दिया था। रौक्षिण के होंठों पर एक बहुत ही बारीक और छिपी हुई मुस्कान उभरी, जिसे उसने तुरंत अपना गला साफ़ करके दबा दिया। वह अपनी कार की तरफ बढ़ गया, जहाँ उसका असिस्टेंट आर्यन पहले से ही कुछ फाइल्स लिए खड़ा था।


​"सर, सोमवंशी ग्रुप ने दिल्ली वाले टेंडर के लिए अपनी नई कोटेशन फाइल करने की तैयारी शुरू कर दी है। विक्रम सोमवंशी खुद इस प्रोजेक्ट पर दिन-रात एक कर रहे हैं," आर्यन ने कार का दरवाज़ा खोलते हुए कहा।


​रौक्षिण गाड़ी की पिछली सीट पर बैठा और गंभीर लहजे में बोला, "उन्हें करने दो। जब तक उनके पास हमारी कोर स्ट्रेटेजी का एक्सेस नहीं होगा, वो रायदित कॉर्पोरेशन को पछाड़ नहीं सकते। हमारी हर चाल पर पैनी नज़र रखो।"


​गाड़ी आगे बढ़ गई। रौक्षिण ने खिड़की से बाहर देखते हुए अपनी जेब से एक टॉफ़ी निकाली। उसने टॉफी के उस सुनहरे रैपर को देखा। 


"रुद्रिका सोमवंशी... तुम सच में आफत हो या सिर्फ अपने पिता की परछाई?", उसने मन ही मन सोचा। 


उसे नहीं पता था कि उसकी शराफ़त और उसका जेंटलमैन स्वभाव ही उस लड़की का सबसे बड़ा निशाना बनने वाला था।


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​अगले दो दिन रुद्रिका ने रौक्षिण के शेड्यूल को और गहराई से स्टडी किया। उसे पता चला कि हर शुक्रवार को लेक्चर खत्म होने के बाद, रौक्षिण सीधे अपनी गाड़ी में नहीं बैठता, बल्कि वह यूनिवर्सिटी की उस पुरानी लाइब्रेरी के 'रेयर बुक्स सेक्शन' में जाता है, जहाँ आमतौर पर सन्नाटा पसरा रहता है। वह वहाँ करीब आधा घंटा कुछ शांत पल बिताता है।


शुक्रवार का दिन था। अवासा का मौसम कुछ ज्यादा ही.सर्द था। आसमान मे काले बादल छाए थे। 


क्लास खत्म कर रौक्षिण लाइब्रेरी के उस शांत कोने मे बैठा एक किताब पढ रहा था। उसे आए अभी ज्यादा समर नही हुआ होगा जब उसे अहसास हुआ की उसके पास की कुर्सी सरकी है। 


रौक्षिण ने सिर उठाकर देखा तो सामने रूद्रिका चेयर पर बैठ रही थी। रौक्षिण ने ध्यान दिया की आज उसने एक ब्राउन स्लीवलेस क्रोप टॉप के ऊपर कई सारे छोटे छेद वाला गहरे ब्राउन रंग का स्वेटर पहन रखा था। और साथ ही काली जींस पहन रखी थी। उसने पैरो मे स्नीकर्स डाल रखे थे। बाल उसके खुले थे। 


रूद्रिका को देखते हुए रौक्षिण को अहसास हुआ की वो उसे ही घूरे जा रहा है। उसने हडबढाकर अपनी नजरे फेर ली। 


रूद्रिका जो अपनी कुर्सी पर सेटल सो चुकी थी उसने एक नजर रौक्षिण को देखा फिर एक प्यारी सी स्माईल पास कर दी। 


रौक्षिण ने अपनी निगाहें वापस किताब के पन्नों पर गड़ा तो दीं, लेकिन काले अक्षरों की जगह उसके दिमाग में रुद्रिका का वही मुस्कुराता हुआ चेहरा तैर रहा था। अवासा की इस कड़ाके की ठंड में, जहाँ लोग भारी-भरकम कोट पहने घूम रहे थे, यह लड़की एक जालीदार गहरे भूरे रंग के स्वेटर और खुले बालों में किसी ताज़ी हवा के झोंके की तरह चली आई थी।


​लाइब्रेरी के उस 'रेयर बुक्स सेक्शन' की पुरानी महक में अचानक रुद्रिका के उस स्ट्रॉबेरी परफ्यूम की खुशबू घुलने लगी थी, जिसने रौक्षिण के कैल्कुलेटिव दिमाग को पूरी तरह से डिस्टर्ब कर दिया था।


​रौक्षिण ने गहरी सांस ली, अपने कोट के कॉलर्स को थोड़ा ठीक किया और अपनी स्वाभाविक भारी और गंभीर आवाज़ में कहा, "मिस सोमवंशी... मुझे नहीं पता था कि आपको पुरानी और रेयर किताबों में इतनी दिलचस्पी है। या फिर आज भी आपका इरादा यहाँ कोई नया तमाशा खड़ा करने का है?"


