काश हम अजनबी होते तो खुश होते - 2 Avinash द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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काश हम अजनबी होते तो खुश होते - 2

भाग २: धुंध की ओट से धूप तक

(यह कहानी का दूसरा भाग है । माफी चाहता हु थोड़ी देर हो गई कहानी लिखने मै)

 बालकनी की ठंडी हवा गीता के आंसुओं को सुखा चुकी थी, लेकिन उसके भीतर का खालीपन और गहरा हो गया था। सुबह की पहली किरण ने जब कोहरे को चीरकर बालकनी के फर्श पर दस्तक दी, तो गीता ने एक लंबी सांस ली। वह पीछे मुड़ी और रसोई की तरफ चल दी। आदतें इंसान को भावना शून्य होने पर भी रोबोट की तरह चलाना जानती हैं। चाय की केतली गैस पर चढ़ी, पानी उबला, और चाय की पत्ती का रंग पानी में घुलने लगा—ठीक वैसे ही जैसे पिछले तीन सालों से उसकी खुद की पहचान प्रवीन के संकुचित दायरे में घुलती जा रही थी।

कमरे में प्रवीन वैसे ही बैठा था, जैसे गीता उसे छोड़ कर गई थी। रात भर वह सो नहीं पाया था। गीता के वे शब्द—"काश हम अजनबी होते तो खुश होते"—उसके कानों में किसी पिघले हुए सीसे की तरह गूंज रहे थे। जब गीता चाय के दो कप लेकर कमरे में आई, तो प्रवीन ने उसकी तरफ देखा। गीता की आँखें सूजी हुई थीं, लेकिन चेहरा बिल्कुल शांत था। यह वह शांति थी जो किसी बड़े तूफान के गुजर जाने के बाद आती है।

"चाय पी लो," गीता ने कप टेबल पर रखते हुए कहा। उसकी आवाज में न कोई शिकायत थी, न कोई टोन।
प्रवीन ने कप उठाया, चाय का एक घूंट लिया और कहा, "गीता, आज मैं बैंक नहीं जा रहा हूँ। मैंने लीव अप्लाई कर दी है।"
गीता ने अपनी चाय की चुस्की ली, खिड़की के बाहर देखा और बेहद ठंडे स्वर में कहा, "क्यों? ऑडिट तो खत्म हो गया होगा ना? ऑफिस जाओ प्रवीन। जबरदस्ती का यह वक्त अब हमारे बीच की कड़वाहट को कम नहीं करेगा, बल्कि हमें और असहज बनाएगा।"
प्रवीन को लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर वार कर दिया हो। जो गीता कभी उसके एक दिन घर पर रुकने के लिए हफ्तों मिन्नतें करती थी, आज वही उसे ऑफिस जाने को कह रही थी। उसने कप साइड में रखा और गीता के करीब आकर बैठ गया। "गीता, प्लीज ऐसा मत कहो। मैं मानता हूँ मुझसे गलती हुई। मैं काम में इतना खो गया कि यह भूल गया कि इस घर को सिर्फ पैसों की नहीं, तुम्हारी मुस्कान की भी जरूरत है। मुझे एक मौका दो।"
गीता ने प्रवीन की आँखों में देखा। वहाँ पछतावा था, शायद थोड़ा डर भी था। पर गीता का दिल जैसे थक चुका था। उसने कहा, "प्रवीन, जब कोई पौधा पानी न मिलने से एक बार सूख जाता है ना, तो उसमें अचानक बहुत सारा पानी डाल देने से वह दोबारा हरा-भरा नहीं होता। उसकी जड़ें सड़ जाती हैं। हमारे रिश्ते की जड़ें भी संवादहीनता की वजह से सड़ रही हैं। तुम आज घर पर रुकोगे, हम शायद कुछ बातें करेंगे, शायद तुम मुझे बाहर डिनर पर ले जाओगे। पर कल क्या? कल फिर वही बैंक, वही लोन के केसेस, और वही 'हाँ', 'हूँ' का सन्नाटा। मुझे इस एक दिन के दिखावे के पैच-वर्क से डर लगता है।"

