लोग कहते हैं दुनिया में सब मिल जाता है... दौलत, इज़्ज़त, दोस्त, हमसफ़र। पर मैं कह दूँ? कोई लाख अच्छा सही, लेकिन तुमसा कहाँ माँ।
माँ एक ऐसा शब्द है जिसमें पूरी दुनिया बसी है। माँ की बराबरी तो भगवान भी नहीं कर सकते। मेरी ज़िंदगी में अगर कोई सबसे ऊपर है तो वो है मेरी माँ।
पापा को गुज़रे हुए कई साल हो गए... पर मेरी माँ ने कभी उनकी कमी महसूस नहीं होने दी। सारी ज़रूरतें पूरी करती गई। ख़ुद भले ही पुराने कपड़े पहनती रही, पर हमें हमेशा नए दिलाती रही। माँ है ना... बच्चों को उदास कैसे देख सकती है?
घर का ख़र्चा हो या हमारी पढ़ाई... सबकी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पे लेके चलती है। सुबह से रात तक थकती नहीं, गिरती नहीं, बस हमें संभालती रहती है।
कितनी भी परेशानी आ जाए उनकी ज़िंदगी में... वो हमें खुद कुछ नहीं बताती। सोचती है "बच्चे हैं, क्या बोलू? इनका दिल दुखेगा।"
और रात को सब सो जाने के बाद... एक-एक रुपया जोड़ती रहती है। खुद के लिए 10 रुपये का बिंदी का पत्ता सोच के वापस रख देती है। पर हमारे भविष्य के लिए हर रुपया संभाल के रखती है। वो अपना आज काट देती है... ताकि हमारा कल बन जाए।
आज भी कहीं जाना हो तो पैदल निकल जाती है। धूप हो या बारिश... एक कदम भी ऑटो में नहीं रखेगी। मैंने पूछा "मम्मी ऑटो लेती", तो बोली "बेटा ऑटो-बस का किराया बच जाएगा ना... तो काम आ जाएगा। तेरे लिए कुछ काम आ जाए।"
इतना कोई कर सकता है भला? अपने पैरों के छाले छिपा लेगी, पर हमारे सपने कभी नहीं छिपने देगी।
शायद लिखने बैठूं उनके बारे में... तो ये शब्द कम पड़ जाएँ। क्योंकि माँ को लफ़्ज़ नहीं, साँस चाहिए होती है... जिससे हम रोज़ जीते हैं।
तभी तो बोलती हूँ... कोई लाख अच्छा सही, लेकिन तुमसा कहाँ माँ।
ना कोई दोस्त इतना समझेगा, ना कोई रिश्ता इतना निभाएगा। दुनिया दिखावे का प्यार करती है... माँ बिना बोले क़ुर्बान हो जाती है।
---
हम पाँच भाई-बहन हैं... पापा ने बस बड़ी दीदी की शादी की थी।
पर वो रिश्ता सफल नहीं हो पाया। दुनिया ने उंगली उठाई, रिश्तेदार पीठ दिखा गए।
लेकिन कहते हैं ना... जब पूरी दुनिया तेरे खिलाफ़ हो जाए,
एक माँ होती है जो अपने बच्चे का हाथ कभी नहीं छोड़ती।
मम्मी ने बड़ी दीदी का हाथ थामा... उस रिश्ते से निकाल के उन्हें नई ज़िंदगी दी।
आज दीदी खुश है... सिर्फ इसलिए क्योंकि मम्मी ने हार नहीं मानी।
जब मेरी दूसरी बहन की शादी हो रही थी...
मम्मी के कदमों के नीचे ज़मीन नहीं थी, सिर्फ ज़िम्मेदारी थी।
पापा को गुज़रे कुछ साल ही हुए थे...
घर में ना कोई सेविंग थी, ना कोई रिश्तेदार जो हाथ बढ़ा दे।
पर कोई भी परिस्थिति हो... उन्होंने कभी हमारे ऊपर उसका असर नहीं आने दिया।
मम्मी ने अपना दर्द अपने आँचल में छिपा लिया... और हमारे चेहरे पे हँसी सजा दी।
लोगों ने शादी में बैंड-बाजा देखा...
मम्मी की आँखों में छुपे आँसू कोई नहीं देख पाया।
*माँ की गोद*
मम्मी की गोद में सर रखते ही...
दुनिया की सारी जंग ख़त्म लगती है।
ना दवा चाहिए, ना दुआ... बस उनका हाथ चाहिए।
इतना कोई कर सकता है भला?
बिना बाप के, बिना पैसे के, बिना सहारे के... सिर्फ "माँ हूँ" बोल के दुनिया से लड़ गई।
जब भी मुझे मेरे जीवन में ऐसा लगता है कि मुश्किलें हैं, मैं थक गई हूँ... तो मैं अपनी माँ की तरफ देखती हूँ। कि वो तो इतना सब देखती है, इतना सब झेलती है, लेकिन वो हमें देखते ही सब भूल जाती है। तो हम भी क्यों ना उनकी ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूंढ लें? हम भी तो अपनी सारी थकान, सारी परेशानी उन्हें देख के भूल सकते हैं। वो हमें निस्वार्थ प्यार करती है, तो भला बच्चे उनमें अपना स्वार्थ क्यों देखें? हम भी तो उनका दिया प्यार लौटा सकते हैं।
चलो इसी के साथ हम सब मिलके एक प्रण लेते हैं कि जैसे हमारी माँ ने चाहे कोई परिस्थिति हो हमें सबसे ऊपर रखा... हम भी अपने जीवन में भले ही कितने आगे क्यों ना बढ़ जाएं लेकिन उनकी जगह हमारे जीवन में सबसे ऊपर ही रही। और ये last line आप सब अपनी माँ को बोलेंगे कि *कोई लाख अच्छा सही लेकिन तुमसा कहाँ माँ* 🥺🙌🏻❤️