सिखों के गोविन्द जी दसवें और अंतिम गुरु गोविंद सिंह जी जब गुर गद्दी पर विराजमान हुए ओ उस समय तक योजना बध तरीकों से मनोवैज्ञानिक आधार पर पिछले पौन दो सौ साल से एक निश्चित आदर्श की ओर अग्रसर सिख धारा धर्म का रूप ग्रहण कर चुकी थी।
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिख धर्म के प्रणेता, श्री गुरु नानक देव जी के मानववादी और मानव - मानव के बीच समानता के आधार पर आपसी भाईचारे के सिद्धांत को वास्तविक रूप दिया।
1699ई. में खालसा पंथ की स्थापना करके उन्होंने उस सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्तित्व का सृजन, जिसका संकल्प आदि गुरू गुरू नानक देवजी ने लिया था।
इस महान् विरासत के धनी गुरू गोविन्द सिंह जी का जीवन महानता का उच्च शिखर था।
जिसे इससे पहले शायद ही किसी ने स्पर्श कर हो।
विद्वता,शूर वीरता, बलिदान और समाजिक निर्माण के संबंध में गुरू गोविन्द सिंह जी की कोई तुलना नहीं। भविष्य में भी शायद ही कोई मनुष्य उनकी उच्चता को पहुंच पाए।इस बात का निश्चय पाठक,गुरू गोविन्द सिंह जी की यह संक्षिप्त जीवनी को पढ़ सकेंगे
( गुरू गोविन्द सिंह जीवन सचित्र को आगे बढाने से पहले एक छोटी सी कथा पढ़ लीजिए )
🪷(🪷अरदास की महत्ता,साखी श्री गुरु गोबिंद सिंह जी🪷 )🪷
एक दिन उज्जैन शहर के रहने वाले एक सिक्ख बंशबर दास ने गुरू गोविन्द के आगे हाथ जोड़कर प्रार्थना की हे सच्चे पातशाह मुझे की बख्शीश करो मेरे घर में बडी गरीबी छाई हुई है।
सतिगुर जी ने फ़रमाया कि भाई। सिक्खों को हर कार्य प्रारंभ करते वक्त कडाह प्रसाद करके उसे पवित्र चौकी पर रखकर ऊपर से साफ कपड़े से ढक कर पास बैठकर पूरी पवित्रता से जपुजी साहिब का पाठ करना यां करवाना चाहिए।
इसके पश्चात कार्य की सफलता के लिए खड़े होकर हाथ जोड़कर नम्रता से अरदास करनी अथवा करवानी चाहिए फिर जो कार्य होगा अवश्य सिद्ध होगा घर जाकर तुम भी अरदास करवाना,तेरे घर बहुत सुख सम्पदा की बखिशश होगी।हे बंशबर दास।हरेक सिक्ख को यह अरदास आनी चाहिए।
बंशबर दास ने कहा गुरु जी। महलों और दुशालो में रहते अथवा अति गरीबी के समय हर हालत में आप जी के चरणों का भरोसा मेरे हृदय में ज्यों का त्यों बना रहे।मेरा मन सिक्खी भरोसे ना डोले।
(हर एक पार्ट में एक कथा जरूर लिखी जाएगी)
श्री गुरू गोविन्द सिंह जी का जन्म दिसंबर 26 1666ई. में पटना साहिब में हुआ था । पटना साहिब वर्तमान भारत बिहार राज्य की राजधानी है।
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी जन्म स्थान होने के कारण आदर सहित इसे पटना साहिब के नाम से प्रसिद्ध है सिखों के पांच तख्तों में से पटना साहिब, सिखों का दूसरा महत्वपूर्ण तख्त है।
सिख धर्म के प्रणेता श्री गुरु नानक देव जी ने अपने मत का प्रचार करते हुए 1509,ई. में यहां आए थे,उस समय इस नगर का नाम पाटलिपुत्र था।
गंगा नदी के किनारे बसा हुआ,यह नगर एक बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र था।
यहां के धनवान जौहरी, चौधरी सालस राय गुरू जी का पहला सिख बना।गुरू जी ने कई महिने उस हवेली में ठहर कर सिख मत प्रचार किया। इस कारण यह हवेली संगत का रूप धारण कर गई ।
चौधरी सालस राय की हवेली पहले संगत, फिर धर्मशाला और नवें गुरू श्री तेग बहादुर के काल के समय गुरुद्वारा बन गई।
क्रमशः ✍️