The Weight of Wings (पंखों का बोझ) 3
Before the Storm
(A Rainy Night, A Clash with Mom and Dad)
तूफ़ान से पहले
(बारिश वाली रात, माँ-पापा से टकराव)
बाहर आसमान टूटकर बरस रहा था। बिजली की कड़कड़ाहट खिड़कियों के शीशे थर्रा रही थी, और गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू — जो किसी और वक़्त में सुकून देती — आज संजना को दम घोंटने वाली लग रही थी।
कमरे में अंधेरा था, सिवाय टेलीविजन की उस नीली रोशनी के जो संजना के चेहरे पर पड़ रही थी। स्क्रीन पर एक शादी का वीडियो चल रहा था। दूल्हा-दुल्हन स्टेज पर खड़े थे, हाथों में वरमाला।
संजना की नज़रें उस दुल्हन पर टिकी थीं।
कितनी शांत लग रही है, उसने सोचा। या शायद थकी हुई। या शायद दोनों एक ही होते हैं।
तभी कमरे का दरवाज़ा खुला। भारी कदमों की आहट ने उसके विचार तोड़ दिए। रवि मिश्रा अंदर आए — कपड़े भीगे हुए, चेहरे पर दिन भर की थकान।
"आज बारिश की वजह से धंधा मंदा रहा," उन्होंने तौलिये से बाल पोंछते हुए कहा। "बहुत कम कमाई हुई। पता नहीं महीने का खर्चा कैसे निकलेगा।"
संजना खामोश रही।
रवि जी ने आवाज़ थोड़ी नरम की। "लेकिन... तेरे आने से राहत है। आज तूने उन विदेशियों को जिस तरह संभाला — बहुत अच्छा किया। मैं सोच रहा हूँ अगले सीज़न से पूरी जिम्मेदारी तुझे ही सौंप दूँ।"
तारीफ थी। लेकिन संजना के लिए किसी सज़ा के ऐलान जैसी।
उसने टीवी बंद कर दिया। कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया — बाहर की बारिश का शोर और तेज़ हो गया।
"मुझे यह नहीं करना पापा।"
आवाज़ धीमी थी। लेकिन उसमें एक ऐसी दृढ़ता थी जो पहले कभी नहीं थी।
रवि जी का हाथ रुक गया। "क्या कहा?"
संजना उठी और पिता की आँखों में देखा। आज उसे डर नहीं लग रहा था। वो बस थक चुकी थी।
"यह गाइड का काम, यह टूरिस्ट्स को घुमाना — मैं यह नहीं करना चाहती। मुझे यहाँ से दूर जाना है, पापा। जहाँ मैं अपनी पहचान बना सकूं, अपनी शर्तों पर जी सकूं।"
रवि मिश्रा का चेहरा सख्त हो गया।
"दूर जाना है?" उन्होंने ऐसे दोहराया जैसे संजना ने कोई गाली दी हो। "हमने तुझे इसीलिए पढ़ाया-लिखाया? ताकि तू हमें बुढ़ापे में छोड़कर चली जाए?"
"पापा, यह छोड़ने की बात नहीं—"
"चुप रह!" उनकी आवाज़ कमरे में गूंजी। "तुझे अंदाज़ा है हमने तेरे लिए क्या-क्या छोड़ा? अपनी जवानी खपा दी, अपनी इच्छाएं मार दीं। यह सब किसका होगा एक दिन? तेरा ही तो होगा!"
"पापा, आप मुझे जायदाद दे रहे हैं। पर मेरी ज़िंदगी ले रहे हैं।"
एक पल की खामोशी।
फिर रवि मिश्रा ने धीरे से कहा — और इस बार उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, कुछ और था, जो और भी भारी था:
"संजना, हमने तुझे हमेशा बेटे की तरह पाला। कभी फर्क नहीं किया। लेकिन आज..."
वो रुके।
"काश... काश हमारा एक बेटा होता। तो आज मुझे यह दिन न देखना पड़ता।"
काश हमारा एक बेटा होता।
यह वाक्य संजना के दिल के आर-पार हो गया।
वो कुछ नहीं बोली। चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई।
रसोई में तारा जी बर्तन समेट रही थीं। संजना ने पीछे से जाकर उन्हें कस कर गले लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगी।
"क्या हुआ मुन्ना?" माँ ने घबराकर पूछा।
संजना ने सिसकते हुए सब कह दिया — टूटे-फूटे शब्दों में, बिना किसी क्रम के। घुटन, सपने, पापा की बात, सब कुछ।
तारा जी की आँखों में एक पल के लिए कुछ हिला। वो एक औरत थीं। वो जानती थीं कि सपने टूटने की आवाज़ कैसी होती है।
"माँ..." संजना ने उम्मीद भरी नज़रों से देखा, "मुझे भागना है यहाँ से।"
तारा जी का शरीर अकड़ गया। उन्होंने संजना को खुद से अलग किया।
"पागल हो गई है क्या?" उनकी आवाज़ कांप रही थी — गुस्से से नहीं, खौफ से। "भागना? तू जानती भी है तू क्या कह रही है?"
"माँ, आप तो समझो—"
"समझने का वक़्त गया।" तारा जी की आवाज़ कठोर हो गई। "तेरे पापा की इज़्ज़त ही उनकी जान है। जिस दिन तूने घर की चौखट लांघी... याद रखना संजना। हम दोनों ज़हर खाकर मर जाएंगे। हमें समाज में मुंह दिखाने के लायक नहीं छोड़ेगी तू।"
संजना पत्थर की हो गई।
"माँ?"
"हाँ।" तारा जी की आँखों में आँसू थे, लेकिन जिद भी। "अगर तुझे हमारी लाश देखनी है, तो कर ले अपने मन की।"
संजना धीरे-धीरे पीछे हटी। पैर कांप रहे थे।
वो वापस अपने कमरे में आई।
बाहर बारिश अब भी हो रही थी। अंदर सब कुछ बंजर हो चुका था।
उसने आईने में खुद को देखा — और फिर नज़रें हटा लीं।
बिस्तर पर पड़ी डायरी उठाई। कांपते हाथों से लिखा:
"लोग कहते हैं बेटियों को पंख दो। पर वो यह भूल जाते हैं कि पंख देने के बाद अगर आसमान छीन लो, तो वो पंख वरदान नहीं, बोझ बन जाते हैं।"
वो बिस्तर पर लेट गई। घुटनों को छाती से लगा लिया।
बाहर बिजली कड़की।
अंधेरे कमरे में एक पल के लिए सब कुछ सफ़ेद हो गया।