"ले जाओ इसे... उसके पास... और दोनों को एक ही चिता पर जला दो।"
यह सुनकर सत्या उन आदमियों के पीछे-पीछे छिपते-छिपाते जाने लगा।
उन आदमियों ने नाम्या (सत्या के पिता) की देह उठाई और वहीं ले जाकर डाल दी जहाँ सत्या की माँ का पार्थिव शरीर पड़ा था। उन्होंने उन पर मिट्टी का तेल (केरोसीन) छिड़का और आग लगा दी। सत्या अपनी भरी हुई आँखों से यह सब देख रहा था।
उस समय सत्या की उम्र ही क्या थी? चौदह-पंद्रह साल का सत्या अब बदले की आग में जल रहा था। माता-पिता को खोने का दुःख उससे बेहतर और कौन समझ सकता था? अब वह पूरी तरह अनाथ हो चुका था। उसके आगे-पीछे कोई नहीं बचा था जो उसे सहारा दे सके।
उन आदमियों ने दोनों को जलाने के बाद साहूकार के पास जाकर सूचना दी। साहूकार ने इस 'काम' के बदले उनके खाने-पीने का इंतजाम किया। लौटकर आए वे आदमी पीकर पूरी तरह धुत हो चुके थे, उन्हें होश ही नहीं था। साहूकार उन सबको काम में लगाकर अपने कमरे में आराम करने चला गया।
सत्या ने पूरा वाड़ा (हवेली) छान मारा और उसे रसोई के सामान के पास एक मिट्टी का तेल का डिब्बा भरा हुआ मिल गया। उसने वह डिब्बा उठाया और चुपके से बिना किसी की नज़र में आए साहूकार के कमरे के अंदर और बाहर तेल डाल दिया। फिर वह उस जगह मुड़ा जहाँ वे आदमी शराब के नशे में मज़े कर रहे थे। वहाँ भी तेल डालकर वह बाहर निकला और काँच की बोतलों में आग लगाकर उसने तेज़ी से दो-चार बोतलें फोड़ दीं। देखते ही देखते आग भड़क उठी।
वे पहले ही नशे में चूर थे, इसलिए किसी को समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है। साहूकार अपने कमरे में ही था, सत्या ने बाहर से कुंडी लगा दी थी। देखते-ही-देखते पूरी हवेली आग की चपेट में आ गई और अंदर से सब लोग गर्मी के कारण चीखने-चिल्लाने लगे। गाँव के लोग भी जमा हो गए, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। किसी की हिम्मत नहीं हुई कि अंदर जाए। अंदर से आती वे चीखें सत्या को बता रही थीं कि अब उसके माँ-बाप इस दुनिया में नहीं रहे।
उसी दुःख में वह गाँव छोड़कर पगडंडी पर चल पड़ा, जहाँ रास्ता ले जाए। माता-पिता नहीं रहे तो क्या हुआ, पेट भरने के लिए कुछ तो करना ही था। पेट भरने के लिए जो काम मिला, वह करने लगा। चोरी, डकैती, लूटपाट, तोड़फोड़ सत्या के जीवन का सत्य बन गया। ड्रग्स इधर-उधर पहुँचाना, अफीम, गांजा, चरस... देखते ही देखते वह इस धंधे में उतर गया।
और धीरे-धीरे हालात ने उसे 'सत्या' से 'द सत्या भाई' बना दिया।
मुंबई जैसे शहर में छोटी-बड़ी कई गैंग उसके अंडर काम करती थीं। "गरीबों का साथ और बड़ों को लात" - इस स्लोगन का वह पूरा इस्तेमाल करता था। 🤣
उसने कुछ गैर-कानूनी काम छोड़ दिए थे, लेकिन गली-मोहल्ले के कुछ रॉकी, चंद्या, मंद्या, संत्या उसका नाम इस्तेमाल करके गलत काम करते थे।
एक बार राजस जब दूसरे रास्ते से जा रहा था, तब उसके कुछ दुश्मनों ने उस पर हमला कर दिया। राजस असावधान था, इसलिए वह पलटवार नहीं कर पाया।
बॉडीगार्ड्स उसकी लोकेशन ट्रेस कर रहे थे, लेकिन हमलावरों ने उस रास्ते पर जैमर लगा दिया था, जिससे वे कुछ नहीं देख पा रहे थे। सत्या को मीटिंग के लिए पहले ही देरी हो रही थी, इसलिए उसने अपनी गाड़ी दूसरे रास्ते से ले ली थी, जिसकी वजह से गार्ड्स और उसकी गाड़ी का रास्ता कुछ सेकंड के लिए बदल गया।
सुनसान रास्ता पाकर विरोधी टीम ने राजस की गाड़ी उड़ा दी। टक्कर इतनी ज़ोरदार थी कि कार के अंदर मौजूद इंसान की हड्डियाँ तक मिलना मुश्किल था, लेकिन राजस की किस्मत बहुत बलवान थी। यह सब अपनी आँखों से देखने वाला सत्या वहाँ एक बिल्डर की सुपारी लेने आया था और उसका इंतज़ार कर रहा था, तभी वह बड़ा हादसा हो गया।
