सूना-सूना घर का आँगन
सूना-सूना घर का आँगन
कर रही कबसे इंतजार
चौबारे पर बैठी माँ
आयेगा मेरा बेटा
भर लेगा बाँहों में
पूछेगा कैसी हो माँ
राह निहारे बूढ़ी माँ
सोच रही कैसे रहता होगा
खाना भी क्या खाता होगा
दूर ना मुझसे रह पाता था
छोटा था जब पास वो रहता
घूमता रहता आगे-पीछे
एक पल को ओझल जो हो जाती
बेचैन हो रोता फिरता
कहाँ छपी हो मेरी माँ
टप-टप आँसू टपक रहे हैं
बेटे की राह तकती बेचारी माँ
आयेगा एक दिन पुकारेगा
कहाँ हो मेरी प्यारी माँ
पर आया ना बेटा
हो गई साँझ, ढल गया दिन
बीत जाता है ऐसे ही राह निहारे
रोज का एक दिन
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली
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पिता का होना जैसे
पिता का होना जैसे
सर पे एक छत का होना
धूप-बारिश आँधी से बचाए
सारा श्रेय दीवारे ले जाए
खुद हमेशा उपेक्षित रह जाए
पिता का होना जैसे
जादुई छड़ी का होना
जो मांगो वो मिल जाए
हर जिद पूरी हो जाए
इच्छा पूरी होते ही
छड़ी एक कोने में
खड़ी नजर आए
पिता का होना जैसे
ईश्वर हो जाना
वक्त पड़ने पर ही
सबको पिता की याद आए
जरा सा मन का ना होने पर
इंसान तो ईश्वर को भी
खूब बुरा सुनाए
की जिसके लिए पूरी जिंदगी हवन
वो परिवार ही आँखे चुराए
ना चाहा कभी किसी से कुछ
दिया हमेशा अपनी हैसियत से ज्यादा
वो पिता अपने बुढ़ापे में
संग ना किसी को पाए
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
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समाज में सबसे उपेक्षित रिश्ता - पत्नी
समाज में सबसे उपेक्षित
रिश्ता, जो हमेशा पराया ही होता
पुरुष समाज से करती शिकायत
एक नारी एक पत्नी
माँ, बहन, भाभी, चाची, मामी
दिया तुमने सबको सम्मान
तो फिर क्यूँ बनाया
इसी रिश्ते का मजाक
पत्नी को तो परिवार में ही ना गिनते
सब घरवाले अपने
पत्नी हमेशा पराई
क्योंकि वो पराए घर से आई
क्या सिर्फ तुम्हारा
काम करने वो आई
नहीं स्वतंत्रता उसे कुछ
अपने मन का करने की
जरूरी है आज्ञा पति की
अपने घर जाने में भी
सारी बातें क्यूँ उससे जाती छुपाई
सेवा करना धर्म है उसका
किस हक से जब बात-बात पर
ताना मारो दूसरे घर से है आई
कौन सा घर पत्नी का होता
माँ-बाप का भी छूटा
और ससुराल भी ना अपना
कफन भी जब मायके से आए
तो क्या करने ससुराल आए
क्यों पुरुषों को अच्छी लगती
सिर्फ गूंगी-बहरी कामवाली
अगर अपने हक के लिए
कुछ बोले तो करते उसकी बुराई
अगर है गृहिणी पत्नी तो
दो रोटी का भी ताना देते
है कमाऊ तो भी
कौन सा मनमर्जी करने देते
रवा तो लेते हो पत्नी की कमाई
पर फिर भी पत्नी पराई
पत्नी चाहे बूढ़ी हो जाए सेवा करते
फिर भी कहलाती क्यों
दूसरे घर से आई
क्यों ये दोगलापन तुम्हारा
अपनी माँ के लिए सम्मान
अपने बच्चों की माँ का करे अपमान
सिर्फ परवरिश का फर्क है
पत्नी की जगह खुद को रख
कर देखो
एक बार सोच बदलकर देखो
क्या यही थी वो कसम
जो तुमने सात फेरो पर खाई
पत्नी साथ दे अगर
तो पति को भी देना चाहिए
साथ निभाई
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प्रिय पाठकों रिश्ते के ये तीनों रूप आपको कैसे लगे क्या आपने भी इनका दर्द महसूस किया तो जरूर अवगत कराएं अपनी प्रतिक्रिया से। आज समाज में बदलते रिश्तों को देख दुख होता है। सभी रिश्ते स्वार्थ पर टिके हैं। परिवार टूट रहे हैं। एक प्रयास किया है अपने नजरिए से रिश्तों को टूटने से बचाने का। अगर मेरी कविताओं से किसी एक की भी सोच बदलती है तो मेरी कविताएं सार्थक हैं और आभारी हैं आप सभी पाठकों का। आप सभी ने मेरी रचनाओं को अपना आशीर्वाद दिया अपना समर्थन दिया। आपके इस सहयोग के लिए मातृभारती टीम का और आप सभी का बहुत बड़ा धन्यवाद 🙏