प्रवीन के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। वह जानता था कि गीता सही कह रही थी। वह उठ खड़ा हुआ और बिना कुछ कहे तैयार होने चला गया। आधे घंटे बाद जब वह घर से निकला, तो उसने गीता से नजरें नहीं मिलाईं।

दिन बीतते गए, और घर का माहौल उस सर्द दिसंबर की तरह ही जमा हुआ रहा। दोनों एक ही छत के नीचे रहते थे, लेकिन उनके बीच की दूरी अब और स्पष्ट हो गई थी। प्रवीन अब वक्त पर घर आने लगा था, वह कोशिश करता था कि गीता से बात करे, लेकिन गीता की तरफ से सिर्फ औपचारिक जवाब मिलते। दोनों के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी हो चुकी थी।
एक शाम, प्रवीन जब घर लौटा, तो उसने देखा कि घर का पूरा हुलिया बदला हुआ था। लिविंग रूम की दीवारों पर लगी उनकी शादी की तस्वीरें हटा दी गई थीं। उसकी जगह कुछ खूबसूरत लैंडस्केप और पेंटिंग्स लगी हुई थीं। अलमारी में से गीता की कुछ साड़ियाँ गायब थीं। प्रवीन का दिल जोरों से धड़कने लगा। वह घबराकर बेडरूम की तरफ भागा।

गीता वहाँ एक छोटा सूटकेस पैक कर रही थी।
"यह सब क्या है गीता? तुम कहाँ जा रही हो?" प्रवीन की आवाज में घबराहट और डर साफ था।
गीता ने सूटकेस की जिप बंद की और शांति से प्रवीन की तरफ देखा। "मैं कुछ दिनों के लिए ऋषिकेश जा रही हूँ। मेरी सहेली अंजलि वहाँ एक एनजीओ चलाती है, जो बच्चों को पढ़ाता है और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाता है। उसने मुझे वहाँ कुछ समय के लिए बच्चों को हिंदी और कविताएं सिखाने के लिए बुलाया है।"
"लेकिन मुझसे बिना पूछे? इस तरह अचानक?" प्रवीन का पारा थोड़ा चढ़ गया।

"प्रवीन, अगर मैं पूछती, तो तुम क्या कहते? 'मत जाओ', 'घर पर कौन रहेगा', 'लोग क्या कहेंगे'—यही ना?" गीता ने बेहद शांत स्वर में कहा। "मैं भाग नहीं रही हूँ, और न ही मैं तुम्हें तलाक दे रही हूँ। मैं बस खुद को ढूंढने जा रही हूँ। इस घर में रहते हुए मैं एक ऐसी अजनबी बन गई हूँ जिसे मैं खुद नहीं पहचानती। मुझे कुछ समय अकेले चाहिए, यह समझने के लिए कि क्या हमारे इस रिश्ते में अब भी कोई जान बची है, या हम सिर्फ एक लाश को ढो रहे हैं।"
प्रवीन ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की, वादे किए, कसमें खाईं, लेकिन गीता का फैसला पक्का था। अगली सुबह, वह एक अजनबी की तरह ही प्रवीन को 'अलविदा' कहकर घर से निकल गई।

ऋषिकेश की वादियाँ और गंगा का किनारा। यहाँ की हवा में दिल्ली की उस घुटन भरी ठंड जैसी बात नहीं थी, यहाँ एक रूहानी सुकून था। गीता को एनजीओ में बच्चों के साथ वक्त बिताना बेहद पसंद आ रहा था। जब वह बच्चों को अपनी लिखी कविताएं सुनाती, और बच्चे अपनी मासूम आँखों से उसे देखते, तो गीता को लगता कि उसके भीतर की सूखी नदी में फिर से पानी लौटने लगा है।