​भले ही उसके शब्दों में हमेशा की तरह  सख्ती थी, लेकिन उसकी गहरी भूरी आँखें रुद्रिका की उस मखमली मुस्कान के सामने थोड़े असमंजस में थीं। लड़कियों के मामले में उसका शर्मीला स्वभाव एक बार फिर उसके चेहरे पर झेंप बनकर आने ही वाला था कि उसने खुद को संभाला।


​रुद्रिका ने अपनी दोनों कोहनियाँ टेबल पर टिकाईं, अपने चेहरे को अपनी हथेलियों के कप में रखा और बड़े ध्यान से रौक्षिण के उस गंभीर चेहरे को देखने लगी।


​"तमाशा? अरे नहीं सर! आज मैं बहुत शरीफ़ बच्ची बन कर आई हूँ," रुद्रिका ने मद्धम आवाज़ में कहा, लाइब्रेरी के सन्नाटे का सम्मान करते हुए। "और वैसे भी, इतने शांत और खूबसूरत माहौल में कोई तमाशा कैसे कर सकता है? मैं तो बस यहाँ पढ़ाई करने आई थी... और इत्तेफाक से आप दिख गए।"


​"इत्तेफाक?" रौक्षिण के होंठों पर एक तंजिया लेकिन हल्की सी मुस्कान उभरी। "रायदितों के शब्दकोश में 'इत्तेफाक' जैसा कोई शब्द नहीं होता, मिस सोमवंशी। मुझे अच्छी तरह पता है कि आप पिछले दो दिनों से मेरी हर एक्टिविटी पर नज़र रख रही हैं। कहिए, क्या चाहिए आपको?"


​रौक्षिण का यह सीधा वार रुद्रिका को अंदर तक हिला गया। एक पल के लिए उसके दिमाग में अपने पिता विक्रम सोमवंशी का वो सख्त चेहरा और उस सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर टेंडर की बात घूम गई। उसका दिल तेज़ी से धड़का। उसे याद आया कि वह यहाँ किसी इत्तेफाक से नहीं, बल्कि एक सोची-समझी स्ट्रेटेजी के तहत रौक्षिण के करीब आने आई थी ताकि उसका भरोसा जीत सके।


​अपनी आँखों में आए उस छोटे से खिंचाव को छुपाते हुए, रुद्रिका ने अपनी आँखें मटकाईं और टेबल पर थोड़ा और आगे झुक गई। अब वह रौक्षिण के इतने करीब थी कि उसकी खुली हुई ज़ुल्फ़ों की एक लट टेबल पर बिखरी रौक्षिण की किताब के पनों को छू रही थी।


​"अगर पता ही है कि मैं आपके पीछे-पीछे आई हूँ, तो फिर सीधा सवाल क्यों नहीं पूछते, मिस्टर प्रोफेसर?" रुद्रिका ने अपनी आवाज़ को और धीमा, थोड़ा सा फुसफुसाते हुए कहा। 

उसकी चुलबुली आँखों में इस बार एक अनजानी सी गहराई थी। "क्या रायदित कॉर्पोरेशन के चाणक्य को एक सोमवंशी की लड़की से डर लगने लगा है?"


​रौक्षिण की साँसें वहीं की वहीं थम गईं। रुद्रिका की इस अचानक बढ़ी नज़दीकी और उसकी आँखों के सीधे वार ने उसके जेंटलमैन स्वभाव को पूरी तरह से निहत्था कर दिया था। उसके दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि उसे डर था कि कहीं रुद्रिका उसे सुन न ले। उसके कानों के किनारे एक बार फिर हल्के गुलाबी पड़ने लगे थे।


​उसने झटके से अपनी किताब बंद की, जिससे लाइब्रेरी के सन्नाटे में एक हल्की सी गूँज हुई।


​"मुझे किसी से डर नहीं लगता, रुद्रिका," रौक्षिण ने पहली बार बेहद संजीदगी से, उसका सरनेम हटाकर सीधे उसका नाम लिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। 


"लेकिन मैं उन खेलों को नहीं खेलता जिनके नियम मुझे पसंद न हों। यह लाइब्रेरी पढ़ने के लिए है, बिज़नेस या... किसी और चीज़ के दांव-पेच के लिए नहीं।"


​वह उठने ही वाला था कि रुद्रिका ने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसकी बंद किताब के ऊपर अपनी उंगलियां रख दीं।


​"तो मत खेलिए ना बिज़नेस के खेल..." रुद्रिका ने बेहद मासूमियत से कहा, उसकी आँखों में इस बार कोई चालाकी नहीं थी, बल्कि पिता की बेरुखी से उपजा एक सच्चा अकेलापन झलक रहा था, जिसे रौक्षिण अनजाने में महसूस कर पा रहा था। "सिर्फ एक प्रोफेसर की तरह... मुझे थोड़ा सा वक़्त दे दीजिए।"



क्रमशः 


इस भाग मे इतना ही। मिलते है अगले भाग के साथ । तब तक के लिए इस भाग पर कमेंट कर दे।