अधूरी किताब: एक रूहानी दास्तान। - एपिसोड 45 kajal jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी किताब: एक रूहानी दास्तान। - एपिसोड 45


अधूरी किताब: एक रूहानी दास्तान


एपिसोड 45


 विस्मृत दीप का रहस्य

समुद्र का जल दो भागों में बँट चुका था।

कथा-नौका धीरे-धीरे उस मार्ग पर आगे बढ़ रही थी, जो मानो सदियों से किसी के आने की प्रतीक्षा कर रहा था। चारों ओर उठती जल-दीवारें किसी महल की विशाल दीवारों जैसी दिखाई दे रही थीं। उन लहरों के भीतर अनगिनत चेहरे उभरते और अगले ही क्षण विलीन हो जाते।

अनन्या बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी।

हर बार उसे लगता, जैसे कोई अदृश्य शक्ति उनका पीछा कर रही हो।

लेकिन जब भी वह ध्यान से देखती...

वहाँ केवल समुद्र होता।

कुछ देर बाद धुंध हटने लगी।

और पहली बार...

विस्मृत दीप पूरी तरह दिखाई दिया।

सभी कुछ क्षणों के लिए नि:शब्द रह गए।

द्वीप किसी सामान्य भूमि जैसा नहीं था।

उसकी मिट्टी चाँदी की तरह चमक रही थी।

पेड़ों की शाखाओं पर पत्ते नहीं, बल्कि पारदर्शी काँच जैसे पन्ने लटक रहे थे।

जब हवा चलती, तो उन पन्नों से शब्दों की ध्वनि निकलती—

कहीं हँसी...

कहीं रोना...

कहीं अधूरी प्रेम-कहानियाँ...

कहीं युद्ध की अंतिम पुकार...

आर्यव ने धीमे स्वर में कहा—

"यही है वह स्थान..."

"जहाँ दुनिया की हर भूली हुई कहानी जीवित रहती है।"

नाव किनारे लगते ही सभी उतर गए।

जैसे ही अनन्या ने द्वीप की मिट्टी पर पहला कदम रखा...

पूरी भूमि सुनहरी रोशनी से चमक उठी।

मानो स्वयं द्वीप ने उसे पहचान लिया हो।

दूर खड़ा स्मृति-वृक्ष धीरे-धीरे प्रकाश फैलाने लगा।

उसकी लाखों शाखाओं पर लटके कागज़ एक साथ हवा में लहराने लगे।

उन पर लिखे शब्द चमकने लगे।

समर ने आश्चर्य से कहा—

"मैंने ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा..."

आर्यव ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—

"क्योंकि स्मृति-वृक्ष केवल अपने वास्तविक उत्तराधिकारी के आने पर जागता है।"

अनन्या के कदम अपने आप उस वृक्ष की ओर बढ़ने लगे।

उसे लग रहा था जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे बुला रही हो।

लेकिन तभी...

धरती काँप उठी।

स्मृति-वृक्ष की सबसे ऊपरी शाखा अचानक काली पड़ गई।

उसके बाद दूसरी...

फिर तीसरी...

कुछ ही क्षणों में वृक्ष का आधा भाग अंधकार में डूब गया।

अधूरी किताब हवा में उठी।

उसके पन्ने तेजी से पलटे।

फिर एक चेतावनी उभरी—

"निराकार पहुँच चुका है।"

"स्मृतियों का क्षय आरम्भ हो गया है।"

अचानक पूरे द्वीप में एक भयावह गर्जना गूँज उठी।

आकाश में काले बादल उमड़ आए।

समुद्र की लहरें असामान्य रूप से ऊँची होने लगीं।

और वृक्ष की जड़ों के पास की भूमि फट गई।

उस दरार से काला धुआँ निकलने लगा।

धीरे-धीरे वह धुआँ एक विशाल मानवाकार आकृति में बदल गया।

लेकिन उसका चेहरा नहीं था।

सिर्फ दो लाल आँखें थीं।

निराकार का छाया-अवतार।

उसने गूँजती आवाज़ में कहा—

"मैंने सोचा था..."

"तुम लोग यहाँ तक कभी नहीं पहुँच पाओगे।"

विराज ने अपनी तलवार निकाल ली।

समर और आर्यव भी युद्ध के लिए तैयार हो गए।

लेकिन निराकार हँसा।

"तुम लोग अब भी समझते हो कि मुझे तलवार से हराया जा सकता है?"

उसने अपना हाथ हवा में उठाया।

पूरा स्मृति-वृक्ष काँप उठा।

उसकी सैकड़ों शाखाएँ सूखने लगीं।

उनसे लटके कागज़ राख बनकर गिरने लगे।

हर गिरते कागज़ के साथ किसी की हँसी, किसी की याद, किसी की कहानी हमेशा के लिए मिटती जा रही थी।

अनन्या का हृदय कसकर धड़क उठा।

"इसे रोको!"

