"कहते हैं... दुनिया में सबसे मज़बूत रिश्ता दो बहनों का होता है। एक बहन दूसरी बहन के लिए अपनी जान तक देने को तैयार रहती है। लेकिन अगर वही बहन... आपकी सौतन बन जाए... तो सोचिए उस दर्द का क्या होगा?"
"यह कहानी है दो सगी बहनों—निशा और मधु की। दोनों में सिर्फ एक साल का फर्क था। दोनों एक-दूसरे के बिना एक पल भी नहीं रह सकती थीं। लेकिन किस्मत ने ऐसा खेल खेला... कि एक दिन छोटी बहन ने अपनी ही बड़ी बहन का सुहाग छीन लिया। और फिर... जो हुआ... उसने पूरे परिवार की ज़िंदगी बदल दी।"
निशा और मधु बचपन से ही एक-दूसरे की सबसे अच्छी दोस्त थीं।
अगर निशा को नई चूड़ियाँ मिलतीं... तो वह आधी मधु को पहना देती।
अगर मधु के पास मिठाई आती... तो पहला टुकड़ा हमेशा अपनी दीदी को खिलाती।
माँ अक्सर मुस्कुराकर कहती थीं...
"भगवान करे... तुम दोनों का प्यार कभी कम न हो।"
दोनों हँसकर कहतीं...
"माँ... हम दोनों को कोई अलग नहीं कर सकता।"
समय बीतता गया।
निशा बड़ी हुई तो उसकी शादी शहर के एक अमीर और पढ़े-लिखे युवक रमेश से हो गई।
शादी के बाद निशा बहुत खुश थी।
रमेश भी शुरू-शुरू में उसका बहुत ख्याल रखता था।
दो साल बाद...
घर में एक और खुशखबरी आई।
डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा...
"बधाई हो... आप माँ बनने वाली हैं।"
यह सुनते ही निशा की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।
पूरे घर में मिठाइयाँ बँटीं।
लेकिन...
जैसे-जैसे गर्भ बढ़ने लगा...
डॉक्टर ने साफ़ कह दिया...
"निशा को पूरा आराम चाहिए। ज़्यादा काम करना बच्चे के लिए ठीक नहीं होगा।"
रमेश ने तुरंत कहा...
"निशा... मैं सोच रहा हूँ, कुछ महीनों के लिए मधु को बुला लेते हैं। तुम्हें भी सहारा मिल जाएगा।"
निशा मुस्कुराई...
"हाँ... मेरी छोटी बहन आ जाएगी तो मुझे किसी बात की चिंता नहीं रहेगी।"
अगले ही दिन...
मधु अपनी बहन के घर आ गई।
दरवाज़े पर पहुँचते ही उसने निशा को गले लगा लिया।
"दीदी... अब आप सिर्फ आराम करेंगी। घर की सारी ज़िम्मेदारी मेरी।"
निशा की आँखों में प्यार था...
उसे क्या पता था...
जिस बहन पर वह सबसे ज़्यादा भरोसा कर रही है...
वही बहन...
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मधु के आने के बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल गया।
सुबह सबसे पहले वह उठती...
पूरे घर की सफाई करती...
फिर रसोई में जाकर सबके लिए नाश्ता बनाती।
निशा को समय पर दवा देती...
फल काटकर खिलाती...
और हर समय उसका ख्याल रखती।
निशा अक्सर मुस्कुराकर कहती...
निशा: "मधु... तू नहीं होती तो पता नहीं मैं कैसे संभालती।"
मधु: "दीदी... आप ऐसी बातें मत किया करो। आपकी सेवा करना मेरा फर्ज़ है।"
रमेश भी यह सब देख रहा था।
उसे मधु की सादगी और हँसमुख स्वभाव अच्छा लगने लगा।
एक दिन...
रमेश ऑफिस से लौटा।
निशा सो रही थी।
मधु रसोई में चाय बना रही थी।
रमेश मुस्कुराकर बोला...
रमेश: "मधु... तुम्हारे हाथ की चाय में कुछ अलग ही स्वाद है।"
मधु हँस पड़ी।
मधु: "जीजाजी... चाय वही है, बस आपको आज ज़्यादा भूख लगी होगी।"
दोनों हँस पड़े।
यह सब निशा ने नहीं देखा...
लेकिन किस्मत चुपचाप एक नया खेल लिख रही थी।
धीरे-धीरे...
रमेश अब छोटी-छोटी बातों के लिए भी मधु को आवाज़ देने लगा।
"मधु... मेरी फाइल कहाँ है?"
"मधु... ज़रा पानी देना।"
"मधु... आज चाय तुम ही बना देना।"
शुरुआत में यह सब सामान्य लगा...
लेकिन कुछ दिनों बाद...
यह आदत बन गई।
एक शाम...
तेज़ बारिश हो रही थी।
बिजली चली गई।
निशा अपने कमरे में आराम कर रही थी।
मधु बरामदे में कपड़े समेट रही थी।
अचानक उसका पैर फिसला...
वह गिरने ही वाली थी...
तभी रमेश ने उसका हाथ पकड़ लिया।
कुछ पल...
दोनों की नज़रें एक-दूसरे से मिलीं।
मधु ने तुरंत अपना हाथ छुड़ा लिया।
मधु: "ध... धन्यवाद जीजाजी..."
उस रात...
दोनों को नींद नहीं आई।
उधर...
निशा अपने आने वाले बच्चे के सपने देख रही थी।
उसे क्या पता था...
जिस घर को वह अपना स्वर्ग समझ रही है...
उसी घर की नींव में दरार पड़ चुकी थी।
दिन बीतते गए।
अब रमेश ऑफिस से लौटते ही सबसे पहले मधु को ढूँढ़ता।
मधु भी चाहकर उससे दूरी नहीं बना पा रही थी।
उसे बार-बार लगता...
"नहीं... ये गलत है... ये मेरी दीदी का घर है..."
लेकिन...
दिल और दिमाग की लड़ाई में...
धीरे-धीरे दिल जीतने लगा...
और एक दिन...
ऐसा हुआ...
जिसने दो बहनों की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी...
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