मनोज - एक ज़िद्दी लड़के की कहानी - 2 Diljaan singh द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

मनोज - एक ज़िद्दी लड़के की कहानी - 2

भाग 1 से आगे...

रात के 2 बजे थे। मनोज की आंखों में नींद नहीं थी। 
फोन की स्क्रीन पर वही मैसेज चमक रहा था - 
"काम करना है। जल्दी पैसा मिलेगा। मिलना है तो सुबह 10 बजे पुराने पुल पर आ जाना।"

मनोज ने फोन बंद कर दिया। तकिए में मुंह छुपा लिया।
मां की सिसकियां अभी भी दीवार के उस पार से आ रही थीं।

सुबह 8 बजे।
पिताजी दुकान पर नहीं गए। बोले "क्या फायदा? दो दिन बाद तो नीलाम हो ही जाएगी।"
मनोज ने चाय बनाई और चुपचाप निकल गया।

10 बजे। पुराना पुल।
वहां पहले से 2 लड़के खड़े थे। मुंह पर रुमाल बांधे हुए।
एक ने कहा "नाम क्या है?"
मनोज - "मनोज"
दूसरा हंसा - "अच्छा। सुना है घर में तंगी है। 5 लाख चाहिए ना?"
मनोज चुप रहा।

पहला लड़का - "काम छोटा है। एक पार्टी का सामान एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना है। 
               2 घंटे का काम। बदले में 50 हजार नकद।"
मनोज की आंखें बड़ी हो गईं - "50 हजार?"
"हां। पर मुंह बंद रखना पड़ेगा। पुलिस का नाम आया तो... समझ गया ना?"

मनोज के दिमाग में 2 आवाजें आ रही थीं।
एक बोल रही थी - "रुक जा। ये गलत है।"
दूसरी बोल रही थी - "पिताजी की दुकान बचानी है। 2 घंटे की बात है।"

मनोज ने गहरी सांस ली - "ठीक है। मैं करूंगा।"

लड़के ने एक बैग दिया। भारी था।
"इसे लेकर स्टेशन के पीछे वाले गोदाम में दे आना। कोई पूछे तो मत बताना।"
मनोज ने बैग लिया और चल पड़ा।

रास्ते में उसकी मुलाकात निशा से हो गई।
निशा - "मनोज तुम? इतनी सुबह कहां?"
मनोज घबरा गया। बैग को पीछे छुपाया - "वो... दोस्त से मिलना था।"
निशा ने बैग देखा - "इसमें क्या है?"
मनोज - "कुछ नहीं। किताबें हैं।"
निशा - "तुम झूठ बोल रहे हो। तुम्हारी आंखें बता रही हैं।"
मनोज - "निशा प्लीज। मुझे जाने दो।"

और वो भाग गया।

गोदाम पहुंचकर मनोज ने बैग दिया। बदले में 50 हजार मिल गए।
पैसे हाथ में आते ही मनोज का दिल जोर से धड़कने लगा।
ये आसान था। बहुत आसान।

शाम को घर आकर उसने पैसे पिताजी के हाथ में रख दिए।
पिताजी - "ये कहां से लाया?"
मनोज - "कॉलेज में स्कॉलरशिप मिली।"
पिताजी की आंखें भर आईं - "मेरा बेटा।"

रात को फिर मैसेज आया - "शाबाश। कल फिर मिलते हैं। और बड़ा काम है।"

मनोज ने फोन देखा। फिर निशा का चेहरा याद आया।
उसने क्या किया था? 

मनोज छत पर बैठा था। हाथ में वो 50 हजार थे।

एक तरफ पिताजी की दुकान थी। 
दूसरी तरफ निशा की इज्जत थी।

मनोज ने आसमान की तरफ देखा और बोला - 
"भगवान मुझे माफ कर देना। मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था।"

पर उसे नहीं पता था... 
कल सुबह निशा उसे गोदाम के पास देख चुकी थी।

अगले भाग में पढ़िए - **भाग 3: निशा को शक**

नोट - कहानी कैसी लगी कमेंट में बताना। लाइक और फॉलो करना मत भूलना।
रोज रात 9 बजे नया भाग आएगा 🔥

क्या मनोज अब हर रोज गलत काम करेगा?
क्या निशा को सच पता चलेगा?
क्या 50 हजार से घर बच पाएगा या और मुसीबत आएगी?

अगले भाग में पढ़िए - **भाग 3: निशा को शक**

नोट - कहानी कैसी लगी कमेंट में बताना। लाइक और फॉलो करना मत भूलना।

कमेंट करना न भूले दोस्तो अगर स्टोरी अच्छी लगे🙏🏻.