बड़ा कौन?हँसी में छिपा जीवन का सबसे बड़ा सत्य
शैली: हास्य, पारिवारिक, प्रेरणादायक, साहित्यिकमौलिक कहानी
बरसात अभी-अभी थमी थी। मिट्टी की भीनी-भीनी खुशबू पूरे गाँव में फैल रही थी। खेतों के किनारे खड़े आम और नीम के पेड़ हवा के साथ झूम रहे थे। दूर मंदिर की घंटियों की मधुर ध्वनि वातावरण को और भी पवित्र बना रही थी।
गाँव का नाम था आनंदपुर। नाम की तरह ही वहाँ के लोग भी सरल, हँसमुख और एक-दूसरे का सुख-दुख बाँटने वाले थे।
गाँव के बीचों-बीच एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। उसकी विशाल शाखाओं के नीचे हर शाम बच्चे इकट्ठा होते। कोई कंचे खेलता, कोई रस्सी कूदता, कोई कहानी सुनाता और कोई पहेलियाँ बुझाता।
लेकिन उन बच्चों को सबसे ज़्यादा इंतज़ार रहता था मोहन मास्टरजी का।
मोहन मास्टरजी सिर्फ़ शिक्षक नहीं थे। वे बच्चों के मित्र थे, मार्गदर्शक थे और सबसे बड़ी बात—वे पढ़ाई को खेल बना देते थे।
उस दिन भी बच्चे बरगद के नीचे बैठे थे।
अचानक दूर से मोहन मास्टरजी दिखाई दिए। उनके हाथ में बाँस की एक पुरानी टोकरी थी।
राहुल उछल पड़ा—
"मास्टरजी आ गए!"
सभी बच्चे दौड़कर उनके पास पहुँचे।
"गुरुजी, आज टोकरी में क्या है?"
मोहन मास्टरजी मुस्कुराए।
"आज किताब नहीं खुलेगी।"
"तो?"
"आज खुलेगी बुद्धि।"
बच्चों की आँखों में चमक आ गई।पहला प्रश्न
मास्टरजी ने टोकरी खोली।
उसमें एक सफेद अंडा और एक ताज़ा दूध से भरा गिलास था।
उन्होंने दोनों चीज़ें बच्चों के सामने रखीं।
"बताओ... इनमें बड़ा कौन?"
बस फिर क्या था।
पूरा बरगद ठहाकों और जवाबों से गूँज उठा।
रिंकू बोला—
"अंडा बड़ा है। इससे चूजा निकलता है।"
गुड्डू बोला—
"नहीं... दूध बड़ा है। इससे ताकत आती है।"
पिंकी बोली—
"मुझे तो दूध बिल्कुल पसंद नहीं। इसलिए अंडा बड़ा।"
सब ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।
मोहन मास्टरजी ने थोड़ा रुककर कहा—
"सुनो...
अगर मैं कहूँ...
दूध बड़ा है?"
सभी बच्चे एक साथ बोले—
"क्यों?"
मास्टरजी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया—
"क्योंकि दूध रोज़ घर-घर पहुँचता है।
वह छोटे बच्चे से लेकर बूढ़े दादा तक सबका साथी बनता है।
जो रोज़ किसी के काम आए...
वास्तव में वही बड़ा होता है।"
कुछ बच्चे हँसे।
कुछ सोचने लगे।दूसरा प्रश्न
अब टोकरी से दो गिलास निकले।
एक में गाढ़ी मीठी लस्सी।
दूसरे में ठंडी छाछ।
"अब बताओ...
लस्सी और छाछ में बड़ा कौन?"
राहुल बोला—
"लस्सी।
उसमें मलाई होती है।"
सीमा बोली—
"नहीं...
छाछ।"
मास्टरजी मुस्कुराए।
"आज सीमा जीत गई।"
"क्यों?"
"लस्सी स्वाद देती है।
लेकिन छाछ गर्मी में शरीर को राहत देती है।
गरीब हो या अमीर...
छाछ सबकी दोस्त होती है।"
बच्चे फिर हँस पड़े।तीसरा प्रश्न
अब मास्टरजी ने पेन...
पेंसिल...
और रबर निकाली।
"अब बताओ...
सबसे बड़ा कौन?"
इस बार किसी को उत्तर समझ नहीं आया।
कुछ देर बाद राहुल बोला—
"पेन।"
गुड्डू बोला—
"पेंसिल।"
मास्टरजी ने रबर उठाई।
"सबसे बड़ी रबर।"
"क्या?"
पूरा समूह हँसी से लोटपोट हो गया।
मास्टरजी बोले—
"पेन और पेंसिल गलती करते हैं।
लेकिन रबर...
