अमावस्या की काली रात एक खोफ या श्राप - 5 RAAHULL SHARMA द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अमावस्या की काली रात एक खोफ या श्राप - 5

सृष्टि पाँचवीं मंज़िल की उस जर्जर छत के किनारे पर खड़ी थी। उसके बाल हवा में लहरा रहे थे और उसकी नज़रें नीचे पाताल जैसे अंधेरे की ओर टिकी थीं। वह एक कदम और आगे बढ़ाती कि उसका शरीर पांच मंजिला नीचे पत्थरों पर बिखर जाता। लेकिन तभी, एक मज़बूत हाथ ने उसकी कलाई को जकड़ लिया।
वह कृष्ण था।
दरअसल, जब सृष्टि सम्मोहन की हालत में कमरे से बाहर निकल रही थी, तब कृष्ण अपनी बालकनी में खड़ा सिगरेट पी रहा था। उसने काली रात के सन्नाटे में हवेली का मुख्य द्वार खुलते देखा और जब उसने रश्मि की सहेली सृष्टि को पागलों की तरह जंगल की ओर बढ़ते देखा, तो उसके होश उड़ गए। वह बिना किसी को बताए, दबे पाँव उसके पीछे निकल आया था।
कृष्ण ने पूरी ताकत लगाकर सृष्टि को अपनी ओर खींचा, "सृष्टि! पागल हो गई हो क्या? यह तुम क्या कर रही हो?"
लेकिन जैसे ही सृष्टि मुड़ी, कृष्ण के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह सृष्टि नहीं थी। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था, आँखों की पुतलियाँ पूरी तरह सफ़ेद हो गई थीं और उसके होठों पर एक ऐसी हंसी थी जो किसी इंसान की नहीं हो सकती थी।
सृष्टि के गले से एक भारी और गूँजती हुई आवाज़ निकली, "इसे छोड़ दे लड़के... यह मेरी है। इसने अपना खून मुझे दिया है, अब इसे अपना शरीर भी मुझे देना होगा!"
कृष्ण समझ गया कि यह कोई दिमागी बीमारी या वहम नहीं है। उसने महसूस किया कि सृष्टि के शरीर में इतनी ताकत आ गई थी कि वह अकेले कृष्ण जैसे मज़बूत आदमी को पीछे धकेल रही थी। कृष्ण का तर्क और विज्ञान का घमंड उस एक पल में टूट कर बिखर गया। उसे एहसास हुआ कि वह किसी 'दूसरी दुनिया की शक्ति' से लड़ रहा है।
सृष्टि (या वह रूह) ने कृष्ण का गला दबोच लिया। कृष्ण को अपनी आँखों के सामने अंधेरा छाता हुआ महसूस होने लगा। तभी,
अध्याय: बजरंगबली का कवच और हारती हुई रूह
कृष्ण का दम घुट रहा था। उस अदृश्य शक्ति के चंगुल में फंसी सृष्टि के हाथों की पकड़ किसी फौलाद जैसी थी। तभी, धुंधलाती आँखों के सामने कृष्ण को रायपुर के उस रिसेप्शन का वह मंजर याद आया। उसे याद आया कि कैसे खेरापति हनुमान मंदिर के मुख्य पुजारी ने उसके सिर पर हाथ रखकर उसे वह तांबे का लॉकेट पहनाया था।
पुजारी जी ने कहा था—"बेटा, यह साधारण लॉकेट नहीं है, इसमें साक्षात बजरंगबली के चरणों का सिंदूर है। यह तुम्हें हर उस बला से बचाएगा जिसका इलाज इंसानों के पास नहीं है।"
मरता क्या न करता! कृष्ण ने अपनी पूरी ताकत बटोरी और अपने शर्ट के अंदर से वह लॉकेट बाहर निकाला। जैसे ही उसने वह चमकता हुआ लॉकेट सृष्टि के माथे के करीब किया, खंडहर हवेली की दीवारों में एक भयानक चीख गूँज उठी।
"नहीं! इसे दूर हटा... यह मुझे जला रहा है!"
