ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत खरीदारी कपड़ों या गहनों की नहीं होती...
वह होती है उन सपनों की, जिन्हें दो लोग मिलकर अपनी आने वाली ज़िंदगी के लिए चुनते हैं।
सगाई में अब सिर्फ़ कुछ ही दिन बाकी थे।
दोनों परिवार तैयारियों में पूरी तरह व्यस्त थे। घर में हर रोज़ कोई न कोई नई चर्चा होती—कभी मेहमानों की सूची, कभी मिठाइयों की, तो कभी सजावट की।
उधर रुशाली अपनी ज़िम्मेदारियों में पहले की तरह पूरी ईमानदारी से लगी हुई थी। जिले की डीएम होने के कारण हर दिन नई चुनौतियाँ उसका इंतज़ार करती थीं। मीटिंग, निरीक्षण, जनसुनवाई और फाइलों के बीच उसका पूरा दिन कब बीत जाता, उसे खुद भी पता नहीं चलता।
दूसरी तरफ़ डॉ. मयूर भी अस्पताल में लगातार व्यस्त थे। मरीजों की लंबी कतार, ऑपरेशन और इमरजेंसी के बीच उन्हें भी मुश्किल से अपने लिए समय मिल पाता था।
लेकिन इन सबके बावजूद...
दिन में चाहे एक बार ही सही, दोनों एक-दूसरे का हाल पूछना कभी नहीं भूलते थे।
उस दिन शाम के लगभग पाँच बज चुके थे।
रुशाली अपनी आख़िरी फाइल पढ़ रही थी। उसने दस्तख़त किए और फाइल बंद करके कुर्सी से थोड़ा पीछे टिक गई।
इतने में उसका मोबाइल हल्का-सा वाइब्रेट हुआ।
स्क्रीन पर नाम चमक रहा था—
My Akdu ❤️
उसके होंठों पर अनायास मुस्कान आ गई।
उसने तुरंत कॉल रिसीव की।
"जी डॉक्टर साहब।"
उधर से मयूर की हँसती हुई आवाज़ आई—
"लगता है आज डीएम साहिबा का मूड अच्छा है।"
"ऐसा क्यों लगा आपको?"
"क्योंकि आज बिना किसी औपचारिकता के सीधे 'डॉक्टर साहब' कहा गया है।"
रुशाली मुस्कुरा दी।
"अच्छा... अब बताइए, फोन किस लिए किया है?"
"बहुत ज़रूरी काम है।"
उन्होंने जानबूझकर गंभीर आवाज़ बनाई।
रुशाली भी साथ निभाते हुए बोली,
"इतनी गंभीर आवाज़... कहीं हॉस्पिटल से कोई इमरजेंसी तो नहीं?"
"इमरजेंसी है..."
"क्या?"
"सगाई की शॉपिंग।"
रुशाली अपनी हँसी नहीं रोक पाई।
"मयूर सर... आप भी ना!"
मयूर भी हँस पड़े।
"तो मैडम जी, आदेश दीजिए। आज आपकी ड्यूटी खत्म हुई या अभी भी जिले की जनता ने आपको रोक रखा है?"
"बस पाँच मिनट और।"
"ठीक है। मैं कलेक्टरेट के बाहर इंतज़ार कर रहा हूँ।"
रुशाली एकदम चौंकी।
"क्या? आप बाहर हैं?"
"जी हाँ। पूरे दस मिनट से।"
"अरे तो... पहले बताया क्यों नहीं?"
"अगर बता देता, तो आप कहतीं—'आपको आने की क्या ज़रूरत थी?' इसलिए सोचा, पहले आ ही जाता हूँ।"
रुशाली ने हल्की-सी नाराज़गी जताई।
"आप डॉक्टर हैं... ऐसे बिना बताए नहीं आना चाहिए।"
मयूर सर ने मुस्कुराकर कहा,
"और आप डीएम हैं... इसलिए आपको लेने आने का मन और ज़्यादा करता है।"
रुशाली कुछ क्षण चुप रह गई।
उसके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों में अपनापन साफ़ दिखाई दे रहा था।
"बस पाँच मिनट..." उसने धीरे से कहा।
"मैं इंतज़ार कर सकता हूँ, मैडम जी। पाँच साल किया है... पाँच मिनट क्या चीज़ है।"
यह सुनकर रुशाली के चेहरे पर वही मुस्कान लौट आई, जिसमें बरसों का विश्वास बसता था।
उसने कॉल काटी और जल्दी-जल्दी अपनी मेज़ समेटने लगी।
ऑफिस से बाहर निकलते समय हर कर्मचारी ने आदर से उन्हें नमस्ते किया।
रुशाली ने हमेशा की तरह मुस्कुराकर सबका अभिवादन स्वीकार किया।
जैसे ही वह मुख्य द्वार से बाहर निकली, सामने सफ़ेद रंग की कार के पास खड़े मयूर दिखाई दिए।
हल्की नीली शर्ट, कलाई पर घड़ी और चेहरे पर वही शांत मुस्कान...
