कविताओं का संग्रह-भाग:1
लेखिका
प्राची गुर्जर
लेखिका की ओर से……
हर इंसान के भीतर कुछ ऐसे शब्द होते हैं जो कभी कहे नहीं जा पाते। समय के साथ वे ख़ामोशियाँ बन जाते हैं, और वही ख़ामोशियाँ कभी-कभी कविताओं का रूप ले लेती हैं।
यह संग्रह मेरे उन्हीं अनकहे शब्दों का घर है। इनमें कुछ ऋतुएँ हैं, कुछ प्रतीक्षाएँ, कुछ बिछड़नें, कुछ लौट आने की उम्मीदें और बहुत-सी ऐसी बातें, जिन्हें शायद हम सब महसूस तो करते हैं, पर कह नहीं पाते।
मैं नहीं चाहती कि आप इन कविताओं को सिर्फ़ पढ़ें। मैं चाहती हूँ कि आप इन्हें अपने जीवन के किसी पल के साथ जोड़कर महसूस करें। हो सकता है इनमें आपको अपना कोई मौसम मिल जाए, कोई पुरानी याद, या फिर अपना ही कोई ऐसा हिस्सा, जिससे आप बहुत समय से नहीं मिले।
अगर ऐसा हुआ, तो यही इस संग्रह की सबसे बड़ी सफलता होगी।
— प्राची गुर्जर……
# 1 :
“तुम क्या चाहती हो”?
मुझसे कभी पूछा ही नहीं गया,
"बोल, तू क्या चाहती है?"
क्यों मेरी ज़िंदगी के फैसले,
हमेशा दूसरे ही बनाते हैं?
सपने तो मेरे हैं,
फिर भी किसी और के हाथों बुनते हैं।
मैं बस देखती रहती हूँ
खुद से पूछती हूँ,
"आखिर तू क्या चाहती है?"
हाँ, अगर सच में चाहने दिया जाए...
तो सुनो, मुझे क्या पसंद है
मुझे पानी की लहरों सा बहना पसंद है,
हर तालाब, हर नदी, हर समंदर की
गहराई को छूना पसंद है।
मुझे सूरज की किरणों सा चमकना पसंद है,
हर गली, हर गाँव, हर शहर के
अंधेरों से गुज़रना पसंद है।
मुझे टूटे सपनों को सीना पसंद है,
हर दर्द, हर दीवार, हर "ना-मुमकिन" को
जीत में बदलना पसंद है।
बस इतनी सी ख्वाहिश है मेरी,
कोई बड़ी बात नहीं
मुझे बस... मैं रहना पसंद है।
वोही जो मैं हूँ, वही बने रहना पसंद है।
प्राची गुर्जर
# 2 :
"अगर बदलना होता"
किसी ने पूछा मुझसे यूँ ही,
ख़यालों-ख़यालों में,
"अगर तुम कुछ बदलना चाहो,
तो क्या बदलोगी?"
सवाल ख़याली था,
पर मैं सच मान बैठी।
चली गई पूछने उनसे,
जो मैं कभी थी।
जो मैं अब हूँ।
जो मैं बन जाऊँगी।
पहले पूछा उस छोटी बच्ची से,
जो मिट्टी में घर बनाती थी,
जो तारों को मुट्ठी में भरना चाहती थी।
वो हँस कर बोली,
"मैं दुनिया बदल दूँगी,
ताकि कोई गुड़िया कभी न टूटे,
ताकि कोई परीकथा अधूरी न छूटे।
मैं? मैं ठीक हूँ।"
फिर पूछा उस लड़की से,
जिसके हाथों में किताबें थीं,
आँखों में सपने,
और दिल में डर।
वो चुप रही देर तक,
फिर धीरे से बोली,
"मैं ये डर बदल दूँगी,
ये लोगों का क्या कहेंगे।
ये पैरों की बेड़ियाँ।
खुद को? खुद को बस उड़ना सिखाना है।"
आख़िर में गई उस बूढ़ी औरत के पास,
जिसके बालों में चाँदी थी,
और आँखों में पूरी सदी।
उसने मेरा हाथ थामा,
और मुस्कुराकर कहा,
"बेटा, बदलना क्या है?
मैं तो हर दिन बदली।
बच्चे के लिए,
घर के लिए,
ज़माने के लिए।
अगर आज कुछ बदलना होता,
तो मैं वो सारे पल वापस ले आती,
जिनमें मैंने खुद को पीछे छोड़ दिया।
मैं खुद को नहीं बदलती।
बस खुद को जीना सीख लेती।"
लौट आई मैं,
सवाल वही था,
पर जवाब बदल गया था।
अब अगर कोई पूछे,
"अगर तुम कुछ बदलना चाहो..."
