अमावस्या की काली रात एक खोफ या श्राप - 9 RAAHULL SHARMA द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अमावस्या की काली रात एक खोफ या श्राप - 9

रघु काका की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। उन्होंने गहरी सांस ली और कहानी को उसी मोड़ से आगे बढ़ाया जहाँ मर्यादा का लहू बहा था।
अध्याय: कृतघ्नता का चरम और पाप की शुरुआत
पार्वती ने कांपते हुए स्वर में कहा, "जमींदार साहब! आप यह क्या कर रहे हैं? मैंने दिन-रात एक कर आपकी सेवा की, यमराज के चंगुल से आपकी जान बचाई और आप मेरे ही साथ यह छल कर रहे हैं? 
मेरी पवित्रता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं? आपको अपनी मर्यादा और इस उपकार की लाज रखनी चाहिए, आपको शर्म आनी चाहिए!"
पर जागीरदार रतन सिंह पर तो जैसे शैतान सवार था। कामवासना ने उसकी बुद्धि हर ली थी। 
उसने पार्वती की मिन्नतों को अनसुना कर दिया और अपनी पकड़ और मज़बूत करते हुए फुसफुसाया, "पार्वती... एक बार तुम बस मेरी हो जाओ। मैं तुम्हें इस कबीले की धूल से उठाकर अपने महल की रानी बनाकर रखूँगा। 
सोने-चाँदी से लाद दूँगा तुम्हें, बस एक बार मेरी बाहों में आ जाओ!"
पार्वती का स्वाभिमान जाग उठा। उसने अपनी पूरी ताकत समेटी और जागीरदार को एक ज़ोरदार धक्का दिया। 
वह पीछे की ओर लड़खड़ा गया। पार्वती ज़ोर-ज़ोर से मदद के लिए चिल्लाने लगी। उसकी चीखें जंगल के सन्नाटे को चीरती हुई दूर तक गईं।
अध्याय: कबीले का अपमान और जागीरदार का अहंकार
जंगल में जड़ी-बूटियाँ ढूंढ रहे हृदय राम और उनके साथियों ने जब पार्वती की वह चीख सुनी, तो उनके कलेजे कांप गए। 
वे अपनी कुल्हाड़ियाँ और लाठियाँ लेकर नदी की ओर भागे। वहां का नज़ारा देखकर हृदय राम की आँखों में खून उतर आया।
उन्होंने देखा कि वही शख्स, जिसे उन्होंने अपना रक्षक मानकर घर में जगह दी थी, उनकी बेटी की अस्मत पर हाथ डाल रहा था।
हृदय राम गरजकर बोले, "जागीरदार साहब! हमें आपसे यह उम्मीद नहीं थी। 
हमने आपकी जान बचाई और आपने हमारे विश्वास की जड़ काट दी?
लानत है आपके इस राजसी खून पर! आप फौरन यहाँ से चले जाइए, इससे पहले कि हम अपना आपा खो बैठें।"
रतन सिंह को जैसे किसी ने तमाचा मार दिया हो। एक मामूली बंजारे ने उसे 'मर्यादा' का पाठ पढ़ाया था? उसे 'चले जाने' का हुक्म दिया था? 
उस अपमान ने जागीरदार के भीतर के जानवर को पूरी तरह जगा दिया। उसके मन में कृतज्ञता की जगह अब एक खौफनाक गुस्सा भर गया था।
अध्याय: विनाश की नींव
जागीरदार रतन सिंह वहां से चुपचाप तो चला गया, लेकिन उसकी आँखों में प्रतिशोध की ज्वाला जल रही थी। 
उसने मन ही मन ठान लिया था कि जिसने उसे 'ना' कहा है, वह इस धरती पर रहने के लायक नहीं है। 
उसने सोचा, "एक मामूली बंजारा मुझे दुत्कारेगा? अब न वह कबीला रहेगा, न वह घमंड!"
