राजकुमार को जिंदा छोड़ने के बाद रूपमती की रूह हवा में लहराई। उसकी सफेद आँखों में एक आखिरी बार प्रतिशोध की चमक कौंधी।
उसने महल के सूने गलियारों को देखा और उसकी गूंजती हुई आवाज़ रात के सन्नाटे में आखिरी बार सुनाई दी—
"मैं इस महल में कभी कोई खुशियां नहीं आने दूँगी... इस आलीशान महल को मैं उजाड़ कर दूँगी! आज के बाद यहाँ कोई इंसान चैन से नहीं रहेगा। यहाँ सिर्फ और सिर्फ मेरा पहरा होगा!"
इतना कहते ही वह लाल चुनरी हवा में गायब हो गई और रूपमती की आत्मा वापस उसी अंधेरे और खौफनाक तहखाने में समा गई।
धीरे-धीरे रात का अंधेरा छटा। चिड़ियों के चहकने की आवाज़ें आईं और सूरज की पहली सुनहरी किरण देवपुर की धरती पर पड़ी।
लेकिन रोज़ की तरह आज देवपुर में खुशहाली की सुबह नहीं, बल्कि इतिहास की सबसे खौफनाक सुबह उगी थी।
जैसे ही दासियों और महिलाओं की आँखें खुलीं, पूरे राजमहल में चीख-पुकार और कोहराम मच गया। हर तरफ सिर्फ खून की नदियां, कटी हुई लाशें और भयानक सन्नाटा था।
दासिया जब महारानी रुक्मिणी महाराज देववर्धन के कक्ष में पहुंचीं, तो वहां का मंज़र देखकर उनके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।
महाराज के पेट में वही जंग लगी तलवार धंसी थी और उनका बेजान शरीर खून से लथपथ पड़ा था।
जब महारानी यह खौफनाक मंज़र देख वह बर्दाश्त नहीं कर पाईं और चीख मारते हुए वहीं बेहोश होकर गिर पड़ीं।
जैसे ही यह खबर राजमहल से बाहर निकली, पूरे नगर में हाहाकार मच गया। लोग सड़कों पर उतर आए। हर कोई हैरान और परेशान था—"आखिर ये क्या हो गया?
दो दिन पहले रूपमती गायब हुई और आज एक ही रात में महल के सारे मर्द मार दिए गए! हमारा दुश्मन कौन है?"
यह खबर बिजली की तरह पूरे भारतवर्ष में फैल गई।
आसपास के राज्यों के राजा और खुद गोरे अंग्रेज अफसर भी यह बात सुनकर थर-थर कांप उठे।
आनन-फानन में अंग्रेजों की फौज और बड़े-बड़े राजा देवपुर महल पहुंचे।
पूरे देश में कयास लगाए जाने लगे—कुछ लोग इसे अंग्रेजों की कोई गहरी साजिश कह रहे थे, तो कुछ इसे जंगली डाकुओं का हमला मान रहे थे। लेकिन सच क्या था, यह कोई नहीं जानता था।
देवपुर की इस तबाही की गूंज सैकड़ों मील दूर महाराष्ट्र के नासिक तक जा पहुंची।
नासिक के प्रसिद्ध ज्योतिर्मठ के मठाधीश, पंडित विश्वनाथ दीनानाथ त्रिवेदी को जब यह दुखद समाचार मिला, तो वे स्तब्ध रह गए। महाराज देववर्धन उनके बहुत बड़े और अनन्य भक्त थे।
पंडित विश्वनाथ दीनानाथ त्रिवेदी कोई साधारण साधु नहीं थे। वे ज्योतिर्मठ के मठाधीश होने के साथ-साथ तंत्र-मंत्र, शास्त्रों और वेदों के महाज्ञानी और परम विद्वान थे।
उनके पास ऐसी दिव्य शक्तियां थीं कि वे किसी भी इंसान या स्थान का भूतकाल, वर्तमान और भविष्य अपनी बंद आँखों से देख सकते थे।
खबर सुनते ही पंडित जी की आँखों में एक गंभीर चमक आ गई। उन्होंने तुरंत अपने शिष्यों को आदेश दिया, "फौरन हमारे प्रस्थान की तैयारी करो! हमें इसी वक्त देवपुर रियासत के लिए निकलना होगा।
देववर्धन के महल पर जो विपत्ति आई है, वह किसी इंसानी सेना या डाकुओं का काम नहीं है।
वहां कोई बहुत बड़ी आसुरी या अतृप्त शक्ति तांडव कर रही है। मुझे वहां तुरंत पहुंचना होगा।"
इसके कुछ देर बाद पंडित जी अपने खास शिष्यों और तंत्र सामग्री के साथ देवपुर राजमहल की ओर निकल पड़े।
उन्हें मालूम था कि उनका सामना एक ऐसी रूह से होने वाला है जो प्रतिशोध की आग में जल रही है।
उधर देवपुर राजमहल के भीतर और बाहर, हर तरफ सवालों का ऐसा बवंडर उठा था जो थमने का नाम नहीं ले रहा था।
लोग जितने डरे हुए थे, उतने ही हैरान भी थे। आखिर यह कैसा कातिल था, जिसने महल के भीतर एक दिन के नवजात बालक से लेकर 80 और 100 साल के बुजुर्ग मर्दों तक को नहीं छोड़ा, लेकिन उस 3 महीने के छोटे राजकुमार को छूआ तक नहीं?
