डॉक्टर अंदर आए...
इस समय वे राजस के बेडरूम में आए तो उन्हें लगा कि क्या घर का कोई करीबी व्यक्ति बीमार है?
वे सामने आए और बेड पर मरीज़ को देखकर वे मन ही मन बड़बड़ाने लगे... "नॉट अगेन... यह राक्षस कभी नहीं सुधरेगा... बेचारी का क्या हाल कर रखा है..."
ये शब्द सुमन (शब्द रूपी फूल) वे सिर्फ मन ही मन राजस पर बरसा सकते थे... बाहर नहीं।
और अभी तक लोगों के मन की बात कोई समझ सकता है, ऐसा उन्होंने आज तक नहीं सुना था। इसीलिए वे बेझिझक बोल रहे थे, उसे कोस रहे थे...
"कांड इसे करने हैं... और कुछ सीरियस हुआ तो मैं तो हूँ ही... आज भी वैसा ही किया। रोह्या (रॉनी) उसे अच्छे से नहला रहा था, तो वॉशरूम का दरवाजा तोड़कर उसे बाहर खींच लाया... साबुन भी शरीर से ठीक से नहीं निकल पाया था..."
"और ऊपर से कह रहा है कि अगर हम पाँच मिनट में नहीं पहुँचे, तो बॉस बिना साबुन के नहाने की भी हिम्मत नहीं देगा..."
"हम्म्म्..." कहते हुए उन्होंने मन ही मन मुँह बिचकाया। 🫤🫤
और अमाया को चेक करने लगे...
"ओ गॉड! यह लड़की कल ही तो बेहोश थी... अभी इसे दो-चार दिन आराम करना था, तो फिर से समुद्र में तैरने कहाँ गई थी..."
ऐसा कहकर वे राजस की ओर मुड़े।
"ये अनकॉन्शियस हो गई हैं... ऑक्सीजन लगानी पड़ेगी... साथ ही पेट और नाक में पानी भर जाने के कारण ब्लैडर का पानी निकालना होगा... और हीट (गर्मी) देनी होगी, उसके बिना इनका होश में आना मुश्किल है..."
"आप क्या कहना चाहते हैं डॉक्टर? राजस ने पूछा।"
"इन्हें हॉस्पिटल में ICU में एडमिट करना पड़ेगा... अभी मेरे पास यहाँ कुछ भी उपलब्ध नहीं है..."
और वह आगे क्या कहेगा, इसका अंदाजा लगाकर डॉक्टर ने पहले ही कह दिया...
"अगर आप ICU यहाँ शिफ्ट करने की सोच रहे हैं, तो उसमें समय लगेगा... भले ही इक्विपमेंट अवेलेबल हो, लेकिन उसे लाने और सेटल करने में वक़्त जाएगा। इसलिए मेरी राय में आप इन्हें तुरंत हॉस्पिटल ले जाएँ..."
राजस को भी यह बात सही लगी... उसे अमाया से अभी बहुत कुछ जानकारी निकलवानी थी, इसलिए वह उसे मरने तो नहीं दे सकता था।
"ओके डॉक्टर!" कहते हुए उसने तुरंत आदेश दिए और 10 मिनट के भीतर वे हॉस्पिटल में थे। उसे ICU में एडमिट करके उपचार शुरू हो गया था।
इन सबके बीच, रॉनी और माया को अमाया की स्थिति देखकर बहुत बुरा लग रहा था। जो फूल कल टवटवित (ताज़ा) दिख रहा था, वह आज मुरझा गया था।
इसलिए उन्होंने पक्का निर्णय लिया कि सच को आने वाले दिनों में ढूँढ निकालना ही है... और उसने 'सर्किट' को कॉल लगाया।
यह सर्किट ही था जो राजस के दिमाग का दही कर सकता था...