तो मैं कहूँगी,
"मैं कुछ नहीं बदलूँगी।
बस खुद को माफ़ कर दूँगी,
हर उस बार के लिए,
जब मैंने खुद से कहा था
'तुझे बदलना होगा'।"
प्राची गुर्जर
# 3:
"खो जाऊं अगर मैं"…..
अगर कभी मैं खो जाऊं, क्या मुझे कोई ढूंढने आएगा?
लाखों की भीड़ में, घबराती हुई आवाज़ से,
नम आंखों से, मेरा नाम लेकर, कोई मुझे बुलाएगा?
या मैं यूं ही भटकती रहूंगी अनजान गलियों में,
जहाँ न कोई रास्ता अपना हो, न कोई दीवार पहचानी।
जहाँ हर मोड़ पर मैं खुद से ही पूछूं
“क्या मैं यहीं तक थी? या अभी और भटकना बाकी है?”
क्या कोई मेरी खामोशी की ज़मीन पर
पैरों के निशान पढ़ पाएगा?
क्या कोई मेरी थकी हुई सांसों की गर्द
हवा से बटोर कर, मुझे पहचान पाएगा?
क्या कोई इतना ठहरा हुआ होगा,
जो मेरे न होने को भी महसूस कर ले?
जो भीड़ के शोर में भी
सिर्फ मेरी एक कमी को सुन ले?
या मैं बस एक भूली हुई दुआ की तरह
किसी ना-खुली किताब के पन्ने में
दबी रह जाऊंगी... बिना पढ़े, बिना मिले?
अगर कभी मैं खो जाऊं...
क्या कोई मेरे कदमों की आहट से
मुझ तक पहुंच पाएगा?
प्राची गुर्जर ….
# 4:
“दाग़ और रोशनी”…….
रात की चादर ओढ़े, छज्जे पे खड़ी थी,
दूर आसमान पर तन्हा चाँद को तक रही थी...
मन ने चुपके से पूछा
उजालों से भरा जहाँ छोड़ कर,
तूने ये अँधेरों का देस क्यों चुना, चाँद?
क्या किसी अपने ने तेरा आसमान छीना होगा?
जिस रात तुझे हौसले की बाँहों की ज़रूरत थी,
क्या तुझे वहीं अकेला तोड़ दिया होगा?
तब मेरी नज़र तेरे चेहरे के दाग़ों पे ठहर गई...
इतना नूरानी, चमकीला , दूध सा उजला है तू,
फिर तेरे दामन पर ये निशान किसने रख दिए?
शायद तूने भी किसी से हद से ज़्यादा इश्क़ किया होगा,
अपनी सारी चाँदनी उसकी हथेली पर रख दी होगी।
और उसने जब अँधेरा लौटाया,
तू ख़ामोश हो कर फ़लक के कोने में जा बैठा होगा।
ये दाग़ तेरे ज़ख़्म नहीं, तेरी वफ़ा की लकीरें हैं,
हर उस वादे का सबूत जो निभाया नहीं गया,
हर उस साथ की याद जो अधूरा रह गया।
फिर भी देखो...
दाग़ों के बावजूद तू पूरा है,
टूट कर भी दुनिया की रातें सँवारता है।
तब समझी मैं...
चाँद सबका इसीलिए है,
क्योंकि उसने अपना दर्द छुपाया नहीं
उसे रोशनी में बदल कर बाँट दिया।
और मैं?
मैं भी थोड़ी चाँद हूँ,
दाग़ों के साथ ही सही, पर मुस्कुराती हूँ।
किताबों की रोशनी से अपनी रात सजाती हूँ,
और उम्मीद है, किसी और की मुस्कान भी ।
प्राची गुर्जर ……
# 5:
"ज़िंदगी: एक किताब"
बैठे-बैठे आज मैं अपनी किताब के पन्ने पलट रही थी...
कुछ समझ आया तो आगे बढ़ी, न आया तो
फिर समझने को उन्हीं पन्नों को उलट रही थी...
तभी दिल में एक ख़याल आया
क्या जीवन भी एक किताब है?
जिसे पढ़ने के लिए आगे बढ़ना पड़ता है...
और बढ़ जाएँ आगे, तो समझने को
कभी-कभी पीछे मुड़ना पड़ता है...
फिर सोचा, ये जो स्याही है इन पन्नों पर,
ये किस की निशानी है?
क्या ये मेरे ही अश्क़ हैं जो लफ़्ज़ बन गए?
या वक़्त ने अपने हाथों से लिखी कोई कहानी है?
