मयूर सर ने घड़ी को अपने हाथों में बहुत संभालकर उठाया।
उनकी उंगलियाँ उस घड़ी पर ऐसे फिर रही थीं, जैसे किसी पुरानी याद को फिर से महसूस कर रही हों।
कुछ पल तक वे बिना कुछ बोले उसे देखते रहे।
फिर मुस्कुराकर बोले,
"रुशाली... तुमने इसे सच में इतने सालों तक संभालकर रखा?"
रुशाली ने हल्के से सिर हिलाया।
"हाँ, मयूर सर।"
"लेकिन... पाँच साल हो गए।"
रुशाली मुस्कुराई।
"समय पाँच साल आगे बढ़ गया होगा... लेकिन मेरे लिए इस घड़ी की अहमियत कभी कम नहीं हुई।"
उसने धीरे से घड़ी अपने हाथों में ली।
"जब भी आपकी याद बहुत आती थी न... तब इसे निकालकर देख लेती थी। ऐसा लगता था जैसे आपकी कोई निशानी मेरे पास है।"
मयूर सर की आँखें भर आईं।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
"मुझे नहीं पता था... कि मेरी दी हुई एक छोटी-सी घड़ी तुम्हारे लिए इतनी बड़ी याद बन जाएगी।"
रुशाली मुस्कुरा दी।
"तोहफ़े की कीमत उसकी कीमत से नहीं होती, मयूर सर.."
"...उसे देने वाले की नीयत से होती है।"
मयूर सर बस उसे देखते रह गए।
उन्हें महसूस हो रहा था कि सामने खड़ी लड़की ने सिर्फ़ उनका इंतज़ार ही नहीं किया था...
बल्कि उनकी हर याद को भी उतने ही प्यार से संजोकर रखा था।
उन्होंने धीरे से कहा,
"सच कहूँ, रूशाली ... आज तुमने मुझे फिर से अमीर बना दिया।"
रुशाली हँस पड़ी।
"वो कैसे?"
"क्योंकि आज मुझे पता चला कि मेरी सबसे कीमती पूँजी बैंक में नहीं..."
"...तुम्हारे दिल में रखी थी।"
रुशाली मुस्कुराते हुए चुप हो गई।
कुछ लोग यादों को संभालते नहीं...
उन्हें जीते हैं।
और जब चाहतें सच्ची हो,
तो छोटी-सी निशानी भी पूरी दुनिया बन जाती है।
उसी समय दरवाज़े पर दस्तक हुई।
"दीदी..."
रुशाली की छोटी बहन की आवाज़ आई।
"सब लोग आपका इंतज़ार कर रहे हैं। खाना ठंडा हो जाएगा।"
रुशाली ने मुस्कुराकर जवाब दिया,
"हाँ, बस आते हैं।"
दरवाज़ा बंद होते ही मयूर सर हल्के से हँस पड़े।
"लगता है नीचे वालों को शक हो गया होगा।"
रुशाली भी मुस्कुरा दी।
"नहीं... उन्हें हम पर भरोसा है।"
मयूर सर ने उसकी बात सुनकर संतोष से सिर हिलाया।
"और यही भरोसा... हमेशा बना रहेगा।"
दोनों साथ-साथ कमरे से बाहर निकले।
सीढ़ियाँ उतरते समय दोनों के चेहरे पर वही शांत मुस्कान थी, जिसे देखकर कोई भी समझ सकता था कि आज उनके दिल कितने सुकून में हैं।
नीचे पहुँचते ही सबकी नज़र उन दोनों पर पड़ी।
मयूर सर की माँ मुस्कुराकर बोलीं,
"आ गए तुम दोनों? चलो, अब खाना शुरू करते हैं।"
"जी माँ।" दोनों ने लगभग एक साथ कहा।
डाइनिंग टेबल पर पूरे परिवार के साथ बैठकर खाना शुरू हुआ।
खाने के दौरान हँसी-मज़ाक चलता रहा।
मयूर सर के पिताजी बोले,
"अब तो अगले महीने सगाई है... बहुत सारी तैयारियाँ करनी हैं।"
रुशाली की माँ मुस्कुराई।
"तैयारियाँ तो होंगी ही... लेकिन सबसे बड़ी खुशी यह है कि हमारे बच्चों की मुस्कान वापस लौट आई है।"
सभी की नज़र एक पल के लिए मयूर और रुशाली पर चली गई।
दोनों ने हल्की मुस्कान के साथ सिर झुका लिया।
मयूर सर की माँ ने स्नेह से कहा,
"सच कहूँ बहनजी... आज इतने सालों बाद मयूर के चेहरे पर ऐसी खुशी देख रही हूँ।"
रुशाली की माँ की आँखें भी नम हो गईं।
"और मैने भी अपनी बेटी को इतने सुकून से मुस्कुराते बहुत समय बाद देखा है।"
कुछ पल के लिए माहौल भावुक हो गया।
फिर रुशाली के भाई ने हँसते हुए कहा,
"अरे भाई, अभी से भावुक हो जाएँगे तो शादी में क्या करेंगे?"