यहाँ वह आजाद थी। कोई घड़ी देखकर खाना बनाने की मजबूरी नहीं थी, किसी के आने का आठ-आठ घंटे इंतजार नहीं करना था। उसने अपनी डायरी में फिर से लिखना शुरू कर दिया था।
दूसरी तरफ, दिल्ली में प्रवीन की जिंदगी पूरी तरह बिखर चुकी थी। घर में कदम रखते ही उसे वह सन्नाटा काटने को दौड़ता, जिसे उसने खुद सालों तक नजरअंदाज किया था। अब घर में कोई नहीं था जो रात के बारह बजे भी उसके लिए गर्म खाना लेकर टेबल पर इंतजार करे। कोई नहीं था जो उसकी थकी हुई आँखों को देखकर बिना कहे चाय का कप आगे बढ़ा दे।

एक रात, प्रवीन ने रसोई में जाकर खुद के लिए खिचड़ी बनाने की कोशिश की। बर्तन ढूंढते हुए उसके हाथ से कांच का एक मर्तबान छूटकर गिर गया और टूट गया। प्रवीन वहीं फर्श पर बैठ गया और फूट-फूटकर रोने लगा। उसे अहसास हुआ कि उसने क्या खो दिया था। गीता सिर्फ उसकी पत्नी नहीं थी, वह इस घर की आत्मा थी, जिसे उसने अपनी व्यस्तता के अंधेरे कुएं में धकेल दिया था।
उसने अपना फोन उठाया और गीता को मैसेज किया:

"गीता, मैं आज उस रसोई में अकेला बैठा हूँ जहाँ तुम सालों तक मेरे लिए जागती रहीं। मुझे आज समझ आया कि अजनबी होना क्या होता है। जब तुम यहाँ थीं, तब मैं अजनबी था। आज जब तुम नहीं हो, तो यह पूरा घर मेरे लिए अजनबी हो गया है। मैं तुम्हें परेशान नहीं करूँगा, बस यह बताना चाहता था कि मुझे तुम्हारी कमी हर सांस में महसूस हो रही है।"

गीता ने वह मैसेज पढ़ा। उसकी आँखों में आंसू आ गए, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। वह जानती थी कि बदलाव शब्दों से नहीं, समय और अहसास से आता है।
तीन महीने बीत गए। मार्च का महीना आ चुका था और पहाड़ों पर बर्फ पिघलने लगी थी। गीता का ऋषिकेश का प्रोजेक्ट खत्म हो चुका था। उसने दिल्ली वापस लौटने का फैसला किया, लेकिन इस बार वह एक बदली हुई गीता थी। उसके भीतर अब वह लाचारी नहीं थी, बल्कि एक नई आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास था।
जब वह दिल्ली के अपने फ्लैट के बाहर पहुँची, तो उसका दिल थोड़ा घबरा रहा था। उसने चाबी निकाली और दरवाजा खोला।
घर के भीतर का नजारा देखकर वह हैरान रह गई। घर बिल्कुल साफ-सुथरा था। दीवारों पर उनकी शादी की तस्वीरें वापस अपनी जगह पर लगी थीं, लेकिन इस बार उनके साथ गीता की कुछ अकेले मुस्कुराती हुई तस्वीरें और उसकी कविताओं के कुछ अंश भी फ्रेम कराकर लगाए गए थे। लिविंग रूम के कोने में एक छोटी सी बुकशेल्फ़ बनी थी, जहाँ गीता की मनपसंद किताबें करीने से सजी थीं।

