सगाई की तारीख तय हो चुकी थी।
यह सिर्फ़ एक तारीख नहीं थी... यह उन दो दिलों के वर्षों पुराने इंतज़ार का उत्तर थी, जिन्होंने कभी एक-दूसरे का साथ छोड़ने का वादा नहीं किया था, भले ही परिस्थितियों ने उन्हें पाँच वर्षों तक अलग रहने पर मजबूर कर दिया हो।
आज दोनों परिवारों के घर में खुशी का ऐसा माहौल था, मानो कोई बड़ा त्योहार हो। हर कोई आने वाली सगाई की तैयारियों को लेकर उत्साहित था। कोई मेहमानों की सूची बना रहा था, तो कोई कपड़ों और रस्मों की बातें कर रहा था।
लेकिन उस पूरे माहौल में सबसे ज़्यादा चमक अगर किसी के चेहरे पर थी, तो वह थी...
मयूर और रुशाली के चेहरे पर।
दोनों की नज़रें बार-बार एक-दूसरे से टकरा रही थीं और हर बार एक नई मुस्कान उनके होंठों पर आ जाती थी।
कुछ मुस्कानें होंठों से नहीं,
बरसों के इंतज़ार से जन्म लेती हैं।
और कुछ रिश्ते...
किस्मत नहीं, धैर्य लिखता है।
"अच्छा, अब बातें बहुत हो गईं।" रुशाली की माँ मुस्कुराते हुए बोलीं, "चलिए, सब लोग खाना खा लेते हैं।"
"हाँ-हाँ, बिल्कुल।" मयूर की माँ ने भी हँसते हुए कहा।
सभी लोग डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ने लगे।
उसी समय मयूर ने हल्के से रुशाली की तरफ देखा।
रुशाली उनकी नज़रों का मतलब समझ गई।
वह मुस्कुराई और बिना कुछ कहे धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई।
कुछ ही पल बाद मयूर भी उसी ओर चले गए।
किसी ने इस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।
ऊपर पहुँचकर रुशाली ने अपने कमरे का दरवाज़ा खोला।
"आइए, डॉक्टर साहब..." उसने मुस्कुराते हुए कहा।
मयूर सर कमरे के अंदर आए।
जैसे ही उन्होंने चारों ओर नज़र दौड़ाई, उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान फैल गई।
कमरा बेहद सलीके से सजा हुआ था।
दीवारों पर नेवी ब्लू और व्हाइट रंग का बेहद खूबसूरत संयोजन था। खिड़की के पास सफेद पर्दे हवा के साथ धीरे-धीरे लहरा रहे थे। एक तरफ किताबों से भरी अलमारी थी और दूसरी ओर एक छोटा-सा इनडोर प्लांट कमरे की सादगी में भी एक अलग-सी ताज़गी घोल रहा था।
मयूर की नज़र घूमते-घूमते बेड के पास रखी साइड टेबल पर जाकर ठहर गई।
वहाँ एक फोटो फ्रेम रखा था।
उन्होंने आगे बढ़कर देखा...
वह उनकी अपनी तस्वीर थी।
कुछ क्षणों तक वे उसी तस्वीर को देखते रहे।
फिर मुस्कुराकर बोले,
"अरे... मुझे तो पूरा यकीन था कि तुम्हारा कमरा पूरी तरह व्हाइट होगा। आखिर सफेद रंग तुम्हारा सबसे पसंदीदा है। लेकिन यहाँ तो नेवी ब्लू भी खूब दिखाई दे रहा है।"
रुशाली ने उनकी तरफ देखा।
उसके चेहरे पर हल्की-सी लाज उतर आई।
"सिर्फ मेरी पसंद ही क्यों दिखाई दे?" उसने धीमे स्वर में कहा। "आपका पसंदीदा रंग भी तो इस कमरे में होना चाहिए... इसलिए यह कॉम्बिनेशन रखा।"
मयूर कुछ पल तक उसे देखते रहे।
फिर धीरे से मुस्कुरा दिए।
"तुम सच में हर छोटी-सी बात का ध्यान रखती हो।"
रुशाली ने हल्की शरारत के साथ कहा,
"डीएम हूँ... छोटी-छोटी बातें नोटिस करना मेरी आदत है।"
मयूर सर हँस पड़े।
"अच्छा... तो डॉक्टर की पसंद भी फाइल में दर्ज कर ली गई?"
"जी। और वह फाइल अब हमेशा के लिए सुरक्षित है।"
दोनों की हँसी पूरे कमरे में गूँज उठी।
मयूर फिर से उस तस्वीर की ओर देखने लगे।
उन्होंने धीरे से कहा,
"मुझे नहीं पता था... मेरी तस्वीर को तुमने इतनी खास जगह दी है।"
रुशाली उनकी तरफ बढ़ी।
"क्योंकि..." वह मुस्कुराई, "कुछ लोग सिर्फ दिल में नहीं रहते... घर के हर कोने में बस जाते हैं।"
यह सुनकर मयूर सर की मुस्कान धीरे-धीरे भावुकता में बदल गई।
वे कुछ कदम आगे बढ़े।
अब दोनों आमने-सामने खड़े थे।
कमरे में कुछ पल के लिए गहरी ख़ामोशी छा गई।
वह ख़ामोशी असहज नहीं थी...