सब लोग हँस पड़े।
हँसी के साथ माहौल फिर हल्का हो गया।
खाना खत्म हुआ।
थोड़ी देर और बातचीत चली।
फिर मयूर के पिताजी उठते हुए बोले,
"अच्छा बहनजी, अब हमें अनुमति दीजिए। अगले महीने सगाई है... और तैयारियाँ भी बहुत हैं।"
"बिल्कुल।" रुशाली की माँ मुस्कुराई । "अब तो जल्दी ही फिर मुलाकात होगी।"
सभी लोग उन्हें बाहर तक छोड़ने आए।
गाड़ी के पास पहुँचते ही रुशाली ने धीरे से कहा,
"मयूर सर.. एक मिनट।"
मयूर सर मुस्कुराते हुए उसके साथ थोड़ा एक तरफ चले गए।
"जी रूशाली?"
रुशाली ने शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा,
"इस बार मैं आपको बर्थडे गिफ्ट नहीं दूँगी।"
मयूर ने तुरंत आश्चर्य जताया।
"क्या मतलब? मुझे तो मेरा गिफ्ट चाहिए।"
रुशाली मुस्कुराई।
"अब मैं जो आपकी होने वाली हूँ... उससे बड़ा गिफ्ट और क्या होगा?"
मयूर कुछ पल उसे देखते रहे।
फिर अचानक जैसे उन्हें कुछ याद आया।
उन्होंने हल्के से अपना माथा छुआ।
"अरे..."
"हमारी सगाई..."
"...उन्नीस जुलाई को है!"
रुशाली हँस पड़ी।
"आख़िर याद आ ही गया।"
मयूर सर मुस्कुराए।
"सच कहूँ... मुझे अपना जन्मदिन ही याद नहीं रहा।"
रुशाली ने हैरानी से पूछा,
"क्यों?"
मयूर सर कुछ पल चुप रहे।
फिर शांत स्वर में बोले,
"इन पाँच सालों में मैंने अपना जन्मदिन मनाना लगभग छोड़ ही दिया था। हॉस्पिटल में दिन निकल जाता था... और शाम तक थकान। लेकिन सच यह है कि मन ही नहीं करता था।"
उन्होंने उसकी ओर देखते हुए कहा,
"जब दिल का सबसे अपना इंसान साथ न हो... तो केक काटने की खुशी भी अधूरी लगती है।"
रुशाली की आँखें नम हो गईं।
उसने मुस्कुराकर कहा,
"अब ऐसा कभी नहीं होगा।"
मयूर सर ने मुस्कुराते हुए कहा,
"अब उन्नीस जुलाई मेरे लिए सिर्फ़ जन्मदिन नहीं रहेगा..."
"...उस दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत तोहफ़ा हमेशा के लिए मेरा होने वाला है।"
रुशाली ने शरमाकर नज़रें झुका लीं।
धीरे से बोली,
"और मेरे लिए भी वह दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे यादगार दिन होगा।"
दोनों कुछ पल तक बस एक-दूसरे को देखते रहे।
कुछ तारीख़ें कैलेंडर में नहीं...