कुछ पन्ने हवा के झोंके से खुद ही पलट जाते हैं,
कुछ को ज़बरदस्ती मोड़ना पड़ता है।
कुछ पर उँगली फिसल जाती है,
कुछ पर रूह अटक जाती है।
हर अध्याय में एक रिश्ता है,
कोई पहला प्रेम, कोई आख़िरी अलविदा।
कुछ पन्ने फट गए, कुछ जले हुए हैं,
पर सबसे खूबसूरत वही हैं
जिन पर अब भी मेरी उँगलियों के निशान हैं।
और आख़िर में समझा...
मैं हूँ इस किताब की लेखिका।
पर सब पन्ने मेरे लिखे नहीं।
कुछ तक़दीर ने लिखे, कुछ लोगों ने,
कुछ उन लम्हों ने जो लौट कर नहीं आएँगे।
फिर भी रोज़ सुबह एक नया पन्ना खुल जाता है,
कोरा, बिना स्याही के।
और क़लम मेरे हाथ में है |
प्राची गुर्जर ….
#.6:
जूठ क्या है?
मैं सोचती हूँ, जूठ क्या है...
कब, क्यों, कौन बोलता है ये जूठ?
सब हक़ीक़त के आँचल में जीना चाहते हैं,
फिर भी होंठों पर क्यों पलता है ये जूठ?
शायद ये वो बच्चा है,
जिसे हर बात पर डाँटा गया,
सुना कभी गया ही नहीं
तो चुप रहने के डर से उसने बोल दिया जूठ।
शायद ये वो लड़की है,
जिसके सपनों पर ज़माने ने पहरे बिठा दिए,
रिवाज़ों की बेड़ियों से डरकर,
उसने मुस्कुराकर कह दिया जूठ।
या शायद ये वो लड़का है,
जिसके कंधे ज़िम्मेदारियों से झुक गए,
"मैं ठीक हूँ" का बोझ उठाते-उठाते,
उसने थक कर बोल दिया जूठ।
तो क्या जूठ सच में जूठ है?
या बस एक ज़ख़्म है,
जो सच बोलने से डरता है...
या एक ख़्वाब है,
जिसे दुनिया की नज़र लग जाती है?
शायद जूठ, जूठ नहीं है
वो बस एक पर्दा है,
जिसके पीछे कोई सच साँसें गिन रहा है।
वो एक मजबूरी है,
जो सच्चाई की क़ीमत चुका नहीं पाती।
वो एक दुआ है,
जो होंठों से उतरकर दिल में ही रह जाती है।
तो अगली बार कोई जूठ बोले,
उसे परखने से पहले,
उसकी ख़ामोशी को सुन लेना...
क्योंकि हर जूठ के पीछे,
एक अधूरा सच बैठा रोता है।
प्राची गुर्जर …..
#.7:
"दीवारों के पार"
कुछ ख़ास नहीं... हाँ, बहुत आम हूँ मैं।
मेरे नाम के आगे कोई ताज नहीं,
मेरी हँसी के पीछे कोई राग नहीं।
उजाले कभी थे मेरे, अब खो गए हैं,
अब तो बस एक थकी हुई, ढलती शाम हूँ मैं।
पर मेरे भीतर...
एक कमरा है।
न उसमें खिड़की है, न दरवाज़ा।
बस चार दीवारें हैं
और एक मैं हूँ,
जो ख़ुद से ही छुपी हुई हूँ।
इस कमरे को रोज़
मेरे भीतर का शोर खटखटाता है।
वो शोर जो चीख़ बन नहीं पाया,
वो आँसू जो बह नहीं पाए,
वो बातें जो कही नहीं गईं।
सब जमा हैं यहाँ,
साँस ले रहे हैं अँधेरे में।
हर सुबह एक सुनहरी रोशनी आती है,
मेरे जिस्म की दरारों से झाँकती है।
खिड़की ढूँढती है... नहीं मिलती।
थककर, मेरे ही साये से लिपटकर,
लौट जाती है रात के पास।
और मैं,
उसकी पीठ देखती रह जाती हूँ
बिना आवाज़, बिना शिकायत।
पर अब...
अब ये अँधेरा चुभने लगा है।
अब ये ख़ामोशी काटने लगी है।
अब मेरा मन
इस कमरे की मरम्मत चाहता है।
मुझे एक खिड़की चाहिए
छोटी ही सही,
पर इतनी बड़ी कि
कोई सवेरा उसमें से झाँक सके,
और पूछ सके "तुम ठीक हो?"
मुझे एक दरवाज़ा चाहिए
जिसकी चौखट पर
कोई दस्तक दे,
और मैं डरकर छुपूँ नहीं,
बल्कि कहूँ "आ जाओ,
यहाँ अँधेरा है, पर जगह है।"
मैं नहीं चाहती कि मेरा शोर
इन दीवारों में दफ़न हो जाए।
मैं चाहती हूँ कि वो
किसी के नाम की दुआ बनकर
इस कमरे से निकले।
मैं ख़ास नहीं हूँ, मुझे पता है।
पर ये दर्द... ये इंतज़ार...
