आध्यात्मिक दर्शन - प्रश्न 6 - यदि ईश्वर है तो दिखाई क्यों नहीं देते? Janshi Saroha द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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आध्यात्मिक दर्शन - प्रश्न 6 - यदि ईश्वर है तो दिखाई क्यों नहीं देते?

"पिछले अध्यायों से हम यह समझ रहे हैं कि परमात्मा अपने वास्तविक स्वरूप में निराकार हैं। किंतु सृष्टि के संचालन और जीवों के कल्याण हेतु उन्होंने अनेक दिव्य रूप धारण किए।" अब हमें यह समझना है कि यदि वाक़ई में ईश्वर है तो दिखाई क्यों नहीं देता ? नास्तिकों का सीधा सा प्रश्न आस्तिकों से होता है दिखाओ कहां है तुम्हारा ईश्वर ? कैसा दिखता है तुम्हारा ईश्वर ?
अब यदि हम इसका आध्यात्मिक अर्थ समझें कि ईश्वर है तो दिखता क्यों नहीं ? "इस प्रश्न का उत्तर केवल तर्क से नहीं, अनुभव से समझा जा सकता है।"

अध्यात्म के अनुसार, ईश्वर निराकार और शुद्ध चेतना (आत्मा) है। हमारी भौतिक आँखें केवल नाशवान और स्थूल (physical) चीजों को देख सकती हैं। ईश्वर को देखने के लिए चर्म चक्षुओं (भौतिक आँखों) के बजाय 'दिव्य दृष्टि' या आध्यात्मिक ज्ञान की आवश्यकता होती है, जो ध्यान और साधना से जागृत होती है। अध्यात्म में ईश्वर के न दिखने के मुख्य कारण और सत्य को इन बिंदुओं से समझा जा सकता है:

•आँखों की सीमा: जिस प्रकार हम अपनी आँखों से हवा या बिजली को नहीं देख सकते, केवल उनके प्रभाव (हवा का चलना, पंखे का चलना) को महसूस करते हैं ठीक वैसे ही ईश्वर हर जगह व्याप्त हैं और उनके कार्य (सृष्टि का संचालन) दिखाई देते हैं। 

•सद्गुरु का मार्ग: आध्यात्मिक गुरुओं के अनुसार, सांसारिक मोह-माया और भौतिक सुखों में उलझा मन ईश्वर को नहीं देख पाता। इसे जानने के लिए ध्यान योग (Meditation) की साधना अपनाकर अंतर-चक्षु (भीतर की आँखें) खोलने होते हैं। 

•भावना और विश्वास: ईश्वर कोई वस्तु नहीं है जिसे बाजार में देखा जा सके; वह प्रेम, सत्य और भाव का विषय है। जब हृदय शुद्ध होता है, तब ईश्वर का अहसास (अनुभूति) होता है।

•उपनिषदों का ज्ञान: जैसा कि सनातन रहस्य और अन्य आध्यात्मिक ग्रंथों में बताया गया है, जो लोग ईश्वर को बाहर खोजते हैं, वे भ्रमित रहते हैं—वास्तविकता यह है कि ईश्वर हमारे स्वयं के भीतर (आत्मा) में मौजूद हैं।

•श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान: गीता के 11वें अध्याय में भगवान कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि चर्म चक्षुओं (भौतिक आँखों) से उन्हें नहीं देखा जा सकता। जब कृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि (Divine Vision) प्रदान की, तभी अर्जुन उनके विराट रूप के दर्शन कर पाए।

•उपनिषद का सत्य: उपनिषदों के अनुसार, ईश्वर 'अदृश्योऽग्राह्यः' है—यानी जिसे आँखों से देखा नहीं जा सकता और न ही हाथों से पकड़ा जा सकता है। वे आँखों को देखने की शक्ति देते हैं, लेकिन आँखें उन्हें नहीं देख सकतीं।

•ध्यान की शुरुआत: "यदि कोई व्यक्ति वास्तव में ईश्वर का अनुभव करना चाहता है, तो उसके लिए केवल प्रश्न करना पर्याप्त नहीं, साधना भी आवश्यक है।" ईश्वर की अनुभूति के लिए रोज़ 10 से 15 मिनट सांसों पर ध्यान (Prana Meditation) केंद्रित करें। विचारों को शांत करने से मन का दर्पण साफ़ होता है, जिससे भीतर छिपी दिव्य ऊर्जा का अहसास होने लगता है।

•नाम सिमरन और मंत्र: किसी एक मंत्र (जैसे 'ॐ' या गायत्री मंत्र) का मानसिक जाप करने से मन की एकाग्रता बढ़ती है। यह अभ्यास मन के विकारों को दूर कर आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त करता है।


उपरोक्त बातों से तो यह समझ आता है कि ईश्वर को देखने के लिए सर्वप्रथम हमें खुद को ही देखना होगा ... जब तक हम स्वयं को नहीं जानते ईश्वर को क्या जानेंगे। ईश्वर को देखने के लिए हमारा अंतर्मुखी होना आवश्यक है। 

परन्तु समस्या यह है कि अधिकतर प्राणी यह कहते है कि अगर तुम्हारा ईश्वर है तो इसी क्षण प्रकट कर दो .... यह कैसे संभव है। "एक सच्चा साधक भी वर्षों तक साधना, भक्ति और आत्मशुद्धि का अभ्यास करता है, तब कहीं जाकर उसे ईश्वर की अनुभूति का स्पर्श मिलता है।" और कुछ लोगों को चाहिए कि ईश्वर तुरंत ही प्रकट हो जाए उनके सामने। अब पहले खुद को इस योग्य तो बनाइये की ईश्वर भी हमसे मिलना चाहे। "ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग उन्हें खोजने से पहले स्वयं को पहचानने से प्रारम्भ होता है। जब मन निर्मल होता है, तब वही परमसत्ता स्वयं अपने होने का अनुभव करा देती है।"

निष्कर्ष:-
"जिस प्रकार सूर्य को देखने के लिए आँखें खोलनी पड़ती हैं, उसी प्रकार ईश्वर का अनुभव करने के लिए अंतःकरण को जागृत करना पड़ता है। ईश्वर कभी छिपे नहीं हैं, उन्हें देखने की हमारी क्षमता अभी जागृत नहीं हुई है।"

हरि ॐ 🙏🏻