वह दो दिलों की भाषा थी।
मयूर ने बहुत धीमे स्वर में कहा,
"रुशाली... एक बात का अफसोस शायद हमेशा रहेगा।"
"कौन-सी बात, मयूर सर ?" रुशाली ने प्यार भरी मुस्कान के साथ पूछा।
मयूर सर ने गहरी साँस ली।
"काश... मैंने पाँच साल पहले ही अपने दिल की बात तुमसे कह दी होती। शायद हमें इतनी लंबी दूरी नहीं सहनी पड़ती।"
रुशाली ने बिना देर किए सिर हिलाया।
"नहीं, मयूर सर ... ऐसा मत कहिए। अगर उस समय हम मिल भी जाते, तो शायद आज इस रिश्ते की कीमत इतनी गहराई से महसूस नहीं कर पाते।"
उसने मुस्कुराकर आगे कहा,
"समय ने हमें दूर ज़रूर रखा... लेकिन हमारे विश्वास को कभी कम नहीं कर पाया।"
मयूर सर की आँखें हल्की-सी नम हो गईं।
"तुम मुझे कितना चाहती हो... इसका एहसास मुझे हर पल होता है। सच कहूँ, मैं खुद को बहुत खुशकिस्मत मानता हूँ कि मेरी ज़िंदगी में तुम हो।"
उन्होंने धीमे स्वर में आगे कहा,
"किस्मत ने हमें अलग करने की पूरी कोशिश की... लेकिन हमारी चाहत उसके हर फैसले से ज़्यादा मज़बूत निकली। आखिर उसे भी हमें फिर से मिलाना ही पड़ा।"
रुशाली बस उन्हें देखती रही।
उसकी आँखों में गर्व था...
विश्वास था...
और बरसों से संजोया हुआ प्रेम था।
प्रेम का सबसे सुंदर रूप वह होता है,
जहाँ शिकायतें भी दुआ बन जाती हैं...
और इंतज़ार, विश्वास का दूसरा नाम बन जाता है।
मयूर सर ने धीरे से उसका चेहरा अपनी ओर किया।
दोनों की नज़रें मिलीं।
कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर मयूर सर ने धीमे स्वर में कहा,
"आज... अगर मैं तुम्हें गले लगाना चाहू ... तो? क्या तुम इजाज़त दोगी मुझे ?"
रुशाली की मुस्कान और गहरी हो गई।
उसने बिना झिझक जवाब दिया,
"आपको मुझसे इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं है, आपने हमेशा मेरे सम्मान का ख़याल रखा है... इसलिए आज मुझे भी कोई संकोच नहीं है।"
मयूर की आँखों में सुकून उतर आया।
अगले ही पल उन्होंने पूरे स्नेह और अपनत्व के साथ रुशाली को गले लगा लिया।
रुशाली ने भी मुस्कुराते हुए अपना सिर उनके कंधे पर टिका दिया।
उस एक पल में न कोई जल्दबाज़ी थी...
न कोई दिखावा...
बस पाँच वर्षों का इंतज़ार था, जो आज सुकून बनकर उनकी धड़कनों में उतर गया था।
दोनों चुप थे...
लेकिन उनकी ख़ामोशी जैसे बरसों की अधूरी बातें कह रही थी।
मयूर सर ने बहुत धीमे स्वर में कहा,
"धन्यवाद... मेरी ज़िंदगी में लौट आने के लिए।"
रुशाली ने आँखें बंद किए हुए ही मुस्कुराकर जवाब दिया,
"मैं गई ही कब थी, मेरा दिल तो हमेशा आपके पास ही था।"
उस पल ऐसा लगा, मानो समय भी कुछ देर के लिए ठहर गया हो।
कुछ गले मिलना सिर्फ़ एक पल नहीं होता...
वह बरसों के इंतज़ार का सुकून होता है।
जहाँ शब्द ख़ामोश हो जाते हैं,
वहाँ धड़कनें एक-दूसरे का हाल कह देती हैं।
कुछ देर बाद रुशाली ने मुस्कुराते हुए कहा,
"अच्छा डॉक्टर साहब... आपको कुछ दिखाना है।"
वह अलमारी के पास गई।
उसने बड़े जतन से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला।
मयूर सर उत्सुकता से उसे देखने लगे।
रुशाली ने डिब्बा खोला।
अंदर वही घड़ी रखी थी...
जो कई साल पहले मयूर सर ने उसे दी थी।
रुशाली ने मुस्कुराकर कहा,
"देखिए जनाब... आपका दिया हुआ तोहफ़ा आज भी वैसे ही संभालकर रखा है।"
मयूर ने हैरानी से घड़ी अपने हाथ में ली...
और उनकी आँखें एक बार फिर नम हो गईं...
जारी.....