तभी रसोई से प्रवीन बाहर आया। उसके हाथ में एप्रन बंधा था और चेहरे पर एक संकोची मुस्कान थी।
"तुम... तुम आ गईं?" प्रवीन की आवाज में वही धड़कन थी जो कॉलेज के दिनों में गीता को पहली बार देखने पर होती थी।
"यह सब क्या है प्रवीन?" गीता ने चारों तरफ देखते हुए पूछा।
प्रवीन आगे बढ़ा, लेकिन इस बार उसने गीता का हाथ नहीं थामा, बल्कि उसके सामने थोड़ी दूरी बनाकर खड़ा रहा। उसने कहा, "गीता, तुमने कहा था ना कि काश हम अजनबी होते तो खुश होते? इन तीन महीनों में मैंने तुम्हारी उस बात पर बहुत सोचा। और मुझे समझ आया कि तुम सही थीं। हमारा पुराना रिश्ता मर चुका था। इसलिए, मैंने उस पुराने प्रवीन को वहीं छोड़ दिया।"
उसने टेबल की तरफ इशारा किया, जहाँ मटर-पनीर और खीर बनी हुई रखी थी। खुशबू बिल्कुल वैसी ही थी जैसी गीता की रसोई से आती थी।

"मैंने यूट्यूब से देखकर यह सब बनाया है। शायद उतना स्वादिष्ट न हो, पर कोशिश की है," प्रवीन ने अपनी आँखें झुकाते हुए कहा। फिर उसने गीता की तरफ देखा, उसकी आँखों में अब कोई औपचारिकता नहीं थी, बल्कि एक गहरा समर्पण था।
"गीता, क्या हम उस पुराने, थके हुए रिश्ते को भूलकर... एक नई शुरुआत कर सकते हैं? एक ऐसी शुरुआत जहाँ हम फिर से एक-दूसरे को जानना शुरू करें? तुम्हारी कविताएं, मेरी बैंक की उलझनें... सब कुछ साझा करें। क्या तुम इस अजनबी को खुद से दोबारा दोस्ती करने का एक मौका दोगी?"
गीता ने प्रवीन को देखा। उसकी शर्ट की आस्तीन पर हल्दी के दाग लगे थे, और चेहरे पर अपनी पत्नी को वापस पाने की एक मासूम सी जिद थी। गीता के दिल की जमी हुई बर्फ पिघलने लगी। वह समझ गई कि जड़ें पूरी तरह नहीं सड़ी थीं, उन्हें बस सही धूप और देखभाल की तलाश थी।

गीता के होठों पर एक हल्की, सच्ची मुस्कान उभर आई। उसने अपना सूटकेस साइड में रखा, प्रवीन की तरफ कदम बढ़ाए और कहा, "नमस्ते प्रवीन जी। मेरा नाम गीता है। मुझे कविताएं लिखना पसंद है... क्या आप मुझे अपनी पसंदीदा चाय पिलाएंगे?"
प्रवीन की आँखों से खुशी का एक आंसू छलक पड़ा। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "बिल्कुल, गीता जी। हमारे पास पूरी जिंदगी पड़ी है, एक-दूसरे को जानने के लिए।"
बाहर मार्च की गुनगुनी धूप खिड़की के कांच को पार कर कमरे के भीतर आ चुकी थी, और इस बार कमरे का सन्नाटा हमेशा के लिए टूट चुका था।


Note: आशा करता हु आपको यह कहानी पसंद आयी हो |
यह सिर्फ कहानी नहीं है, बल्कि आजके दौर की हकीकत है। रिश्तों में दुरिया बढ़ती जा रही है। एक दूसरे से बात करने के लिए वक्त नहीं मिल राहा। अगर आपके जीवन में भी कुछ ऐसा ही चल रहा हैं तो चुपचा ना बैठे। 

सही वक्त पर अपने मन की बाते अपने पति/पत्नी से बोल दे। उनके साथ वक्त साझा करे। हमेशा याद रखना "Communication is the key".

अलविदा मेरे प्यारे वाचकों, मिलते है अगली कहानी के साथ ।

धन्यवाद आपके अमुल्य वक्त के लिए 🙏🏻

लेखक:
Avinash Gondukupe
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