रघु काका की आवाज़ में अब वह दहशत साफ झलक रही थी जो सौ साल पहले देवपुर की गलियों में महसूस की गई थी।
उन्होंने कहानी को उस खौफनाक मोड़ से आगे बढ़ाया जहाँ एक राजा, राक्षस बन चुका था।
अध्याय: अहंकार का सिंहासन और खूनी न्याय
रतन सिंह जब अपने महल लौटे, तो पूरे राज्य में ढोल-नगाड़े बजने लगे। महल की दीवारों को दियों से सजाया गया क्योंकि 'अजेय' जागीरदार मौत को मात देकर वापस आए थे।
लेकिन किसी को नहीं पता था कि जो लौटकर आया है, वह वह इंसान नहीं है जिसे वे जानते थे; वह अब एक ज़ख्मी और सनकी शिकारी था।
जब सेनापतियों ने पूछा कि उन्हें किसने बचाया, तो रतन सिंह की आँखों में वही कबीला और पार्वती का चेहरा कौंध गया।
पर उनका अहंकार यह स्वीकार नहीं कर सकता था कि एक मामूली बंजारे ने उनकी जान बचाई है। उन्होंने गरजकर कहा:
"मुझे किसी ने नहीं बचाया! मैं अपनी ताकत और फौलादी इरादों की बदौलत मौत के मुँह से बाहर आया हूँ। और वे बुज़दिल सैनिक, जो मुझे जंगल में अकेला छोड़कर भाग आए थे, 
उन्हें जीने का कोई हक नहीं है। उन सबको अभी इसी वक्त मौत के घाट उतार दिया जाए!"
देखते ही देखते महल की प्राचीरें अपनों के ही खून से लाल हो गईं।
रतन सिंह ने उन वफादार सैनिकों को मार डाला जिन्होंने डर के मारे ही सही, पर सालों उनकी सेवा की थी। यह तो बस उस खूनी खेल की शुरुआत थी।
अध्याय: कृतघ्नता की पराकाष्ठा
महल की सुख-सुविधाओं और रेशमी बिस्तरों पर लेटे हुए भी रतन सिंह को नींद नहीं आ रही थी। उनके दिमाग में बार-बार पार्वती का वह इंकार और हृदय राम की वे खरी-खोटी बातें गूँज रही थीं।
अब उनके मन में पार्वती के लिए कोई 'रानी' जैसा सम्मान नहीं बचा था। कामवासना की आग अब 'प्रतिशोध की ज्वाला' बन चुकी थी। उन्होंने अकेले में बुदबुदाते हुए कहा:
"उस बंजारन की इतनी हिम्मत कि मुझे धक्का दे? अब वह मेरी रानी नहीं बनेगी।
अब उसे मेरी दासी बनना होगा। मैं उसके घमंड को मिट्टी में मिला दूँगा और उस कबीले को यह सिखाऊँगा कि जागीरदार रतन सिंह से टकराने का अंजाम क्या होता है!"