यह बात पूरे नगर और आसपास के राजाओं के बीच आग की तरह फैल गई। लोग कानाफूसी करने लगे और तरह-तरह की कहानियां बनने लगीं:
महारानी पर शक: कुछ चालाक दरबारी और आसपास के राजा महारानी रुक्मिणी पर ही उंगली उठाने लगे।
वे दबी ज़ुबान में कह रहे थे, "कहीं यह सब महारानी की ही कोई गहरी साज़िश तो नहीं?
महाराज की और भी रानियाँ थीं, लेकिन मारा हर कोई गया और बचा सिर्फ महारानी का बेटा!
कहीं उन्होंने खुद अपने बेटे को देवपुर का एकमात्र उत्तराधिकारी और राजा बनाने के लिए किसी गुप्त तांत्रिक या हत्यारों से यह कत्लेआम तो नहीं करवाया?"
कुछ अंग्रेजों की चाल: दूसरी तरफ, बुद्धिजीवी लोग इसे अंग्रेजों का षड्यंत्र मान रहे थे।
उनका कहना था, "यह पक्का फिरंगियों का काम है। उन्होंने जानबूझकर इस छोटे से बच्चे को जिंदा छोड़ा है ताकि इसे गद्दी पर बैठाकर अपने हाथ की कठपुतली बना सकें।
और पूरे देवपुर पर राज कर सकें। बच्चा बड़ा होकर वही करेगा जो गोरे साहब कहेंगे।"
चारों तरफ आरोपों और शक का ऐसा जाल बुन दिया गया था कि एक तरफ बेकसूर महारानी रुक्मिणी, जो अपने पति की मौत के गम में डूबी थीं, तो दूसरी तरफ अब समाज की नज़रों में मुज़रिम बनती जा रही थीं।
उधर, महल के विशाल मैदान में एक साथ सैकड़ों चिताएं सजाई जा रही थीं।
महाराज देववर्धन, मंत्री बुक्का सोलंकी और सभी सैनिकों के अंतिम संस्कार की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। दूर-दूर से आए राजा, अंग्रेज अफसर और देवपुर की लाखों की जनता वहां इकट्ठा थी।
पूरी जनता के सब्र का बांध टूट चुका था। लोग फूट-फूटकर रो रहे थे, क्योंकि उनके लिए महाराज देववर्धन कोई साधारण राजा नहीं, बल्कि साक्षात भगवान थे।
वे उनके असली शैतानी रूप और तहखाने के काले राज़ से पूरी तरह अनजान थे।
"हे भगवान! तूने यह क्या किया? तू इतना निर्दयी कैसे हो सकता है?" एक बूढ़ा नागरिक चिता के पास सिर पटकते हुए रो रहा था।
"हमारे भगवान जैसे राजा को हमसे छीन लिया! जिन्होंने पूरी जिंदगी हमारे सुख-चैन के लिए लगा दी, उनके साथ ऐसा खौफनाक न्याय?" दूसरे नागरिक ने रोते हुए आसमान की तरफ हाथ उठाए।
सबके आंसू टपक रहे थे, हर आँख नम थी। लोग नियति को कोस रहे थे, विधाता पर सवाल उठा रहे थे।
जनता जिस राजा के जाने पर विलाप कर रही थी, उन्हें रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि जिसे वे 'भगवान' कह रहे हैं, उसी के पापों की वजह से देवपुर पर यह महाविपत्ति आई है।
तभी, रोती-बिलखती जनता और दूसरी तरफ, दूर रास्ते से ज्योतिर्मठ के मठाधीश पंडित विश्वनाथ दीनानाथ त्रिवेदी के रथ का काफिला देवपुर की सीमा में प्रवेश करने वाला होता है।