वह चीख उठी।

आर्यव ने गंभीर स्वर में कहा—

"तुम्हें वृक्ष तक पहुँचना होगा।"

"सिर्फ तुम इसे बचा सकती हो।"

अनन्या दौड़ पड़ी।

लेकिन जैसे ही वह वृक्ष के निकट पहुँची...

धरती से काली बेलें निकल आईं।

उन्होंने उसके पैरों को जकड़ लिया।

अदिति ने अपनी शक्ति से उन बेलों को काटना चाहा।

लेकिन वे तुरंत फिर उग आईं।

निराकार हँसा।

"यह द्वीप अब मेरा है।"

"यहाँ की हर स्मृति मेरी होगी।"

उसी समय...

स्मृति-वृक्ष के भीतर से एक मधुर प्रकाश निकला।

वह प्रकाश धीरे-धीरे एक वृद्ध पुरुष के रूप में बदल गया।

उसकी लंबी सफेद दाढ़ी थी।

आँखें गहरी नीली थीं।

और हाथ में लकड़ी की एक कलम थी।

आर्यव तुरंत घुटनों के बल बैठ गया।

"गुरुदेव..."

समर और अदिति ने भी सिर झुका लिया।

अनन्या ने आश्चर्य से पूछा—

"ये कौन हैं?"

आर्यव ने श्रद्धा से उत्तर दिया—

"ये महर्षि ग्रंथेश हैं।"

"अधूरी किताब के प्रथम रचयिता।"

महर्षि ने अनन्या की ओर देखा।

उनकी आँखों में अपार करुणा थी।

"बहुत देर कर दी तुमने..."

उन्होंने शांत स्वर में कहा।

"लेकिन अभी भी समय समाप्त नहीं हुआ।"

उन्होंने अपनी कलम अनन्या की ओर बढ़ाई।

"यह कथालेखनी है।"

"इसी कलम से पहली बार अधूरी किताब लिखी गई थी।"

जैसे ही अनन्या ने वह कलम पकड़ी...

उसके चारों ओर सुनहरी आभा फैल गई।

उसकी आँखों में तेज़ प्रकाश भर गया।

उसी क्षण उसके मन में अनेक स्मृतियाँ कौंधीं।

आर्या...

समर...

आर्यव...

आठों कथारक्षक...

अंतिम युद्ध...

और एक चेहरा...

जो अब तक किसी ने नहीं देखा था।

वह चेहरा निराकार का नहीं था।

बल्कि...

एक साधारण मनुष्य का था।

अनन्या अचानक काँप उठी।

"निराकार..."

"पहले इंसान था?"

महर्षि ने गहरी साँस ली।

"हाँ।"

"हर अंधकार की शुरुआत कभी न कभी एक मनुष्य से ही होती है।"

यह सुनते ही सभी स्तब्ध रह गए।

निराकार का छाया-अवतार पहली बार क्रोध से काँप उठा।

"चुप रहो!"

उसकी गर्जना से पूरा द्वीप हिल गया।

लेकिन महर्षि मुस्कुराए।

"अब सत्य छिप नहीं सकता।"

अधूरी किताब स्वयं खुल गई।

उसके पहले खाली पन्ने पर धीरे-धीरे एक नाम उभरने लगा।

सभी साँस रोके उसे देखने लगे।

अगर वह नाम पूरा दिखाई दे जाता...

तो शायद निराकार की वास्तविक पहचान सामने आ जाती।

लेकिन उसी क्षण...

आकाश से काली बिजली गिरी।

सीधे अधूरी किताब पर।

किताब हवा में उछल गई।

उसके पन्ने चारों दिशाओं में बिखर गए।

महर्षि की कलम अनन्या के हाथ से छूट गई।

और स्मृति-वृक्ष के तने में एक गहरी दरार पड़ गई।

महर्षि ने चिंतित होकर कहा—

"यदि अधूरी किताब के सभी पन्ने सूर्यास्त से पहले वापस नहीं मिले..."

"तो यह वृक्ष हमेशा के लिए मर जाएगा।"

"और उसके साथ..."

उन्होंने आकाश की ओर देखा।

"दुनिया की हर कहानी भी।"

उसी क्षण बिखरे हुए पन्नों में से एक पन्ना हवा में उड़ता हुआ अनन्या के सामने आ गिरा।

उस पर केवल एक ही पंक्ति लिखी थी—

"असली युद्ध अब शुरू होता है।"

और उसी समय...

दूर जंगल के भीतर से किसी बच्चे की हँसी सुनाई दी।

लेकिन इस निर्जन द्वीप पर...

कोई बच्चा होना असंभव था।

अनन्या ने धीरे-धीरे उस दिशा में देखा...

और पेड़ों के बीच दो चमकती हुई लाल आँखें उसे घूर रही थीं।

क्रमशः...