रघु काका की आँखों में वह भयानक मंज़र तैर गया जब विनाश की पहली चिंगारी भड़की थी। उन्होंने कांपते हुए स्वर में कहानी को आगे बढ़ाया:
अध्याय: जलता हुआ प्रतिशोध और अनचाहा निमंत्रण
जागीरदार रतन सिंह के दिन अब चैन से नहीं गुज़र रहे थे। महल की ऐश-ओ-आराम की चीज़ें उन्हें चुभने लगी थीं। 
उनके पिता, जो उस समय के मुख्य जागीरदार थे, उनके रहते रतन सिंह खुलकर अपनी क्रूरता नहीं दिखा पा रहे थे।
पर उनके सीने में जल रही वह कामवासना और प्रतिशोध की आग उन्हें अंदर ही अंदर जला रही थी। 
वे बस उस एक मौके की तलाश में थे जब वे उस कबीले का नामो-निशान मिटा सकें।
तभी एक दोपहर, राजदरबार में बंजारों के कबीले का एक साधारण सा आदमी पहुँचा। 
उसके चेहरे पर सादगी थी और वह कबीले की उस खुशहाली से बेखबर था जो अब खत्म होने वाली थी। उसने झुककर सलाम किया और बड़े गर्व से कहा:
"राजा साहब की जय हो! हमारे कबीले के सरदार हृदय राम ने यह निमंत्रण भेजा है।
उनकी लाडली बेटी पार्वती की शादी तय हो गई है। यह उसकी शादी की चिट्ठी है। अगर आपको अच्छा लगे, 
तो आप इस तुच्छ सेवक की अर्ज़ी स्वीकार करें और हमारे कबीले में पधारकर अपनी बेटी को आशीर्वाद दें।"
अध्याय: ज़ख्म पर नमक और सुलगता अहंकार
जैसे ही 'शादी' और 'पार्वती' शब्द रतन सिंह के कानों में पड़े, उनके चेहरे का रंग बदल गया। वह चिट्ठी उन्हें किसी आशीर्वाद की तरह नहीं, 
बल्कि एक जलते हुए अंगारे जैसी लगी। जिस पार्वती को वे अपनी दासी बनाने का सपना देख रहे थे, वह अब किसी और की होने जा रही थी?
दरबार में मौजूद बाकी लोग तो खुश हुए, लेकिन रतन सिंह के दांत पीसने की आवाज़ सन्नाटे में साफ़ सुनाई दी।
उन्होंने वह चिट्ठी अपने हाथ में ली और उसे इतनी ज़ोर से भींचा कि कागज़ के टुकड़े हो गए।
रतन सिंह ने मन ही मन सोचा— "शादी? उत्सव? जिस लड़की ने जागीरदार का अपमान किया, वह डोली में बैठकर किसी और के घर जाएगी? 
कभी नहीं! उसकी डोली तो उठेगी, पर वह सुहाग के घर नहीं, बल्कि मेरे पैरों की दासी बनने के लिए मेरे तहखाने में आएगी।"
हवेली की दीवारों पर गिरती सुबह की हल्की रोशनी अब किसी मातम की सफेदी जैसी लगने लगी थी। रघु काका की आवाज़ में वह दर्द था,
जिसे सुनकर पत्थर का दिल भी पिघल जाए। उन्होंने रश्मि की आँखों में झाँकते हुए इस खूनी दास्ताँ का आखिरी और सबसे खौफनाक पन्ना खोला।
अध्याय: विश्वासघात का मंडप और खूनी शहनाई
रघु काका ने काँपते स्वर में कहा, "नियति का खेल देखो बेटा, रतन सिंह को जिस मौके की तलाश थी, वह उसे उसके पिता ने ही दे दिया। 
जागीरदार साहब अपनी पत्नी के साथ तीर्थ यात्रा पर निकल गए और कबीले की शादी की ज़िम्मेदारी रतन सिंह को सौंप दी। 
रतन सिंह के चेहरे पर उस वक्त जो मुस्कान थी, वह दुआ की नहीं, बल्कि तबाही की थी। उसने मन ही मन कहा, 'पिताजी, आप तो पुण्य कमाने जा रहे हैं, पर मैं उस कबीले का वह पाप करूँगा जिसे इतिहास कभी माफ़ नहीं करेगा।'"
उधर कबीले में खुशियों का सैलाब उमड़ा था। पार्वती अपने बचपन के साथी लच्छू के साथ सात फेरों के बंधन में बँध रही थी। 
लच्छू एक नेक दिल और बहादुर नौजवान था। मंडप सजा था, ढोल बज रहे थे और जैसे ही लच्छू ने पार्वती की माँग में सिंदूर भरा,
कबीले वालों ने जयकारे लगाए। पर उन्हें क्या पता था कि उन जयकारों को दबाने के लिए मौत के घोड़ों की टापें करीब आ रही हैं।
अध्याय: नरसंहार और वहशीपन का तांडव