ये ख़ास है।
और शायद
इसी इंतज़ार के नाम
एक सवेरा लिखा जाए।
तो आज,
मैं हथौड़ी उठाती हूँ
पहली चोट अपनी ही दीवार पर।
क्योंकि ढलती शाम को
अगर जीने का हक़ है,
तो उसे सुबह बुलाने का हक़ भी है।
प्राची गुर्जर …..
#.8:
“यदि प्रेम को देखना हो…”
यदि कभी जानना हो कि प्रेम वास्तव में क्या होता है,
तो किसी वृद्ध, विवाहिता दंपत्ति को देख लेना
जिन्होंने साथ-साथ
60–65 वर्षों की लंबी उम्र गुज़ारी हो।
प्रेम देखना हो,
तो देखना वह वृद्ध पत्नी
जो शांति से कुर्सी पर बैठी है,
जिसके न स्वरूप में वही चमक बची है,
न शरीर में वही जवानी की शक्ति।
और फिर देखना उसके पति को
जिसका तन बुढ़ापे से झुक चुका है,
जिसके हाथ काँपते हैं,
पर फिर भी वह पूरे स्नेह से
अपनी पत्नी के बिखरे बालों को सँवारता है…
मानो उसकी हर उँगली से
अब भी वही पुराना प्यार टपक रहा हो।
यह रिश्ता सिखाता है
कि हर लड़ाई, हर दूरी,
हर शिक़ायत
आखिरकार थक कर
इनके प्रेम के आगे हार मान लेती है।
यह बताता है कि प्रेम
कभी युवावस्था का जुनून नहीं होता,
प्रेम तो बुढ़ापे का सहारा होता है…
जब रूप मिट जाता है,
पर साथ जीवनभर बना रहता है।
प्राची गुर्जर …
#.9:
"प्रेम: पाना या तपना?"
मैं सोचती हूँ... प्रेम क्या है?
पा लेना?
या उसकी चाह में खुद को जला देना?
सूरज से पूछो
उसे प्रेम किस से है?
रोशनी से, जो उसी की है...
या अँधेरे से,
जिसकी एक झलक पाने को
वो पूरा दिन आसमान में तपता है?
चाँद से पूछो
उसे प्रेम किस से है?
अँधेरे से, जो उसका घर है...
या रोशनी से,
जिसे चुरा कर लाने को
वो पूरी रात दर्द में चमकता है?
नदी से पूछो
उसे प्रेम किस से है?
अपनी लहर से, जो उसी का नाच है...
या समुंदर से,
जिसमें मिलने की आस में
वो हर रोज़ पत्थर से टकराती है,
रास्ता भटकती है,
पर रुकती नहीं?
शायद प्रेम पा लेना नहीं...
शायद प्रेम है
किसी एक झलक के लिए,
किसी एक मिलन के लिए,
उम्र भर तपते रहना,
चमकते रहना,
बहते रहना।
और अगर मिल भी जाए...
तो क्या सूरज अँधेरे में बसा रहता है?
क्या चाँद रोशनी को क़ैद कर लेता है?
क्या नदी समुंदर होकर बहना भूल जाती है?
नहीं।
प्रेम पाने का नाम नहीं।
प्रेम उस आग का नाम है
जो बुझती नहीं... मिल जाने पर भी।
प्राची गुर्जर ……
#.10:
“चाँद से मेरा रिश्ता”
मुझे आवारा कहते हैं सब
कि मैं रात भर
चाँद की चौखट पर सिर टिकाए बैठी रहती हूँ
उन्हें क्या पता
कि ख़ामोशी जब सीने से लगती है
तो कैसा मरहम बन जाती है
जब रात अपना सारा शोर समेट लेती है।
सारा आलम ख़्वाब में डूब जाता है,
मगर मेरे अंदर कोई दिया टिमटिमा उठता है
उस सिमटी हुई चाँदनी के साए तले…
जैसे मैं और चाँद
एक ही साँस में सदियों का सन्नाटा जीते हों,
एक ही ज़ख़्म पर उँगली फिराते हों,
एक ही भूल चुकी दुआएँ दोहराते हों।
उन्हें बावरा कह लेने दो
उन्हें क्या इल्म
कि कायनात कितनी रहमदिल हो जाती है
जब तुम्हारे टूटे हुए दिल की
तन्हा गवाही
सिर्फ़ एक चाँद देता है।
प्राची गुर्जर …..
शब्द यहीं समाप्त होते हैं,पर आशा है उनकी गूँज आपके भीतर कुछ देर और ठहरेगी।
- प्राची गुर्जर