गलती मिटाकर नई शुरुआत करने का अवसर देती है।
जो दूसरों की गलती सुधार दे...
उससे बड़ा कौन?"
बरगद के नीचे पहली बार कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया।तभी...
वहीं पास बैठी दादी माँ सब सुन रही थीं।
उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
वे धीरे-धीरे उठीं।
"अगर अनुमति हो...
तो मैं भी एक प्रश्न पूछूँ?"
बच्चों ने खुशी से कहा—
"हाँ... हाँ..."
दादी माँ ने पूछा—
"सूरज और दीपक में बड़ा कौन?"
सभी ने तुरंत कहा—
"सूरज।"
दादी माँ मुस्कुराईं।
"सही।
लेकिन...
जब रात होती है...
सूरज कहीं दिखाई नहीं देता।
तब एक छोटा सा दीपक भी पूरे घर का अँधेरा दूर कर देता है।
इसलिए...
किसी को छोटा मत समझना।"
बच्चे चुप हो गए।जीवन बदल देने वाली बात
मास्टरजी ने बच्चों की ओर देखा।
फिर धीरे-धीरे बोले—
"बच्चो...
दुनिया में बड़ा वह नहीं...
जो आकार में बड़ा हो।
बड़ा वह है...
जो दूसरों के काम आए।
पेड़ फल अपने लिए नहीं खाते।
नदी अपना पानी नहीं पीती।
सूरज अपनी रोशनी अपने लिए नहीं रखता।
और...
दीपक स्वयं जलकर दूसरों को रास्ता दिखाता है।"राहुल की उलझन
राहुल ने हाथ उठाया।
"अगर कोई बहुत अमीर हो...
तो क्या वही सबसे बड़ा है?"
मास्टरजी मुस्कुराए।
"नहीं।
अगर धन से ही महानता मिलती...
तो इतिहास संतों और महापुरुषों को नहीं याद रखता।"
"तो फिर?"
"जो दूसरों का जीवन आसान बना दे...
वही सबसे बड़ा।"बच्चों की नई प्रतियोगिता
अगले दिन बच्चों ने एक नया खेल शुरू किया।
हर बच्चा रोज़ एक अच्छा काम करेगा।
शाम को बरगद के नीचे बताएगा।
रिंकू ने रास्ते से काँच हटाया।
सीमा ने एक बुज़ुर्ग महिला का सामान घर तक पहुँचाया।
गुड्डू ने घायल चिड़िया को पानी पिलाया।
पिंकी ने छोटी बहन को पढ़ाया।
मोहन मास्टरजी सब सुनते रहे।
फिर बोले—
"देखा...
आज तुम सब बड़े बन गए।"अंतिम संदेश
सूरज डूब रहा था।
बरगद की छाया लंबी होती जा रही थी।
पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे।
मास्टरजी ने आसमान की ओर देखते हुए कहा—
"याद रखना...
बड़ा बनने के लिए ऊँचा होना ज़रूरी नहीं।
उपयोगी होना ज़रूरी है।
दूध इसलिए बड़ा...
क्योंकि वह पोषण देता है।
छाछ इसलिए बड़ी...
क्योंकि वह राहत देती है।
रबर इसलिए बड़ी...
क्योंकि वह गलती सुधारती है।
दीपक इसलिए बड़ा...
क्योंकि वह अँधेरे में उम्मीद बनता है।
और इंसान...
तभी बड़ा बनता है...
जब उसके कारण किसी और के चेहरे पर मुस्कान आ जाए।"
राहुल ने धीरे से पूछा—
"गुरुजी...
फिर दुनिया में सबसे बड़ा कौन?"
मोहन मास्टरजी मुस्कुराए।
उन्होंने बच्चों की ओर देखा।
फिर अपने हृदय पर हाथ रखा और बोले—
"सबसे बड़ा वह है... जिसके दिल में दूसरों के लिए प्रेम, करुणा और सेवा हो।"
बरगद के नीचे कुछ पल के लिए पूर्ण शांति छा गई।
हवा धीरे-धीरे बह रही थी।
पेड़ों के पत्ते जैसे ताली बजा रहे थे।
और उस दिन...
आनंदपुर के बच्चों ने सिर्फ़ एक खेल नहीं खेला था।
उन्होंने जीवन की वह शिक्षा सीख ली थी...
जो किसी पुस्तक में नहीं मिलती।
उस दिन से गाँव में जब भी कोई किसी वस्तु, धन, शक्ति या रूप का घमंड करता...
बच्चे मुस्कुराकर बस एक ही प्रश्न पूछते—
"पहले यह बताइए... बड़ा कौन?"
और फिर सबकी हँसी के बीच कोई न कोई जीवन का नया सत्य जन्म लेता।