सत्या चाहे कितना भी गैर-कानूनी काम करता हो, लेकिन उसके अंदर की इंसानियत अभी ज़िंदा थी।
टक्कर मारने वाली गाड़ी तुरंत फरार हो गई थी और राजस की गाड़ी पलटी खाकर विस्फोट (धमाके) की कगार पर थी। सत्या वहाँ पहुँचा और गाड़ी का मुआयना करने लगा। गाड़ी का बुरा हाल हो चुका था। अंदर मौजूद व्यक्ति बचेगा या नहीं, यह कहना मुश्किल था। खिड़की की तरफ से उसे नीचे की ओर एक हाथ बाहर आता हुआ दिखा।
सत्या ने पूरी ताकत लगाकर दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा। गाड़ी धुएँ से भरी थी, अंदर कौन है, यह दिख नहीं रहा था। फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी। 'बजरंगबली, श्री हनुमान जी' का नाम लेकर उसने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया और दरवाज़ा तोड़ दिया।
राजस को काफी चोट आई थी। एक आँख फूट गई थी, दोनों पैरों पर गहरी चोट थी और एक हाथ छिल गया था। सत्या की कड़ी मेहनत से राजस को बाहर निकाला गया। वह उसे अपनी कार की तरफ ले जाने लगा। सत्या अभी इस धंधे में नया था, अपनी कमाई और मेहनत से उसने एक स्विफ्ट कार ली थी, जो उसे जान से भी प्यारी थी।
किसे अपनी पहली गाड़ी प्यारी नहीं होती? 😂 उसे भी थी।
राजस को लेकर वह गाड़ी के पास पहुँचा ही था कि तभी ब्लैक बीएमडब्ल्यू कारों की कतार लग गई। उसमें से वेल-ट्रेन्ड बॉडीगार्ड्स की फौज निकली और राजस को लेने के लिए आगे बढ़ी।
लेकिन सत्या भी किसी को हाथ लगाने देने वालों में से नहीं था। जैसे ही गार्ड्स सामने आए, उसने तुरंत राजस को पिछली सीट पर डाला और दरवाज़ा लॉक कर दिया।
एक गार्ड ने कहा, "ऐ! तू कौन है? और बॉस को लेकर कहाँ जा रहा है?"
सत्या बोला, "यह पूछने वाले तुम कौन होते हो? इन्हें अब तुम्हारी नहीं, हॉस्पिटल की ज़रूरत है। हट जाओ रास्ते से, वरना यह यहीं मर जाएगा।"
सत्या ने कहा, "इन्हें बचाने के चक्कर में मैंने उस बिल्डर को छोड़ दिया, समझ गए?"
एक गार्ड ने आगे आकर कहा, "तू लॉक खोल, बॉस को उनके अस्पताल ले जाना चाहिए, वहीं उनका इलाज जल्दी होगा।"
सत्या और गार्ड के बीच 'तू-तू मैं-मैं' चल ही रही थी कि रॉनी की गाड़ी आकर रुकी। रॉनी चिल्लाया, "ऐ यू! सब के सब, बॉस कहाँ हैं?"
एक गार्ड ने आगे आकर कहा, "बॉस उस गाड़ी में हैं और यह मूर्ख हमें उन्हें अस्पताल ले जाने से रोक रहा है।"
सत्या बोला, "ऐ घोंचू! मैंने कब कहा कि मैं इन्हें अस्पताल नहीं ले जा रहा? तुम ही टाइम बर्बाद कर रहे हो, बकवास कर रहे हो।"
रॉनी ने देखा तो एक हैंडसम लड़का, टपोरी जैसे कपड़े पहने, उस भारी-भरकम गार्ड से भिड़ रहा था। उसकी बहादुरी उसी से समझ आ रही थी।
रॉनी कुछ बोलता उससे पहले ही सत्या बोला, "अब तुम लोग कौन हो यार? इनका जीव बचाना है या इन्हें यहीं मरने देना है?"
"देखो, तुम इनके कितने भी करीब क्यों न हो, मैं इनके घर वालों की पहचान हुए बिना किसी को हाथ नहीं लगाने दूँगा।" उसके बोलने में एक दृढ़ निश्चय था।
उसने आगे कहा, "तुम लोग मुझे धोखा देकर इन्हें यहाँ ले आए और मरवा दिया... मेरी मेहनत बेकार जाएगी? ऐसा कुछ नहीं होगा, ये मेरे साथ ही जाएँगे।"
"साले! अपनी जान दाँव पर लगाकर इन्हें बचाया, उसका क्या? मेरे कंधे की हड्डी तक टूट गई, हाथ भी काम नहीं कर रहा, और तुम लोगों की वही घिसी-पिटी बातें शुरू हैं।"
रॉनी ने गौर किया तो सच में वह एक कंधे को झुकाए हुए था। रॉनी ने और बहस नहीं की और मान गया, क्योंकि सत्या किसी की सुनने वाला नहीं था।
राजस को एडमिट करने के बाद भी, सत्या बंदूक दिखाकर ऑपरेशन थिएटर में घुस गया था, जबकि रॉनी के एक इशारे पर उसे बाहर फेंकने में देर नहीं लगती।
***
Follow me 🙏