सृष्टि के गले से निकली वह आवाज़ किसी जानवर की तरह थी। जैसे ही हनुमान जी के चरणों का वह पवित्र सिंदूर लगा लॉकेट सृष्टि के शरीर से छुआ, वहाँ से एक हल्का सा धुआँ उठा और वह काली छाया, जो उसे घेरे हुए थी, झटके से पीछे हट गई।
रूहानी ज़ंजीरें और पवित्र सुरक्षा
जैसे ही बजरंगबली के चरणों का वह पवित्र सिंदूर सृष्टि के माथे से स्पर्श हुआ, उसके शरीर में हो रही भयावह हलचल एक झटके में थम गई। उसकी आँखों की वे सफेद पुतलियाँ वापस अपनी जगह पर आईं और वह निढाल होकर कृष्ण की बाहों में गिर पड़ी। सृष्टि अब पूरी तरह बेहोश थी, उसका शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ चुका था।
कृष्ण ने उसे अपनी मज़बूत गोदी में उठाया। उसका दिल सीने को चीरकर बाहर आने को बेताब था, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने देखा कि खंडहर हवेली के जर्जर दरवाज़े और खिड़कियाँ अपने आप ज़ोर-ज़ोर से पीटने लगी थीं। हवा का दबाव इतना बढ़ गया था कि ऐसा लग रहा था मानो हवेली की दीवारें उसे अंदर ही दफन कर देना चाहती हैं।
कृष्ण ने दांत पीसते हुए कहा, "आज तुम हमें नहीं रोक पाओगी!"
जैसे ही वह उस 'भूतिया हवेली' की चौखट लांघकर बाहर निकलने लगा, उसे अपने पीछे किसी के तेज़ दौड़ने की आहट सुनाई दी। 'छन-छन-छन'... पायलों की वह आवाज़ अब कोई सुरीला संगीत नहीं, बल्कि मौत का तांडव लग रही थी। अदृश्य ताकतें उसे पीछे से खींचने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन कृष्ण के गले में चमकता वह ताबीज एक ढाल बन गया था। जैसे ही कोई काली परछाईं उसके करीब आती, ताबीज से एक हल्की सी नीली चमक निकलती और वह साया चीखते हुए पीछे हट जाता।
अध्याय: जंगल का चीखता सन्नाटा
कृष्ण सृष्टि को लेकर उन घने जंगलों की पगडंडी पर भागने लगा। वह रास्ता जिसे उसने दोपहर में बेहद खूबसूरत माना था, अब किसी भूलभुलैया जैसा लग रहा था। पेड़ों की टहनियाँ किसी कंकाल के हाथों की तरह उसके रास्ते में आ रही थीं।
अचानक, पूरे जंगल में एक ऐसी भयानक चीख गूँजी जो इंसानी नहीं थी। वह आवाज़ इतनी तेज़ थी कि कृष्ण के कान के पर्दे फटने लगे। वह 'भूखी दुल्हन' का विलाप और गुस्सा था जो देवपुर की वादियों में गूँज रहा था।
दूर गाँव में, अपनी झोपड़ियों में सो रहे ग्रामीण उस आवाज़ को सुनकर उठ बैठे। रघु काका ने कांपते हाथों से अपनी लाठी पकड़ी और बुदबुदाए, "अनर्थ... बहुत बड़ा अनर्थ! उस रूह ने अपना शिकार चुन लिया था, पर किसी ने उसे बीच में ही रोक दिया। अब वह शांत नहीं होगी।"
अध्याय: नींद से जागता खौफ
उधर, रश्मि की आलीशान हवेली में, जहाँ बाकी दोस्त—सुमित, रश्मि, और वे अन्य जो बेखबर सो रहे थे—अचानक उस रूहानी चीख से जाग गए। हवेली के कांच की खिड़कियाँ उस आवाज़ के कंपन से थरथराने लगीं।
सुमित ने हड़बड़ाकर अपने बगल में देखा। बिस्तर खाली था। "सृष्टि? सृष्टि कहाँ हो तुम?" वह चिल्लाया।
रश्मि और बाकी दोस्त भी अपने कमरों से बाहर हॉल में आ गए। सबकी आँखों में दहशत थी। रश्मि ने देखा कि हवेली का मुख्य द्वार खुला हुआ है और बाहर से वही ठंडी, सड़ी हुई महक आ रही थी।
"कृष्ण भी अपने कमरे में नहीं है!" रश्मि की आवाज़ कांप रही थी।
तभी उन्हें दूर जंगल के रास्ते से कोई दौड़ता हुआ दिखाई दिया। वह कृष्ण था, जो पसीने से तर-बतर, हाँफते हुए और बेहोश सृष्टि को सीने से लगाए हवेली की ओर बढ़ रहा था। उसके पीछे जंगल का वह अंधेरा ऐसा लग रहा था मानो कोई विशाल काला समंदर उसे निगलने के लिए लहरें मार रहा हो।