दिल की धड़कनों में लिखी जाती हैं।
उन्नीस जुलाई भी अब ऐसी ही एक तारीख़ बनने वाली थी।
इतने में मयूर सर की माँ आगे बढ़ीं।
उन्होंने रुशाली की माँ का हाथ अपने हाथों में लिया।
"बहनजी..."
"हमारी बेटी का ख़याल रखिएगा।"
रुशाली की माँ भावुक होकर मुस्कुरा दीं।
मयूर की माँ ने फिर हँसते हुए कहा,
"और मयूर... अब आपका बेटा है। अगर कभी कोई गलती करे, तो उसे डाँटने का पूरा हक़ आपका है।"
रुशाली की मां हँस पड़ी।
"अब बेटा-बेटी का फर्क कहाँ रहा? दोनों हमारे हैं।"
दोनों परिवारों ने एक-दूसरे को स्नेह से देखा।
रिश्ता सिर्फ़ दो बच्चों का नहीं...
दो परिवारों का भी बन चुका था।
कुछ देर बाद मयूर सर का परिवार गाड़ी में बैठ गया।
गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।
रुशाली वहीं खड़ी रही।
जब तक गाड़ी उसकी नज़रों से ओझल नहीं हो गई...
वह वहीं खड़ी मुस्कुराती रही।
विदाइयाँ भी कितनी अजीब होती हैं...
कुछ पल के लिए आँखें नम कर देती हैं,
जबकि दिल जानता है—
अब अगली मुलाकात हमेशा के लिए करीब ले जाएगी।
रुशाली अपने कमरे में पहुँची।
दिनभर की खुशियों और भागदौड़ के बाद उसने कपड़े बदले, खुद को थोड़ा तरोताज़ा किया और बिस्तर पर लेट गई।
तभी मोबाइल की स्क्रीन जगमगा उठी।
My Akdu ❤️
उसके चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई।
मैसेज था—
"घर पहुँच गया, मैडम जी।"
रुशाली ने तुरंत जवाब दिया—
"ओके, अकड़ू। 😊"
कुछ ही सेकंड में रिप्लाई आ गया।
"बस...? इतना ही?"
रुशाली मुस्कुरा दी।
"तो और क्या लिखूँ?"
"इतनी देर बाद मैसेज किया... कम से कम यह तो पूछ लेतीं कि सफ़र कैसा रहा।"
"आप डॉक्टर हैं... मरीजों को इमोशनल कीजिए। मुझ पर यह नहीं चलेगा।"
"अच्छा... डीएम साहिबा आज बड़े मूड में हैं।"
"बिल्कुल। आखिर आज का दिन ही इतना अच्छा था।"
मयूर सर ने मुस्कुराते हुए लिखा—
"कल मिलें?"
रुशाली ने जवाब दिया—
"कल ऑफिस का थोड़ा ज़रूरी काम है। कुछ फाइलें देखनी हैं। काम खत्म हो जाएगा, तो बता दूँगी।"
"ठीक है। फिर सगाई की शॉपिंग साथ करेंगे। वैसे भी डॉक्टर और डीएम... दोनों को छुट्टी बड़ी मुश्किल से मिलती है।"
रुशाली ने हँसते हुए लिखा—
"बात तो सही है, डॉक्टर साहब।"
कुछ देर तक दोनों छोटी-छोटी बातों पर हँसते रहे।
फिर मयूर ने लिखा—
"अब सो जाइए, मैडम जी। कल आपको ऑफिस जाना है... और मुझे हॉस्पिटल।"
रुशाली ने जवाब दिया—
"जी, डॉक्टर साहब। गुड नाइट।"
"गुड नाइट, मैडम जी। अपना ख़याल रखिएगा।"
"आप भी...।"
मोबाइल की स्क्रीन बंद हो गई।
लेकिन दोनों के चेहरों पर मुस्कान अब भी बाकी थी।
आज का दिन खत्म ज़रूर हुआ था...
लेकिन उनकी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत अध्याय अभी शुरू हुआ था।
कुछ प्रेम कहानियाँ शोर नहीं करतीं...
वे चुपचाप दिलों में घर बना लेती हैं।
और जब उन्हें उनकी मंज़िल मिलती है,
तो पूरी कायनात जैसे मुस्कुरा उठती है।
क्रमशः... ❤️