रुशाली कुछ पल उन्हें देखती रह गई।
मयूर सर ने घड़ी की तरफ़ देखा और मुस्कुराते हुए बोले,
"चार मिनट... पचपन सेकंड।"
रुशाली ने भौंहें चढ़ाकर पूछा,
"आपने सच में समय देखा?"
"बिल्कुल।"
"इतना हिसाब कौन रखता है?"
मयूर सर ने हँसते हुए जवाब दिया,
"डॉक्टर... और शायद वह इंसान, जिसे किसी का इंतज़ार अच्छा लगता हो।"
रुशाली मुस्कुरा दी।
"अच्छा! तो आज डॉक्टर साहब बड़े शायर बन रहे हैं।"
"असर संगत का है, मैडम जी।"
दोनों हँस पड़े।
मयूर सर ने आगे बढ़कर कार का दरवाज़ा खोला।
"आइए।"
रुशाली ने मुस्कुराकर कहा,
"थैंक यू... डॉक्टर साहब।"
"वेलकम, मैडम जी।"
गाड़ी धीरे-धीरे शहर की सड़कों पर चलने लगी।
बाहर शाम ढल रही थी।
सड़क किनारे जगमगाती दुकानें, चाय की खुशबू और लोगों की चहल-पहल पूरे शहर को एक अलग ही रंग दे रही थी।
कुछ देर तक दोनों खिड़की के बाहर देखते रहे।
फिर मयूर सर ने धीरे से पूछा,
"एक बात बताओ?"
"हूँ..."
"सगाई को लेकर सबसे ज़्यादा उत्साहित कौन है?"
रुशाली ने बिना सोचे जवाब दिया,
"माँ।"
"और दूसरे नंबर पर?"
रुशाली ने उनकी तरफ देखा।
"शायद... आप।"
मयूर सर ने बनावटी नाराज़गी दिखाई।
"'शायद' क्यों?"
रुशाली मुस्कुराई।
"क्योंकि डॉक्टर साहब अपनी खुशी छिपाने की बहुत कोशिश करते हैं।"
"और क्या मैं सफल हो जाता हूँ?"
"बिल्कुल नहीं।"
"इतनी आसानी से पढ़ लेती हो मुझे?"
रुशाली ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,
"जो लोग दिल के करीब होते हैं न... उन्हें समझने के लिए शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती।"
मयूर सर कुछ क्षण चुप रहे।
फिर धीमे से बोले,
"तुम्हें पता है, रुशाली... मुझे सबसे ज़्यादा खुशी इस बात की है कि हम अपनी नई ज़िंदगी की शुरुआत भी वैसे ही कर रहे हैं, जैसे हमेशा जीना चाहते थे—बिना दिखावे के, अपने लोगों के साथ।"
रुशाली ने सहमति में सिर हिलाया।
"और सबसे बड़ी बात... इस सफ़र में हम अकेले नहीं हैं। हमारे परिवार भी हमारे साथ हैं।"
मयूर सर ने मुस्कुराकर कहा,
"यही तो सबसे बड़ी दौलत है।"
कुछ ही देर बाद कार शहर के सबसे बड़े शॉपिंग मॉल के सामने जाकर रुकी।
मयूर सर ने इंजन बंद किया और मुस्कुराते हुए कहा,
"तो चलें, मैडम जी?"
रुशाली ने सामने चमचमाती रोशनी की ओर देखा, फिर मयूर सर की तरफ़ मुस्कुराकर बोली,
"चलिए, डॉक्टर साहब... आज देखते हैं, शॉपिंग में आपका इलाज कौन करता है—मैं या दुकानदार।"
दोनों हँसते हुए कार से उतरे...
और साथ-साथ मॉल के अंदर की ओर बढ़ गए।
क्रमशः...