मतलब, वह एक गुंडा ही था... कोई मामूली नहीं, बल्कि भाई था वह... पूरे अपराधी जगत का।
'सत्या भाई' के नाम से उसे हर जगह पहचाना जाता था... ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था, काम भर की पढ़ाई की थी। उसे बचपन से ही फिल्में देखने का बड़ा शौक था। गरीबी के कारण घर में खाने के लाले पड़े थे, तो माँ-बाप इस फिल्म प्रेमी को टीवी कहाँ से लाकर देते? घर में अठारह विश्व दरिद्रता थी, मेहनत-मज़दूरी करके पेट पालते थे। वैसे सत्या दिखने में हीरो ही था, लेकिन किस्मत साथ नहीं दे रही थी। उसके अंदर एक्टिंग का भूत सवार था।
कोई भी फिल्म देखता तो उसका पसंदीदा किरदार उसके अंदर घुस जाता, और जब तक दूसरी फिल्म नहीं देखता, तब तक वह उससे निकलता नहीं था। 🤣
सत्या के पास न कोई बोर्ड सर्टिफिकेट था, न ही किसी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की डिग्री थी, फिर भी सत्या करोड़ों का मालिक था।
उसके माँ-बाप गाँव के साहूकार के खेत में मज़दूरी करते थे और जो वह देता, उसी पर गुज़ारा करते। साहूकार बड़ा नीच और चमड़ी चोर था। उसकी नज़र सत्या की माँ पर थी... सत्या की माँ रूपवती थी, तो बाप भी दिखने में ठीक-ठाक था, लेकिन अशिक्षित होने के कारण कोई नौकरी नहीं देता था, इसलिए वे साहूकार के यहाँ काम करते थे।
एक दिन सत्या की तबीयत खराब थी, तो पिता उसे लेकर तालुका के अस्पताल गए थे और माँ अकेली खेत पर गई थी। साहूकार को पता चलते ही वह खेत पर गया और अकेली पाकर उसके साथ दुर्व्यवहार करने की कोशिश की।
सत्या की माँ 'बचाओ-बचाओ' चिल्ला रही थी, लेकिन उस सुनसान खेत में दोपहर के समय कोई उसकी मदद के लिए नहीं आया।
अस्पताल से लौटने के बाद पिता ने सत्या को घर छोड़ा, खाना खिलाकर सुलाया और वे खुद पत्नी की चिंता में खेत की तरफ जाने लगे। पहुँचने पर उन्होंने अपनी पत्नी को आवाज़ दी, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। वे उन्हें ढूँढने लगे तो उन्हें कुएँ के पास अचेत अवस्था में मिलीं। यह देखकर उनका कलेजा फट गया। उन्होंने विलाप करते हुए अपनी पत्नी को गोद में उठाया।
उन्होंने पूछा कि यह किसने किया, तो उन्होंने साहूकार का नाम लिया... और वहीं उन्होंने दम तोड़ दिया।
सत्या के पिता के हृदय में आग लग गई थी। अपनी पत्नी को उस हाल में देखकर उनका क्रोध बढ़ता गया। उसी क्रोध में हाथ में कुल्हाड़ी लेकर वे साहूकार के वाड़े (हवेली) की ओर दौड़ पड़े और जोर-जोर से साहूकार को बुलाने लगे। जैसे ही साहूकार दिखा, वे उसकी तरफ दौड़े, लेकिन साहूकार के आदमियों ने उन्हें पकड़ लिया और पीटने लगे।
साहूकार बोला, "क्या नाम्या, तेरी बीवी एकदम माल थी... उसके शरीर का उपभोग करने का मैं कब से सपना देख रहा था, पर साली हाथ ही नहीं आ रही थी।"
नाम्या (सत्या के पिता) ने कहा, "अरे हैवान! उसने तेरा क्या बिगाड़ा था जो तूने उसे मार ही डाला... तुझे जिंदा नहीं छोड़ूँगा... तुझे एक माँ, पिता और पति की हाय (बददुआ) लगेगी।"
साहूकार हँसते हुए बोला, "उसके साथ तुझे भी दफन कर देना चाहिए था।"
"मारो सालों को!" इतना कहते ही आदमी फिर पीटने लगे। दस हट्टे-कट्टे लोग और उनके सामने अकेले सत्या के पिता, कैसे टिक पाते?
ये सब अपनी आँखों से देखने और कानों से सुनने के बाद उस छोटे से बच्चे का क्रोध काबू से बाहर हो गया और उसकी आँखों से आंसू बहने लगे।
काफी समय बीतने के बाद भी जब माता-पिता घर नहीं लौटे, तो सत्या साहूकार के यहाँ आया था। उसे पता था कि मज़दूरी मांगने के लिए वे वहीं गए होंगे। वह आया और बड़े दरवाजे की आड़ में खड़ा होकर देखने लगा कि कहीं वे दिख जाएँ।
लेकिन सामने जो उसने देखा और सुना, वह उसके लिए बहुत भयावह था।
"सुबह जो हाथ सिर पर फेर कर गई थी, वह माँ अब कभी नहीं फेरेगी।"
"मेरे बच्चे की तबीयत ठीक नहीं है, खेत से आकर रात को शिरा (हलवा) बना दूँगी" - ऐसा कहने वाली माँ अब कभी शिरा नहीं बनाएगी।
"गरीबी हमारी किस्मत में है, लेकिन तू पढ़-लिखकर बहुत बड़ा आदमी बनना" - ऐसा कहने वाली माँ अब जिंदा नहीं थी।
"माँ, मैं पढ़-लिखकर बड़ा हीरो बनूँगा..."
"हाँ मेरे राजा, हीरो बनना..." - ऐसा कहकर लाड़ करने वाली माँ अब नहीं रही थी।
यह सब याद करके वह वहीं बैठकर फूट-फूटकर रोने लगा।
उधर, पिता भी मार-मार कर मौत के करीब थे। तभी साहूकार के आदमी बोले कि 'नाम्या गया'...
यह सुनते ही सत्या के हाथ-पैर सुन्न पड़ गए। एक ही दिन में वह अनाथ हो गया था। माँ और पिता दोनों उसका साथ छोड़कर परलोक सिधार गए थे|
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फॉलो करणा ना भुलें 🫰🫰